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Saturday, February 27, 2021

हिन्दी साहित्य को चेतन भगत जैसे लेखक का इंतजार- ममता कालिया

हिन्दी साहित्य को है चेतन भगत जैसे लेखक का इंतजार। पढ़िए समूह संपादक ममता कालिया से समूह संपादक दीपक सेन से 25 अप्रैल 2010 की बातचीत का मुख्य अंश।

नई दिल्ली: हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने कहा हैं कि यह कहानी अवसान और उपन्यास के उत्थान का वक्त है। चेतन भगत ने जिस तरह अपने अनुभवों को अंग्रेजी साहित्य में उतारा है, हिन्दी साहित्य को भी उसी प्रकार के लेखक का इंतजार है।

ममता कालिया ने खास मुलाकात में कहा था, “अंग्रेजी में चेतन भगत ने अपने महीन अनुभवों को लेकर लिखा और उन्हें लोगों ने खूब सराहा। हिन्दी को इसी तरह के युवा लेखक का इंतजार है, जो प्रचलित परिपाटी की बजाय अपने अनुभवों को लिखे और उसकी रचना के संस्करण पर संस्करण प्रकाशित हों।”

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उन्होंने कहा, “इस वक्त कहानी दो दिशाओं की तरफ जा रही है। एक तरफ सामाजिक प्रगति की दिशा पर जा रही है और दूसरी तरफ युवा रचनाकार हैं, जो अपने आप में सिमटे लगते हैं। मुझे ऐसा लगता कि कुछ युवा लेखक दिग्भ्रमित है और इससे उनकी कहानी एकांतवादी हो जाती है। ऐसे रचनाकार कहानी को मानसिक भ्रम में डाल देते हैं और केवल अपनी बात करते रहते हैं। स्वयं के अंतर्मन तक सिमटे रहने के कारण कहानी जैसी विधा का अपव्यय हो रहा है।”

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ममता जी के अनुसार “सूचना और प्रौद्योगिकी के कारण समाज में आत्मकेंद्रियता की प्रवृत्ति बढ़ रही है और इसे एक दूसरे को अनदेखा करने का बहाना बनाया जा रहा है। कई दफा विवादों से बचने के लिए कहानीकार अहम मुद्दों को छूना नहीं चाहते हैं। हिन्दी साहित्य में वर्तमान दौर उपन्यासों के उत्थान और कहानी के अवसान का है।”

ममता जी मानती हैं, “नयी कहानी के आंदोलन के दौरान लिखी गयी कहानियां इसकी प्रगति में मील का पत्थर का पत्थर साबित हुई है। जहां तक लंबी कहानी की बात है तो कहानी निश्चित पृष्ठ संख्या में समाप्त हो जाना चाहिए।” ममता कालिया हिन्दी नयी कहानी आंदोलन का हिस्सा रही हैं। इसके साथ वह अंग्रेजी में लिखती हैं।

उनके अनुसार “महानगरों की बजाय छोटे शहरों में लोगों के पास अपने अंदर झांकने का वक्त होता है जिसमें सृजन के प्रति समर्पण होता है। इलाहाबाद जैसे शहरों में लोगों को अपने जीवन से अधिक उम्मीद नहीं रहती। वहां आर्थिक चुनौतियां नहीं है, लेकिन सृजनात्मक चुनौतियां हैं। महानगरों में लोगों की अपने जीवन से उम्मीदें बढ़ जाती हैं और जीवन के कशमकश में व्यक्ति का सृजनात्मकता का पहलू पीछे छूट जाता हैं।”

वह कहती हैं, “युवाओं का पलायन बेहतर जीवन की तलाश में नहीं बल्कि जीविका की तलाश में महानगरों की तरफ हो रहा है। यहां की पेशेगत मजबूरियों के चलते अंधी दौड़ में फंस जाते हैं और रचनात्मकता से दूर होते जाते हैं। महानगरों के जीवन का हिस्सा बने छोटे शहरों के युवाओं के पास अनुभव का विस्तृत संसार होता है और जब कभी ऐसे युवा अपने इन तजुर्बों को कागजों पर उतारेंगे तो बेहतरीन लिखेंगे।”

ममता जी को रोजमर्रा के जीवन में स्त्री संघर्ष को अपने लेखन में उभारने के लिए जाना जाता है। वह कहती हैं, “साहित्य में स्त्री विमर्श को हाशिये पर समेट दिया गया है जिसके बारे में गंभीर विचार विमर्श का अभाव दिखाई देता है।”

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