नीतीश के नाम तेजस्वी की चिट्ठी, मांगी बिहार के अस्पतालों में घूमने की इजाजत

पटनाः मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही चार साल में नेता प्रतिपक्ष के किसी सवाल का जवाब नहीं दे रहे हों, लेकिन तेजस्वी यादव अब भी उन्हें लगातार पत्र लिख रहे हैं। मंगलवार को एक बार फिर उन्होंने सीएम नीतीश कुमार को लेटर लिखा है, जिसमें उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री के बेहतर स्वास्थ्य को लेकर कुशल क्षेम पूछा है। साथ ही इस बात पर आश्चर्य जाहिर किया है कि पूजनीय गाँधी, लोहिया, जेपी और कर्पूरी ठाकुर जी की विचारधारा पर चलने का दंभ भरने वाले मुख्यमंत्री इतना अलोकतांत्रिक कैसे हो सकते है कि वो नेता विरोधी दल के पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझते?

इस चिट्ठी में तेजस्वी यादव ने सीएम से कहा कि  विगत वर्षो में देखा गया है कि अनेकों बार जब-जब जनहित के मुद्दों को लेकर मैं सड़क पर निकला हूँ, तब-तब मुझ पर महामारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है जोकि मेरे संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने का एक नाजीवादी विचार व प्रयास है। यह प्रजातंत्र का गला घोंटने तथा आपके हिटलरशाही रवैये का परिचायक है। तेजस्वी ने लिखा है कि जनता के लिए हम एवं हमारे सभी विधायकगण अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को आवश्यक जीवनरक्षक दवाएँ,ऑक्सीजन सिलेन्डर, बेड इत्यादि मुहैया करवा रहे है। मैं इन सारे कार्यो का स्वयं पर्यवेक्षण करना चाहता हूँ। साथ ही आपसे अपील है कि सरकार सुनिश्चित करें कि इससे रोगियों व उनके परिजनों को किसी प्रकार की असुविधा ना हो।

जिस तरह से तेजस्वी ने सीएम को चिट्ठी लिखी है, उसके बाद अब नीतीश कुमार को फैसला लेना है कि वह नेता प्रतिपक्ष को बिहार के अस्पतालों का दौरा करने की अनुमति देंगे या नहीं। क्योंकि पूर्व में पप्पू यादव भी यही काम कर रहे थे और उन्होंने जिस तरह से सरकार की व्यवस्था की पोल खोली थी, उसके बाद सालों पुराने मामले में जेल भेज दिया गया। सवाल यह है कि क्या सीएम नीतीश अब फिर से तेजस्वी को बिहार भ्रमण की अनुमति देकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे। फिलहाल सरकार के फैसले का इंतजार है।

ये है नीतीश के नाम तेजस्वी की चिट्ठी

आदरणीय मुख्यमंत्रीजी,

बिहार, पटना।

आशा है आप पूर्णत: स्वस्थ होंगे। आपको एक और पत्र इस आशा और विश्वास के साथ लिख रहा हूँ कि इस पत्र का तो मानवीय हित में आप अवश्य ही जवाब देंगे अन्यथा लगभग विगत चार वर्षों में आपने मेरे किसी पत्र का कभी कोई जवाब नहीं दिया। कई बार मैं अचंभित भी होता हूँ कि पूजनीय गाँधी, लोहिया, जेपी और कर्पूरी ठाकुर जी की विचारधारा पर चलने का दंभ भरने वाले मुख्यमंत्री इतना अलोकतांत्रिक कैसे हो सकते है कि वो नेता विरोधी दल के पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझते? यह लोकतांत्रिक परंपराओं और संसदीय प्रणाली के लिए क़तई उचित नहीं है।

मुख्यमंत्री जी, जैसा कि आप अवगत है राज्य में वैश्विक महामारी कोविड-19 के साथ-साथ उच्च स्तर पर स्वास्थ्य विभाग की अव्यवस्था, उदासीनता, भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, आवश्यक दवाओं एवं ऑक्सीजन आदि की कालाबाजारी तथा सरकार की असंवेदनशीलता भी चरम पर है। अब यह महामारी शहरी इलाके के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी भयावह रूप से फैल चुकी है। वर्तमान में बिहार की स्वास्थ्य संरचना और सेवाओं की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है?

विदित हो कि लोकतंत्र के मंदिर बिहार विधानसभा में आपने ही कहा था कि स्वास्थ्य व्यवस्था, कोविड मैनेजमेंट, पर्यवेक्षण में विधानमंडल के निर्वाचित प्रतिनिधि भी अपना योगदान दे सकते है। राज्यपाल महोदय द्वारा आहूत सर्वदलीय बैठक में हमने 30 महत्वपूर्ण सुझाव रखे थे जिसमें एक सुझाव में एक स्पेशल टास्क फ़ोर्स का गठन कर Epidemiologist, Public health experts और तमाम राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों को सम्मिलित करने का प्रस्ताव था लेकिन दुर्भाग्यवश आपकी सरकार ने इसका गठन नहीं किया। शायद इससे वास्तविक आँकड़े सार्वजनिक हो जाते तथा संस्थागत भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जाता।

जब कोई बड़ा संकट आता है तो पीड़ितों द्वारा अपना तारणहार खोजना स्वाभाविक है। आपके दल के ही लोग प्रतिदिन आधिकारिक बयान जारी कर कहते है कि मुख्यमंत्री की बजाय नेता प्रतिपक्ष को स्वयं फ़्रंट पर रहकर कोरोना जाँच, जीवन रक्षक दवाओं, बेड, ऑक्सीजन तथा अस्पताल सुनिश्चित व सुव्यवस्थित कराने के साथ साथ कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई की अगुवाई करनी चाहिए। जब नेतृत्व किंकर्तव्यविमूढ़ दिखे तो अनुयायियों द्वारा नया नेतृत्व खोजा जाने लगना भी अपेक्षित है। बिहार के सत्तारूढ़ दलों द्वारा सरकारी व्यवस्था को दुरुस्त करने के बजाय नेता प्रतिपक्ष को खोजने की कवायद को जनता भी इसी दृष्टि से देख रही है।

महोदय, हम जिम्मेदार विपक्ष है तथा मैं स्वयं भी एक संवैधानिक पद पर हूँ। ऐसे में मुझे राज्य के लोगों की समस्या को जानने तथा उसके समाधान हेतु सरकार द्वारा ली जानेवाली कदमों को जानने तथा जनहित में इनकी कमियों को भी सरकार के सामने लाने का अधिकार है। लेकिन विगत वर्षो में देखा गया है कि अनेकों बार जब-जब जनहित के मुद्दों को लेकर मैं सड़क पर निकला हूँ, तब-तब मुझ पर महामारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है जोकि मेरे संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने का एक नाजीवादी विचार व प्रयास है। यह प्रजातंत्र का गला घोंटने तथा आपके हिटलरशाही रवैये का परिचायक है।

महोदय, कोविड जैसी महामारी में स्वास्थ्य विभाग की लचर अव्यवस्था एवं असंवेदनशीलता से जूझती जनता के लिए हम एवं हमारे सभी विधायकगण अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को आवश्यक जीवनरक्षक दवाएँ,ऑक्सीजन सिलेन्डर, बेड इत्यादि मुहैया करवा रहे है। मैं इन सारे कार्यो का स्वयं पर्यवेक्षण करना चाहता हूँ। साथ ही आपसे अपील है कि सरकार सुनिश्चित करें कि इससे रोगियों व उनके परिजनों को किसी प्रकार की असुविधा ना हो। भीड़भाड़ ना लगे। अफरातफरी ना मचे। प्रशासन व डॉक्टर अपना काम रोककर पीड़ितों को असुविधा ना होने दें।

अतः आपसे अनुरोध है कि राज्य के सभी माननीय विधायकगण सहित मुझे भी राज्य के किसी अस्पताल/पीएचसी/कोविड केयर सेंटर आदि के अन्दर जाकर मरीजों एवं उनके परिजनों से मिलने तथा राहत पहुँचाने, कोविड केयर सेंटर खोलने तथा सामुदायिक किचन इत्यादि चलाने की अनुमति प्रदान करने की कृपा करना चाहेंगे।

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