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Saturday, July 24, 2021

CM के घर में है वास्तु दोष? बार-बार गिर जाती है कुर्सी

गुवाहाटीः सीएम की कुर्सी बार-बार गिर जाती है। दोष सियासत का है या फिर कालचक्र का, वजह जो भी हो जनता हर बार कुर्सी गिरने की बात सुनकर चौंक जाती है। अब बारी नेताओं के चौंकने की है, क्योंकि कुर्सी में लगे एक और दोष का पता चला है। यह दोष मुख्यमंत्रियों के घर में है और उसी की वजह से बार-बार अलग-अलग राज्यों के CM की कुर्सी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही गिर जाती है। शुरुआत ताजा घटनाक्रम से करेंगे, जिसमें तीरथ सिंह रावत की कुर्सी महज 166 दिनों में ही दगा दे गई। 20 साल पहले अस्तित्व में आये उत्तराखंड में अब तक 11 मुख्यमंत्रियों का असमय ही तख्तापलट हो चुका है।

बंगले में है वास्तु दोष

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में राजनीतिक हलकों में यह बात वर्षों से चर्चा में है कि राज्य के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में वास्तु दोष है। इसकी वजह से इस बंगले में रहने वाला कोई मुख्यमंत्री अब तक अपना 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। तीरथ सिंह रावत से पहले मुख्यमंत्री बने त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अफवाहों और अंधविश्वासों में विश्वास नहीं करते। वे इस सरकारी बंगले में रहेंगे, जिसे मनहूस कहा जाता है। नवरात्र के दूसरे दिन पत्नी व दोनों बेटियों के साथ 2 घंटे पूजा करने के बाद शुभ मुहूर्त में उक्त बंगले में प्रवेश किया और कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हे सीएम की कुर्सी गंवानी पड़ी। त्रिवेद्र के बाद तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के महज 116 दिन बाद ही कुर्सी गंवा दी, तो एक बार फिर मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले का वास्तु दोष लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

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बंगले में प्रवेश से पहले सियासी अपशगुन

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास का निर्माण नारायणदत्त तिवारी के कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ था। निर्माण तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी के पहले कार्यकाल के दौरान पूरा हुआ था। इस संबंध में तो यहां तक कहा जाता है कि इसके निर्माण के बाद से नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान ही मुख्यमंत्रियों की कुर्सियां खिसकती रहीं हैं। यह सिलसिला राज्य में कांग्रेस की तिवारी सरकार से शुरू हुआ था। उनके समय में यह बंगला निर्माणाधीन था। तिवारी इस बंगले में प्रविष्ट होते उससे पहले ही उनकी सरकार गिर गई।

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खंडूड़ी को महंगा पड़ा यह काम

बाद में खंडूड़ी ने इस अधूरे बंगले का निर्माण अपनी पसंद के अनुसार पूरा करवा कर सर्वप्रथम इसमें प्रवेश किया, लेकिन लगभग ढाई साल में ही उनकी भी कुर्सी खिसक गयी। 13 मई 2011 को मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने वाले डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को मात्र 4 माह बाद, 2012 में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी को 6 महीने बाद, मार्च 2012 में मुख्यमंत्री बनने वाले विजय बहुगुणा को एक साल 11 महीनों बाद और 2014 में राज्य के मुख्यमंत्री बने हरीश रावत को 2 साल बाद ही मुख्यमंत्री का पद छोडऩा पड़ा।

दलाईलामा ने काराया पूजा-पाठ

ऐसा नहीं है कि सिर्फ उत्तराखंड की राजनीति ही वास्तु से प्रभावित रही है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले की रामकहानी तो और भी विचित्र है। दोर्जी खाण्डू ने इटानगर के नीतिविहार इलाके में 59.55 करोड़ की लागत से मुख्यमंत्री का नया बंगला बनवाया। 14 नवंबर 2009 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा द्वारा विशेष पूजा करवाने के बाद उसमें प्रवेश किया था। लेकिन अपना कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही वे 30 अप्रैल 2011 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गये। तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा का विशेष पूजा-पाठ धरे का धरा रह गया। उनके बाद मुख्यमंत्री बने जारबोम गामलिन सिर्फ 6 महीने ही अपने पद पर रह पाये और अपने पद से इस्तीफा दे दिया और उसी आवास में रहते उन्हें दिल का दौरा पड़ा। दौरा पड़ने से सिर्फ 53 वर्ष की उम्र में 30 नवंबर 2014 को उनका अकाल वियोग हो गया।

नहीं ठीक कराया वास्तु तो हुआ ये हाल

1 नवंबर 2011 को मुख्यमंत्री बने नवाम टुकी ने रोज-रोज की परेशानियों से मुक्त होने के लिए जाने-माने वास्तु विशेषज्ञ राजकुमार झांझरी को मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले का वास्तु देखने ईटानगर बुलवाया था। झांझरी बताते हैं, “नवाम टुकी ने मेरी सलाह के अनुसार उसमें सुधार करवाने की हामी भी भरी थी, लेकिन किया कुछ नहीं, जिसका परिणाम उन्हें दिसंबर 2015 में विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान मुख्यमंत्री पद से हटाने के रूप में मिला।”

आवास में ही मरे सीएम

47 वर्षीय कालिखो पुल ने 19 फरवरी 2016 को मुख्यमंत्री का पद संभाला और महज 145 दिन बाद 13 जुलाई 2016 को उनकी भी गद्दी चली गई। उन्होंने 9 अगस्त 2016 को मुख्यमंत्री आवास के कमरे में ही पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली। 17 जुलाई 2016 को पेमा खांडू ने राज्य की बागडोर संभाली और अब वे भारतीय जनता पार्टी के नेता के रुप में अरुणाचल में सरकार चला रहे हैं।

दोर्जी खांडू से कालिखो पुल तक जितने भी मुख्यमंत्री हुए उन सभी ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में डेरा डाला था और उनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। इस बंगले में 3 मुख्यमंत्रियों की अकाल मृत्यु हो गई और एक कर्मचारी ने फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली तो पेमा खांडू ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय अपने आवास से ही मुख्यमंत्री का कार्यभार चलाने का निर्णय लिया तथा इसी बीच जनता के बीच भूतबंगले के रूप में प्रचारित हो चुके मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले को सरकारी गेस्ट हाऊस में तब्दील कर दिया।

अनोखा है असम की कुर्सी का किस्सा

असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी ऐसे ही वास्तु दोषों का शिकार रही है। मेघालय के अलग राज्य का दर्जा हासिल करने के बाद असम की राजधानी शिलांग से दिसपुर स्थानांतरित कर दी गयी। असम की राजधानी दिसपुर में निर्मित मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में जितने भी मुख्यमंत्री रहे, उनमें से कोई भी अपना 5 सालों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।

12 मार्च 1978 को मुख्यमंत्री बने गोलाप बोरबोरा को 18 महीने, 9 सितम्बर 1979 को मुख्यमंत्री बने जोगेन्द्र नाथ हजारिका को 3 महीने, 6 दिसम्बर 1980 को मुख्यमंत्री बनी सैयदा अनवरा तैमूर को 7 महीने, 13 जनवरी 1982 को मुख्यमंत्री बने केशव चंद्र गोगोई को 3 महीने, 27 फरवरी 1983 को मुख्यमंत्री बने हितेश्वर सैकिया को 2 साल 10 महीने बाद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से महरूम होना पड़ा था।

24 दिसम्बर 1985 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले प्रफुल्ल कुमार महंत को दिसपुर स्थित मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में रहते ही कार्यकाल पूरा होने से पूर्व राष्ट्रपति शासन लगाकर मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया। दूसरी बार जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय विधायक आवास से ही कार्य करते हुए अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया। 30 जून 1991 को दूसरी बार मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले हितेश्वर सैकिया 4 साल 9 महीने तथा 22 अप्रैल 1996 को मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले भूमिधर बर्मन सिर्फ 22 दिन ही मुख्यमंत्री के पद पर कायम रह पाये थे।

इस सीएम ने बनाया रिकार्ड

भूमिधर बर्मन के बाद मुख्यमंत्री बने तरुण गोगोई ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय सरकारी गेस्ट हाऊस में रहकर काम किया और लगातार 3 बार मुख्यमंत्री बनकर राज्य के सर्वाधिक लंबी अवधि तक मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड कायम किया। उनके बाद सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने और उन्होंने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय सरकारी गेस्ट हाऊस से कार्य कर अपना 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा कर लिया।

राजकुमार झाँझरी, वास्तु विशेषज्ञ

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