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Saturday, November 28, 2020

जानिए क्या होता है टाइम कैप्सूल जिसे अयोध्या में रामजन्मभूमि के नीचे रखा जायेगा

नई दिल्ली: अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल (Time capsule) रखा जायेगा। इस बात के सामने आने के बाद से हर तरफ टाइम कैप्सूल की चर्चा होने लगी है। हर कोई इस डिवाइस के बारे में जानने को उत्सुक है कि आखिर यह होता क्या है और इसे लगाए जाने के पिठे क्या मकशद है।

टाइम कैप्सूल या काल पात्र एक ऐसी डिवाइस होती है, जिसकी मदद से वर्तमान दुनिया से जुड़ी जानकारियों को भविष्य या दूसरी दुनिया में भेजा जा सकता है। इसे दफनाने का मकसद किसी समाज, काल या देश के इतिहास को सुरक्षित रखना होता है। यह एक तरह से भविष्य के लोगों के साथ संवाद है। इससे भविष्य की पीढ़ी को किसी खास युग, समाज और देश के बारे में जानने में मदद मिलती है।

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बर्गोस में मिला था 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल

स्पेन के बर्गोस में 30 नवंबर, 2017 में करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल (Time capsule) मिला। यह यीशू मसीह के मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के अंदर एक दस्तावेज था। इसमें 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सूचना थी। फिलहाल इसे ही सबसे पुराना टाइम कैप्सूल माना जा रहा है। इसके बाद फिलहाल ऐसा कोई टाइम कैप्सूल नहीं मिला है। वर्तमान समय में करीब 20 देशों ने विभिन्न स्थानों पर टाइम कैप्सूल को दबाया है।

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भविष्य में जब कोई भी इतिहास देखना चाहेगा तो श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के इतिहास के साथ यह तथ्य भी निकल कर आएगा। इससे कोई भी विवाद जन्म ही नहीं लेगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने एक न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान इस तथ्य की पुष्टि की है और बताया कि राम मंदिर निर्माण स्थल पर जमीन में लगभग 200 फुट नीचे एक टाइम कैप्सूल रखा जाएगा।

​टाइम कैप्सूल होता क्या है?

Time capsule एक कंटेनर की तरह होता है जिसे विशिष्ट सामग्री से बनाया जाता है। टाइम कैप्सूल हर तरह के मौसम का सामना करने में सक्षम होता है। इसे जमीन के अंदर काफी गहराई में दबाया है। काफी गहराई में होने के बावजूद भी हजारों साल तक न तो उसको कोई नुकसान पहुंचता है और न ही वह सड़ता-गलता है।

राम मंदिर निर्माण स्थल पर लगाया जाने वाला Time capsule को तांबे से बनाया जा रहा है और इसकी लंबाई करीब तीन फुट होगी। इस कॉपर की विशेषता यह है कि सैकड़ों हजारों साल बाद भी इसे जब जमीन से निकाला जाएगा तो इसमें मौजूद सभी दस्तावेज पूरी तरह से सुरक्षित होंगे।

इंदिरा गांधी ने रखा था पहला टाइम कैप्सूल

ऐसा नहीं है कि किसी जगह पर Time capsule पहली बार रखा जा रहा है। इससे पहले भी देश में  अलग-अलग जगहों पर टाइम कैप्सूल रखे जा चुके हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1972 में रेड फोर्ट कॉम्प्लेक्स के एक गेट के बाहर 32 फुट नीचे रखा था। इस कैप्सूल को कालपत्र नाम दिया था। राजनीतिक विरोध के बाद स्वतंत्रता के बाद से 15 अगस्त 1972 तक के भारत का इतिहास दर्ज किया गया था। इस टाइम कैप्सूल को एक हजार साल बाद खोले जाने का लक्ष्य रखा गया था।

IIT कानपुर ने भी स्वर्ण जयंती पर पिछले 50 साल के इतिहास सहेजने के लिए तीन फुट लंबे Time capsule का निर्माण करवाया था। इस कैप्सूल को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल 6 मार्च 2010 में जमीन के नीचे रखा था। इस टाइम कैप्सूल में आईआईटी में अब तक के सभी रिसर्च, अनुसंधान, शिक्षकों एवं फैकल्टी के बारे में सारी जानकारी सुरक्षित रखी गई हैं। यदि कभी यह दुनिया तबाह भी हो जाए तो आईआईटी कानपुर का इतिहास सुरक्षित रह सके।

विवादों से भी रहा है नाता

गुजरात राज्य के गोल्डन जुबली समारोह के दौरान 2010 को गांधीनगर में प्रदेश के इतिहास को लेकर एक Time capsule महात्मा मंदिर के नीचे रखा गया था। वर्तमान प्रधानमंत्री और तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्ष ने आरोप लगाया था कि टाइम कैप्सूल में मोदी ने अपनी उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान किया है।

इसी प्रकार इंदिरा गांधी सरकार के बाद आने वाली जनता पार्टी की सरकार ने 1977 में इस टाइम कैप्सूल को जमीन से खोदकर निकाल लिया था। इस आइम कैप्सूल के कंटेन्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया और यह नष्ट हो गया।

संस्थानों ने भी रखे हैं टाइम कैप्सूल

दक्षिण मुंबई के फोर्ट में स्थि​त अलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन नामक स्कूल ने 2014 में एक समय कैप्सूल दबाया था। इस कैप्सूल को खोलने के लिए 1 सितंबर 2062 का समय निर्धारित किया गया है। इस साल स्कूल के दो सौ सल पूरे होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में इंडियन नेशनल कांग्रेस के दूसरे दिन 4 जनवरी 2019 को पंजाब के जालंधर में स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के परिसर में एक टाइम-कैप्सूल दफन किया गया था।

इसके अलावा कानपुर के ही चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में भी Time capsule रखा गया है। इसमें भी कृषि विश्वविद्यालय के इतिहास से संबंधित तमाम तरह की जानकारियों को सहेजकर उसे जमीन के नीचे रखा गया है। अब तक देश में लगभग आधा दर्जन जगहों पर इस तरह के टाइम कैप्सूल पहले भी रखे जा चुके हैं।

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