Friday, September 18, 2026

सावधान! कहीं आपको नंगा न कर दे AI, हरिद्वार के वायरल वीडियो ने दिखाया डिजिटल धोखे का खतरनाक चेहरा

हरिद्वार के हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान करती एक महिला का आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने वीडियो को सच मानकर महिला के पहनावे और आचरण पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। लेकिन फैक्ट-चेक में सामने आया कि वायरल वीडियो असली नहीं था। मूल वीडियो में महिला सलवार-कमीज में गंगा स्नान कर रही थी, जबकि वायरल क्लिप में उसके कपड़ों के साथ डिजिटल/AI तकनीक से छेड़छाड़ की गई थी। यह मामला सिर्फ एक फर्जी वीडियो का नहीं, बल्कि उस खतरे का संकेत है जिसमें AI किसी इंसान की डिजिटल पहचान बदलकर समाज की धारणा भी बदल सकता है।

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अभय वाणीः आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने हमारी जिंदगी को आसान बनाने के साथ-साथ एक ऐसी दुनिया भी तैयार कर दी है, जहां तस्वीर और वीडियो देखकर यह तय करना हमेशा आसान नहीं रह गया कि जो दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में हुआ भी था या नहीं। हरिद्वार का हालिया मामला इसका बेहद गंभीर उदाहरण है।

सोशल मीडिया पर एक छोटा वीडियो तेजी से वायरल हुआ। दावा किया गया कि हरिद्वार की हरकी पैड़ी पर एक महिला बेहद कम कपड़ों में गंगा स्नान कर रही है। वीडियो सामने आते ही धार्मिक आस्था, मर्यादा और महिला के चरित्र तक पर टिप्पणियां शुरू हो गईं। कई लोगों ने बिना वीडियो की सत्यता जांचे इसे आगे शेयर किया। फिर जांच हुई तो कहानी ही बदल गई।

असली वीडियो में क्या था?

फैक्ट-चेक में सामने आया कि वायरल वीडियो उसी स्थान के एक वास्तविक वीडियो से तैयार किया गया था। मूल फुटेज में महिला सलवार-कमीज पहने गंगा में स्नान करती दिखाई दे रही थी। पृष्ठभूमि, घाट की रेलिंग, आसपास मौजूद लोग और महिला की गतिविधियों में समानता ने दोनों वीडियो के संबंध को स्पष्ट किया।

महिला की पहचान सोनम यादव के रूप में हुई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर सामने आकर दावा किया कि उनके मूल वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर उसे आपत्तिजनक रूप दिया गया और फिर वायरल किया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इस मामले में शिकायत भी की है और वीडियो को साझा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। यानी जिस वीडियो को देखकर लोग महिला के व्यवहार पर सवाल उठा रहे थे, उसकी बुनियाद ही गलत निकली।

AI ने सिर्फ कपड़े नहीं बदले, कहानी बदल दी

यही इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है। तकनीक ने केवल किसी महिला के कपड़े बदलने जैसी डिजिटल छेड़छाड़ नहीं की। इस बदलाव ने पूरे वीडियो का अर्थ बदल दिया।

एक तरफ मूल वीडियो था—गंगा में स्नान करती महिला। दूसरी तरफ उसी दृश्य का बदला हुआ संस्करण था—ऐसा वीडियो जिसे देखकर दर्शक महिला के चरित्र, पहनावे और धार्मिक स्थल की मर्यादा के बारे में अलग निष्कर्ष निकाल सकता था। यानी AI ने पहले तस्वीर बदली और फिर तस्वीर देखकर लोगों की राय बदल गई। यही डीपफेक और AI-मैनिपुलेशन का सबसे बड़ा खतरा है।

क्या यह पूरी तरह AI-generated वीडियो था?

यहां पत्रकारिता में सावधानी जरूरी है।  BOOM और विश्वास न्यूज की जांच में वायरल वीडियो में AI आधारित छेड़छाड़ के संकेत मिले और इसे AI-edited बताया गया। BOOM ने अपने परीक्षण में AI-generated elements की संभावना भी दर्ज की।

लेकिन Alt News की जांच में Hive Moderation के AI detection test ने वीडियो को AI-generated नहीं बताया। इसका मतलब यह है कि केवल किसी एक AI detector के नतीजे से यह तय नहीं किया जा सकता कि पूरा वीडियो AI से बनाया गया था।

इसलिए तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि वायरल वीडियो में डिजिटल छेड़छाड़ हुई थी और मूल वीडियो के कपड़ों को बदलकर महिला को आपत्तिजनक रूप में दिखाया गया। इस छेड़छाड़ में AI की भूमिका की पुष्टि कुछ फैक्ट-चेक में हुई है, जबकि अलग-अलग तकनीकी डिटेक्शन टूल के परिणाम एक जैसे नहीं हैं।

महाकुंभ से हरिद्वार तक—खतरा नया नहीं

AI के जरिए वास्तविक लोगों की तस्वीर और वीडियो में छेड़छाड़ का खतरा पहले भी सामने आता रहा है। 2025 के प्रयागराज महाकुंभ के दौरान भी सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें वास्तविक लोगों के चेहरों या दृश्यों को बदलकर उन्हें ऐसे संदर्भों में दिखाया गया, जिनका वास्तविक घटना से संबंध नहीं था।

मोनालिसा भोंसले और हर्षा रिछारिया से जुड़े वायरल वीडियो के फैक्ट-चेक ने भी यह दिखाया कि किसी वास्तविक व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को डिजिटल तकनीक की मदद से बदलकर बिल्कुल अलग कहानी बनाई जा सकती है।

फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ऐसी तकनीक सीमित विशेषज्ञों के हाथ में थी। अब AI टूल्स के कारण यह क्षमता कहीं अधिक व्यापक हो गई है।

आज आपकी एक तस्वीर भी पर्याप्त हो सकती है

सबसे बड़ा सवाल है—क्या यह खतरा केवल सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स या चर्चित लोगों तक सीमित है? जवाब है—नहीं। सोशल मीडिया पर आपकी सार्वजनिक तस्वीरें, वीडियो और प्रोफाइल कंटेंट किसी के लिए डिजिटल सामग्री बन सकते हैं। किसी तस्वीर से चेहरा लिया जा सकता है, किसी वीडियो से शरीर की गतिविधि और किसी दूसरी सामग्री से आवाज।

नतीजा ऐसा वीडियो हो सकता है जिसमें व्यक्ति कभी मौजूद ही नहीं था। और सबसे खतरनाक बात यह है कि वीडियो जितना अधिक सनसनीखेज होगा, उसके वायरल होने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।

फर्जी वीडियो से पहले फैलती है अफवाह

AI डीपफेक का असली खतरा केवल तकनीक नहीं है। खतरा उस समय बढ़ता है जब लोग बिना जांच किए उसे सच मान लेते हैं। हरिद्वार के मामले में भी यही हुआ। वीडियो वायरल हुआ, लोगों ने देखा और प्रतिक्रिया शुरू कर दी। लेकिन बहुत कम लोगों ने यह पूछने की कोशिश की कि वीडियो का मूल स्रोत क्या है? क्या उसी दृश्य का कोई पुराना वीडियो मौजूद है? क्या वीडियो की पृष्ठभूमि और गतिविधियां किसी दूसरे फुटेज से मेल खाती हैं?

फैक्ट-चेक सामने आने के बाद तस्वीर बदल गई। इसलिए डिजिटल युग का नया नियम शायद यही होना चाहिए—“जो दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वही सच हो।”

अगर आपका वीडियो या तस्वीर फर्जी तरीके से वायरल हो जाए तो?

ऐसी स्थिति में सबसे पहले घबराने के बजाय प्रमाण सुरक्षित करना जरूरी है। वायरल पोस्ट के स्क्रीनशॉट, URL, अकाउंट का नाम और पोस्ट की तारीख सुरक्षित रखें। संबंधित प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की रिपोर्ट करें और उसे हटाने का अनुरोध करें। जरूरत पड़ने पर साइबर अपराध पोर्टल और पुलिस में शिकायत करें।

और सबसे महत्वपूर्ण—फर्जी वीडियो को खुद आगे शेयर न करें। क्योंकि किसी पीड़ित के खिलाफ बनी आपत्तिजनक सामग्री को “सिर्फ इसलिए” शेयर करना कि लोग जानें कि वह फर्जी है, कई बार उसी सामग्री की पहुंच और बढ़ा देता है।

AI से डरने की नहीं, समझने की जरूरत है

AI दुश्मन नहीं है। यह एक तकनीक है। इसी तकनीक से शिक्षा, चिकित्सा, पत्रकारिता, शोध, डिजाइन और मनोरंजन के क्षेत्र में बड़े बदलाव हो रहे हैं। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक का इस्तेमाल किसी की निजता, प्रतिष्ठा और गरिमा को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।

हरिद्वार का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां AI ने केवल एक वीडियो नहीं बदला। एक वास्तविक दृश्य को बदलकर ऐसी कहानी बनाई गई, जिस पर लोग विश्वास करने लगे।

यही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती है। कल तक सवाल था—“वीडियो असली है या नकली?” अब सवाल इससे भी बड़ा है— “अगर नकली वीडियो असली जैसा दिखने लगे, तो हम सच की पहचान कैसे करेंगे?”

AI के दौर में शायद यही सबसे जरूरी डिजिटल साक्षरता है। क्योंकि तकनीक आपके कपड़े ही नहीं बदल सकती—वह आपकी डिजिटल पहचान, आपकी छवि और आपके बारे में लोगों की धारणा तक बदल सकती है।

और इसलिए अगली बार जब कोई सनसनीखेज वीडियो आपकी स्क्रीन पर आए, तो उसे आगे बढ़ाने से पहले एक पल रुकिए। क्योंकि हो सकता है, वीडियो में जो व्यक्ति दिखाई दे रहा हो, वह वैसा हो ही नहीं—और जो कहानी दिखाई जा रही है, वह कभी हुई ही नहीं।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttps://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।
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