Friday, August 28, 2026

अफसर नहीं सुनते? प्रशांत किशोर की इस तस्वीर ने विधायक-सांसदों को दिखाया आईना

एक विधायक, न सरकार में पद, न बहुमत… फिर चीफ सेक्रेटरी से डीजीपी तक एक ही फ्रेम में क्यों? तस्वीर सिर्फ प्रशांत किशोर की ‘हनक’ नहीं, बिहार की राजनीति के लिए बड़ा सवाल है

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अभय वाणीः बिहार की राजनीति में एक शिकायत बहुत आम है—“अफसर सुनते नहीं हैं।” जनप्रतिनिधि कहते हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, मिलने का समय नहीं देते और उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेते। धीरे-धीरे यह शिकायत इतनी सामान्य हो गई है कि हमने इसे व्यवस्था की सच्चाई मान लिया है। लेकिन क्या वाकई समस्या सिर्फ इतनी ही है? क्या सचमुच अफसरशाही इतनी ताकतवर हो गई है कि वह जनप्रतिनिधियों की बात सुनना ही नहीं चाहती? शायद तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है।

पिछले कुछ दिनों से जनसुराज के सूत्रधार और बांकीपुर से पार्टी के इकलौते विधायक प्रशांत किशोर की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। तस्वीर में प्रशांत किशोर के साथ बिहार के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी दिखाई दे रहे हैं। आमतौर पर बिहार में जब प्रशासनिक तंत्र के इतने बड़े अधिकारी एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं तो सामने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री या सरकार का कोई प्रभावशाली मंत्री होता है। लेकिन यहां तस्वीर का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि सामने न सरकार है, न सत्ता पक्ष की बड़ी संख्या और न कोई मंत्री—सिर्फ एक विधायक है।

यहीं से असली सवाल पैदा होता है। आखिर ऐसा क्या है कि एक विधायक की बात सुनने के लिए प्रदेश की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था के शीर्ष अधिकारी एक साथ बैठ रहे हैं? यह कहना जल्दबाजी होगी कि सिर्फ इस एक तस्वीर से प्रशांत किशोर का प्रशासन पर कोई असाधारण प्रभाव साबित हो गया। लेकिन तस्वीर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करती है—क्या अधिकारी सिर्फ सत्ता की सुनते हैं, या फिर जिस व्यक्ति के पास अपनी बात रखने की क्षमता, तैयारी और राजनीतिक प्रभाव होता है, उसकी बात को भी व्यवस्था गंभीरता से लेती है?

कुर्सी अधिकार देती है, असर नहीं

यही वह बात है जिसे बिहार के जनप्रतिनिधियों को समझने की जरूरत है। विधायक होना जनता का विश्वास और संवैधानिक अधिकार जरूर है, लेकिन सिर्फ विधायक बन जाने से किसी व्यक्ति की हर बात प्रभावशाली नहीं हो जाती। कुर्सी आपको अधिकार देती है, लेकिन असर आपकी क्षमता पैदा करती है। अधिकारी नियम, कानून, आंकड़ों, फाइलों और जवाबदेही के दायरे में काम करते हैं। ऐसे में यदि कोई जनप्रतिनिधि सिर्फ यह कहने पहुंचता है कि “मेरे क्षेत्र में समस्या है”, तो अधिकारी समस्या सुन सकते हैं। लेकिन यदि वह समस्या के साथ तथ्य, आंकड़े, जिम्मेदारी और समाधान का रास्ता लेकर पहुंचे, तो बातचीत का स्तर बदल जाता है।

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यहीं से सिर्फ विधायक होने और प्रभावशाली जनप्रतिनिधि होने के बीच फर्क सामने आता है। जनता की आवाज विधानसभा तक पहुंचाना जिम्मेदारी है, लेकिन उस आवाज को प्रशासनिक निर्णय तक पहुंचाने के लिए तैयारी, अध्ययन, संवाद की क्षमता और मुद्दे पर लगातार खड़े रहने का साहस भी चाहिए। जो जनप्रतिनिधि सवाल को सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि तथ्य और तर्क के साथ प्रशासन के सामने रखता है, उसकी बात को नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।

अफसरशाही को दोष देना सबसे आसान रास्ता है

यह कहना गलत होगा कि बिहार में अफसरशाही की कोई समस्या नहीं है। अधिकारियों की कार्यशैली, संवादहीनता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन हर समस्या के लिए अफसरों को जिम्मेदार ठहरा देना भी जनप्रतिनिधियों की अपनी जिम्मेदारी से बचने का आसान रास्ता है। आखिर किसी अधिकारी से यह कहना कि “आप हमारी बात नहीं सुनते” आसान है, लेकिन खुद से यह पूछना मुश्किल है कि “मेरी बात में ऐसा क्या है जिसे अधिकारी गंभीरता से लें?”

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अब समय है कि जनप्रतिनिधि भी अपने भीतर झांकें। आत्ममंथन करें और खुद से पूछें—आखिर अफसर हमारी बात क्यों नहीं सुनते? क्या वाकई समस्या सिर्फ अफसरशाही की है, या हमारी अपनी क्षमता, तैयारी, काबिलियत और राजनीतिक प्रभाव में भी कोई कमी है? क्या हम अपने क्षेत्र की समस्याओं को उतनी गहराई से जानते हैं, जितना एक जनप्रतिनिधि को जानना चाहिए? क्या हमारे पास अधिकारियों के सामने रखने के लिए तथ्य हैं? दूसरों पर उंगली उठाना आसान है, लेकिन अपनी राजनीतिक हैसियत और उपयोगिता को परखना कहीं ज्यादा जरूरी है।

पीके के लिए भी यह उपलब्धि नहीं, परीक्षा की शुरुआत है

यहां प्रशांत किशोर को महिमामंडित करने की जरूरत नहीं है। चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी के साथ तस्वीर आ जाना अपने आप में किसी जनप्रतिनिधि की सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। लोकतंत्र में अधिकारियों का निर्वाचित प्रतिनिधियों से मिलना व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन इस तस्वीर की राजनीतिक अहमियत इसलिए है कि यह उस धारणा पर सवाल खड़ा करती है कि प्रभाव का मतलब केवल सत्ता और संख्या है।

प्रशांत किशोर के पास सरकार नहीं है, विधायकों की बड़ी संख्या नहीं है, फिर भी यदि प्रदेश के शीर्ष अधिकारी उनके साथ बैठकर मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं तो कम से कम इतना जरूर है कि उन्होंने संवाद की एक जगह बनाई है। लेकिन अब असली कसौटी तस्वीर नहीं, नतीजा होगा। बैठक में जिन समस्याओं पर चर्चा हुई, क्या उनका समाधान जमीन पर दिखाई देगा? क्या ट्रैफिक सुधरेगा, पेयजल की समस्या दूर होगी, नशे के खिलाफ कार्रवाई होगी और सड़क-नाली जैसी समस्याओं में बदलाव आएगा? क्योंकि तस्वीर से राजनीति बन सकती है, लेकिन काम से विश्वसनीयता बनती है।

बिहार के जनप्रतिनिधियों के लिए एक आईना

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ प्रशांत किशोर बनाम बाकी नेताओं के रूप में देखना सबसे सतही निष्कर्ष होगा। असली सवाल बिहार के हर जनप्रतिनिधि से है। आपके पास विधायकों की बड़ी संख्या हो, मंत्री का पद हो या पार्टी का मजबूत संगठन—अगर जनता की समस्या लेकर अधिकारियों के सामने जाने के बाद भी आपकी बात प्रभाव पैदा नहीं कर पा रही है, तो केवल अफसरशाही को दोष देने से बात नहीं बनेगी।

राजनीति में प्रभाव हमेशा संख्या से पैदा नहीं होता। कई बार एक आवाज बहुमत से बड़ी बहस खड़ी कर देती है। जनता अब सिर्फ यह नहीं देखती कि उसका विधायक किसके साथ खड़ा है; वह यह भी देखती है कि उसके सवाल पर कौन खड़ा होता है और कितनी मजबूती से खड़ा होता है। यही किसी जनप्रतिनिधि की वास्तविक राजनीतिक ताकत का पैमाना होना चाहिए।

इसलिए प्रशांत किशोर की यह तस्वीर सिर्फ प्रशांत किशोर की तस्वीर नहीं है। यह बिहार के उन तमाम जनप्रतिनिधियों के सामने रखा हुआ एक आईना है, जो वर्षों से कहते आ रहे हैं कि “अफसर हमारी बात नहीं सुनते।”

सवाल सीधा है—अगर एक विधायक अधिकारियों को बैठाकर अपनी बात रख सकता है, तो बाकी जनप्रतिनिधियों की आवाज क्यों नहीं सुनी जाती? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या सचमुच समस्या सिर्फ अफसरशाही में है, या फिर जनप्रतिनिधियों को अपनी तैयारी, क्षमता और काबिलियत पर भी सवाल उठाने की जरूरत है? क्योंकि लोकतंत्र में संख्या ताकत देती है, पद अधिकार देता है और सत्ता संसाधन देती है—लेकिन काबिलियत आपकी बात में असर पैदा करती है। अफसरशाही को कोसना आसान है, उसे अपनी बात सुनने पर मजबूर करना मुश्किल।

और अंततः राजनीति का असली मूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि आपके पास कितने विधायक हैं, बल्कि इससे होना चाहिए कि आपकी बात से कितने लोगों की जिंदगी बदल रही है। कुर्सी जनता दे सकती है, लेकिन उस कुर्सी को प्रभाव में बदलने की काबिलियत जनप्रतिनिधि को खुद पैदा करनी पड़ती है।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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