कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीरी कविता का इतिहास अधूरा- रहमान राही

न्यूज़ डेस्क
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नई दिल्ली: कश्मीरी काव्य को विश्व स्तरीय साहित्य बताने वाले कश्मीरी भाषा के कवि, आलोचक और अनुवादक डॉ. रहमान राही का कहना है कि कश्मीर से विस्थापित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे कश्मीरी पंडितों के योगदान के बिना कश्मीरी कविता का इतिहास अधूरा है।

राही साहब ने बातचीत में बताया, “कश्मीर से विस्थापित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में बस गये कश्मीरी पंडितों के योगदान का उल्लेख किए बिना समकालीन कश्मीरी कविता का इतिहास अधूरा रह जायेगा।”

2004 में ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले कश्मीरी लेखक राही ने कहा, “कश्मीर के बाहर रहकर रचना कर रहे कश्मीरी पंडित नये अध्याय का सृजन कर रहे हैं और समकालीन कश्मीरी कवियों की रचनाओं में अपनी जमीन से बिछड़ने की पीड़ा झलकती है। इन कवियों ने अपनी रचनाओं में वादी से बिछोह की भावना का इजहार किया है औद वादी छोड़ने का दर्द इनकी कविताओं में साफ दिखाई देता है।”

उन्होंने कहा, “कश्मीर के बाहर रहकर समकालीन कश्मीरी भाषा के साहित्य को समृद्ध करने वाले लेखकों में प्रेमनाथ साद, अजरूनदेव मजबूर, सुनीता पंडित, बृजनाथ बेताब और रविन्दर रवि जैसे कुछ नाम प्रमुख है। इनके बिना समकालीन कश्मीरी भाषा का इतिहास ही अधूरा रह जायेगा।”

उन्होंने कहा, “कश्मीर से बाहर रहकर कश्मीरी भाषा की सेवा करने वालों की रचनाओं में पुरानी यादों की झलक दिखाई देती है। इसमें वादियों में सुकून के दिनों में हिन्दू मुस्लिम एकता का जिक्र भी किया गया है।”

राही साहब बताते हैं, “इन कवियों ने अपने बचपन के दिनों को अपनी कविताओं में खास स्थान दिया है। कश्मीरी पंडितों द्वारा लिखी जा रही कश्मीरी भाषा की कविताओं और गद्य में मातृभूमि वापस लौटने की ललक दिखाई देती है।”

वह कहते हैं, “दूसरी तरफ वादी में रहकर कश्मीरी भाषा में काव्य का सृजन कर रहे कवियों ने कश्मीर के वर्तमान हालत को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है और घाटी में फैली अशांति के बीच लोगों की पीड़ा को दर्शाया है।”

उन्होंने कहा, “वादी के कवि सुरक्षा बलों और आतंकवाद के बीच पिस रहे एक आम आदमी के दर्द को जुबां दे रहे है। वर्तमान समय में कश्मीरी भाषा में विश्व स्तरीय साहित्य लिखा जा रहा है।”

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