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Friday, March 1, 2024
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सरकार का रूख साहित्य विरोधी- वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत

साहित्य को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार के भरोसे ना रहें। पढ़िए समूह संपादक दीपक सेन से लेखक अमरकांत की 21 दिसंबर 2011 को गयी बातचीत के मुख्य अंश।

नई दिल्ली: वर्ष 2009 के 45वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए श्री लाल शुक्ल के साथ संयुक्त विजेता वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत का कहना है कि सरकारों का रूख साहित्य विरोधी है। इसलिए साहित्य को युवाओं में लोकप्रिय बनाने के लिए साहित्य प्रेमी पाठकों और साहित्यकारों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

अमरकांत जी ने इलाहाबाद स्थित अपने आवास पर निजी मुलाकात में कहा था, “कभी कोई लेखक पुरस्कार के बारे में साहित्य सृजन नहीं करता। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे कोई सम्मान मिलेगा और ज्ञानपीठ के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात है।”

अमरकांत के अनुसार, “देश में सरकार की तरफ से साहित्य को बढ़ावा देने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया जाता है। कुल मिलाकर सरकारों का रूख साहित्य विरोधी है और शायद यह एक बड़ा कारण है कि पत्र पत्रिकाओं में साहित्य के लिए स्थान खत्म होता जा रहा है।”

उन्होंने कहा, “ऐसे वक्त में समाज में साहित्य के प्रति रूझान पैदा करने के लिए साहित्यकारों आौर पाठकों को मिलकर प्रयास करना चाहिए और सत्तासीन लोगों से किसी प्रकार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय और पाठक समूह बनाने चाहिए ताकि लोग साहित्य से जुड़ सकें।”

12 उपन्यास, 11 कहानी संग्रह, संस्मरण और बाल सहित्य के लेखक ने अपनी प्रिय रचना के बारे में पूछने पर कहा, “मेरा मानना है कि यह काम लेखक का नहीं है बल्कि आलोचक और पाठकों का है। कोई लेखक पाठकों की पसंद और नापसंद से ही बड़ा साहित्यकार बनता है।”

मनोरमा के पूर्व संपादक अमरकांत बताते है, “मेरे पास अक्सर पाठकों के पत्र आते हैं और कुछ पाठक तो साहित्य मर्मज्ञ की तरह अपने विचार लिखते हैं। पाठकों के अलावा राम विलास शर्मा जैसे साहित्य के शिखर पुरूषों के विचारों ने मेरे रचनाकर्म को निखारने का काम किया।”

वह कहते हैं, “श्रीलाल शुक्ल मेरे मित्र और बेहद करीबी हैं। मुझे खुशी है कि ज्ञानपीठ ने दो दोस्तों को एक साथ देश सर्वोच्च साहित्य सम्मान देने का निर्णय किया।”

बहरहाल, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत दोनों उत्तर प्रदेश के निवासी हैं और हिन्दी की साहित्य विधा के चर्चित नामों शुमार होते हैं। अमरकांत की ‘जिंदगी और जोंक’, ‘सूखा पत्ता’ और ‘बीच की दीवार’ चर्चित रचनायें हैं।

उन्होंने कहा, “हाईस्कूल में अध्ययन के दौरान मैं सोचता था कि एक दिन मैं शरतचंद्र की भांति साहित्य लेखन करूंगा और मेरा मानना है कि आज के युवा भी बड़े साहित्यकारों विभिन्न भाषाओं में साहित्य सृजन के बारे में सोचते होंगे। युवा केवल साहित्य ही नहीं बल्कि राजनीति, खेल और कला सहित कई क्षेत्रों में बेहतर करने की काबलियत रखते हैं और कई युवा कर भी रहे हैं।”