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Saturday, February 27, 2021

भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य का अभाव चिंता का विषय- महाश्वेता देवी

बाल साहित्य की उपेक्षा के कारण बच्चे हैरी पॉटर की ओर भागे। पढ़िए बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी से समूह संपादक दीपक सेन के साथ 5 अगस्त 2007 की मुलाकात का अंश।

नई दिल्ली: बांग्ला साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर महाश्वेता देवी का कहना था कि भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य संबंधी रूचिकर सामग्री के अभाव गंभीर चिंता का विषय है। और देश में बाल साहित्य की उपेक्षा के कारण ही हमारे बच्चे हैरी पॉटर की ओर भाग रहे हैं।

महाश्वेता देवी ने एक मुलाकात में कहा था कि आज हमारे बच्चे हैरी पॉटर के पीछे भाग रहे हैं। ऐसे में हमें अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि देश की सरकार और भारतीय भाषाओं के कर्ताधर्ताओं ने बाल साहित्य किस हद तक उपेक्षा की है।

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भारतीय भाषाओं का समुचित प्रसार नहीं

महाश्वेता जी ने कहा, “आजादी के बाद भारतीय भाषाओं के प्रचार प्रसार पर समुचित कार्य नहीं हो पाया। जितना होना चाहिए था। भारतीय भाषाओं के साहित्य में रचनात्मक साहित्य का घोर अभाव है। जहां तक भाषा की बात है तो उर्दू एक समृद्ध भाषा है। नयी पीढी को चाहिए कि वह आजादी के दौर को जानने के लिए गालिब, फिराक और इकबाल जैसे शायरों को पढ़े।”

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महाश्वेता देवी ने कहा, “केवल भारतीय भाषाओं में साहित्य सृजन की बात नहीं है। यदि देखा जाये तो विश्वविद्यालय स्तर पर शोध कार्य का घोर अभाव है। हर भाषा मेंं शोध कार्य और लेखन समानान्तर रूप से होना चाहिए। इससे भाषा का विकास होता है।

संथाल भाषा का साहित्य समृद्ध

महाश्वेता जी के अनुसार, इसके अलावा लोक साहित्य बुरी तरह अनदेखी का शिकार हुआ है। वह पूरे लोकजीवन की धडकन होता है। मैं देखती हूं कि संथाल भाषा का साहित्य काफी समृद्ध है। मगर वह केवल बांग्ला लिपि में लिखा जाता है। यदि उसे ओडिया और देवनागरी में भी लिखा जाये तो इससे यह दोनों भाषायें का भी विकास होगा।”

उन्होंने कहा, “लोगों की पढने की आदत छूटती जा रही है। पहले लाइब्रेरी हुआ करती थी। जहां हम बेहतर किताबों से रूबरू होते थे। मगर वक्त के साथ पुस्तकालय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान मिडिल क्लास को हो रहा है। जिनके लिए महंगी पुस्तके दुरूह हैं। इसके लिए पुस्तकालय आंदोलन चलाने की जरूरत है। इससे किताबें आम आदमी तक पहुंच सके।”

विदेशों में हिन्दी का सम्मेलन?

विश्व हिन्दी सम्मेलन पर वह सवाल करती हैं, “विदेशों में हिन्दी का सम्मेलन क्यों? क्या इसको आयोजित करने से देश में हिन्दी का प्रचार प्रसार हो जायेगा? भारत के हर राज्य में हिन्दी सम्मेलन क्यों नहीं होता?

उन्होंने कहा, इसके अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी संगोष्ठियां आयोजित की जानी चाहिए। इससे देश की जनता को अपनी सभ्यता के बारे में जानने का मौका मिलेगा। उदाहरण हमारे देश में है, केरल में आयी जागृति के पीछे मलयालम भाषा के विकास बहुत बड़ा हाथ है।”

हजार चौरासी की मां

ज्ञानपीठ और मैगसेसै पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी पहचान सत्तर के दशक के आरंभ में उभरे नक्सलबाडी आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास ‘हजार चौरासी की मां‘ के लिए है।

उन्होंने कहा, “साहित्य और फिल्में रचनात्मकता की दो अलग अलग विधायें है। जिस किताब को भी आधार बनाकर फिल्म बनायी गयी, वे सभी बहुत प्रसिद्ध किताबें हैं। महाश्वेता जी ‘जंगल के दावेदार‘ को अपना सबसे बेहतरीन उपन्यास बताती थीं।”

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