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Friday, February 26, 2021

COVID-19 की जाँच के लिए पुणे स्थित स्टार्टअप तैयार कर रहा रैपिड डायग्नोस्टिक किट

नई दिल्लीः फास्ट सेन्स डायग्नोस्टिक्स के नाम से 2018 में शुरु हुआ एक स्टार्टअप अब कोविड-19 संक्रमण का पता लगाने के लिए दो मॉड्यूल विकसित कर रहा है। यह तकनीक कम लागत में तेजी और सटीकता के साथ कोविड-19 की स्क्रीनिंग में मददगार होगी। कंपनी ने कोव ई-सेंस के लिए पेंटेट का आवेदन भी किया है।

PCR के जरिए एक घंटे में  किया जा सकता है लगभग 50 नमूनों का परीक्षण

संक्रमण की जांच के लिए कंपनी दो तरह के उत्पाद बाजार में लाने की योजना बना रही है। इनमें से एक संशोधित पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (PCR) आधारित किट है, जबकि दूसरा पोर्टेबल चिप आधारित मॉड्यूल है। PCR के जरिए लगभग 50 नमूनों का एक घंटे में परीक्षण किया जा सकता है। जबकि पोर्टेबल चिप आधारित मॉड्यूल से लक्षित अबादी में कोरोना संक्रमण की जांच चिप सेंसिंग तकनीक के माध्यम से प्रति नमूना 15 मिनट में की जा सकती है। भविष्य में इसे 100 नमूने प्रति घंटे तक बढ़ाया जा सकता है।

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किट के इस्तेमाल के लिए किसी खास प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं

इसके अलावें फास्ट सेंस डाइग्नोस्टिक्स तकनीक के इस्तेमाल के लिए किसी तरह के खास प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में यह तकनीक कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में भारत में संक्रमण जांच के प्रयासों को और सशक्त बनाने में मददगार हो सकती है।

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एक घंटे से भी कम समय में प्राप्त किया जा सकता है डेटा

जांच की इन दोनों तकनीक का इस्तेमाल हवाई अड्डों, आबादी वाले क्षेत्रों और अस्पतालों जैसे संक्रमण के ज्यादा खतरे वाले स्थानों में आसानी से किया जा सकता है। इनके माध्यम से ऐसे स्थानों में स्वस्थ व्यक्तियों में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए बड़ी आबादी की स्क्रीनिंग की जा सकती है। इसका डेटा एक घंटे से भी कम समय में प्राप्त किया जा सकता है।

भविष्य में संक्रमण के दोहराव को रोकने में मददगार हो सकता है यह किट

इसके अतिरिक्ति कोविड महामारी के इस दौर में संक्रमण के फैलाव को रोकने के साथ यह किट नियमित निगरानी के माध्यम से भविष्य में महामारी के दोहराव को रोकने में भी मददगार होगी। कम लागत वाली और इस्तेमाल में आसान ये तकनीक ग्रामीण आबादी तक आसानी से मदद पहुंचाने और शहरों के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर बोझ कम करने में मदद कर सकती है। कंपनी इस तकनीक को और किफायती बनाने पर काम कर रही है।

इस पर काम कर रही टीम पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान के साथ सहयोग करने की भी योजना बना रही है, जिसके लिए प्रदर्शन के आधार पर इन्हें अनुमोदन दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। यह टीम अपने उत्पादों का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने के लिए बाजार में मौजूद कई कंपनियों के साथ भी संपर्क में है।

इस टीम में विषाणु विज्ञान, आणविक जीव विज्ञान और जैव सूचना प्रणाली के विशेषज्ञ शामिल हैं जो 8 से 10 सप्ताह में इसका प्रोटोटाइप तैयार कर सकते हैं। कंपनी के पास इस जांच तकनीक के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए इनका उत्पादन बढ़ाने के लिए घरेलू स्तर पर सुविधाएं भी हैं।

इस बारे में DST के सचिव आशुतोष शर्मा ने कहा कि कोविड का पता लगाने की जांच के समक्ष सेवा की उपलब्धता वाले स्थान पर कम खर्च के साथ तेजी और सटीकता के साथ काम करने की प्रमुख चुनौती है। इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कई स्टार्टअप्स ने रचनात्मक और अभिनव तरीके विकसित किए हैं। DST इनमें से सबसे क्षमता वाले स्टार्टअप को पूरी मदद दे रहा है ताकि तकनीक के आधार पर उपयुक्त पाए जाने वाले ऐसे स्टार्टअप की व्यावसायीकरण श्रृंखला को सुविधाजनक बनाया जा सके।

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