Wednesday, July 29, 2026

स्टूडेंट्स के मानसिक स्वास्थ्य और बर्न आउट को सुधार सकता है मेडिटेशन!

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नई दिल्ली: भारत में योग और ध्यान की सनातन संस्कृति रही है। अनंत काल से ही गुरु अपने शिष्यों को योग और ध्यान का संपूर्ण ज्ञान देते आये हैं। आधुनिक युग में शिक्षा का भार बढ़़ने से स्टूडेंट्स का मानसिक संतुलन बनाये रखने और बर्न आउट से बचाने में भी योग और ध्यान का प्राचीन ज्ञान कारगर साबित हो सकता है। योग और ध्यान की सनातन संस्कृति छात्र और छात्राओं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिए पहले से ही तैयार कर सकती है। ऐसा ज्ञान संभवतः वर्तमान दौर में विश्व की किसी भी शिक्षा प्रणाली में नही पाया जाता है।

पहले भारत में शिक्षा का केंद्र हमेशा शिक्षक रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से शिक्षा का केंद्र स्टूडेंट बन गए हैं। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 के परिणाम स्वरुप बच्चों की मानसिक स्थिति, रूचि और अन्य योग्यताओं को आधार बनाकर सिलेबस तैयार करने का कार्य किया जा रहा है।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा था कि स्टूडेंट का सिलेबस फ्लेक्सिबल होगा, ताकि स्टूडेंट को अपने सीखने की गति और विषयों को चुनने का बेहतर अवसर प्राप्त हो। इस तरह जीवन में प्रतिभा और रुचि के अनुरूप छात्र और छात्रा अपने रास्ते चुन सकेंगे। नई शिक्षा नीति में कला, विज्ञान, वाणिज्य, व्यावसायिक और शैक्षणिक धाराओं आदि के बीच में कोई भेद नहीं होगा। सहज शब्दों में कहा जाये तो नई शिक्षा नीति काफी हद तक पश्चिमी देशों के लिबरल एजुकेशन की तरह ही होगी। ऐसे में वाईओआई द्वारा तैयार स्टूडेट्स के मानसिक स्वास्थ्य और बर्नआउट रोकथाम संबंधी प्रोटोकॉल का महत्व काफी बढ़ जाता है।

ध्यान या मेडिटेशन के अभ्यास से वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हुआ है कि डिप्रेशन, अनिद्रा और एंजाइटी में 80 प्रतिशत तक सुधार होता है और जीवन की गुणवत्ता 77 फीसदी तक बढ़ जाती है।

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“शिक्षा का उद्देश्य छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक बनाये रखना भी है, क्योंकि अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के बगैर बच्चों की योग्यताओं का उचित विकास संभव नहीं है। यदि बच्चों के अंतर्मन में भय, चिन्ता, निराशा तथा अन्य मानसिक संबंधी तनावों का विकास हो जाता है तो देखा जाता है कि उनका मन पढ़ने में नहीं लगता और ऐसे बच्चे किसी भी नयी चीज को सीखने में पारंगत नहीं हो पाते हैं।”

बच्चे के साथ घर पर माता पिता एवं अन्य परिजनों का व्यवहार, बच्चे के अंतर्मन में उच्च आदर्श, परिवार में होने वाले तनाव, किसी कारण से परिवार का टूटना, निर्धनता, घर का उचित अनुशासन का अभाव, स्कूलों के वातावरण का प्रभाव, अध्यापक का बच्चे के साथ व्यवहार, विद्यालय का वातावरण, अभिव्यक्ति के अवसर न मिल पाना और परीक्षा प्रणाली का भी स्टूडेंट के मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

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भारत में युवाओं की संख्या अधिक है, ऐसे में युवा भारत का वर्तमान और भविष्य है और स्वस्थ युवा ही स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करेंगे। छात्र और छात्राओं को को स्ट्रेस, एंजाइटी, डिप्रेशन से निपटने की आवश्यकता होती है ताकि वे अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें और अध्ययन के दौरान अपनी पूरी क्षमता से प्रदर्शन कर सकें।

योग बच्चों को उनकी वास्तविक संभावित क्षमताओं को सबके सामने लाने में मदद करेगा और यह बच्चों को आत्मविश्वास प्रदान करेगा। साथ ही जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत व्यक्तित्व बनाने में मदद करेगा। योग बच्चों को सीमित दायरे में रहने की कड़ी को तोड़ता है। इसके जरिये बच्चे मौन रहने की शक्ति, सहानुभूति, भावनात्मक बुद्धिमता और लक्ष्य निर्धारण के पॉवर को सीखकर ऑलराउंडर बन सकते हैं।

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दीपक सेन
दीपक सेन
मुख्य संपादक

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