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Friday, February 23, 2024
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भारतीय राजनीति और मिडिल क्लास सिटिजन्स की उदासीनता

1947 में भारत के आजाद होने के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई, जिसमें देश की आबादी 36 करोड़ के करीब थी। जो साल 2022 तक 135 करोड़ होने का अनुमान है। एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक भारत में 26 करोड़ मिडिल क्लास सिटिजन्स की विशाल जनसंख्या होगी।

देश की आजादी के बाद से अब तक 17 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। साल 1977, 1991, 1996 और 2014 में सरकारें इसी मध्यम वर्ग ने बदली हैं। 2014 में भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी से निजात दिलाने का वादा करके भारतीय जनता पार्टी ने भारी बहुमत से अपनी सरकार बनाई थी, जिसमें शहरी मिडिल क्लास ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

इन आंकड़ों के बावजूद मिडिल क्लास की राजनीति में हमेशा से उदासीनता ही रही है। उसकी रूचि भारतीय राजनीति में बहुत कम दिखती है। वह चुनावी राजनीति को गरीबों का काम मानता है।

1947 के बाद का मिडिल क्लास सिटिजन्स अपने आप को पॉलिटिकल फोर्स यानी शक्ति मानता था, क्योंकि उस समय ज्यादा पार्टियां नहीं हुआ करती थी। 1974 में जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा देकर इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। जय प्रकाश नारायण जिनकी हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ा था। इस आंदोलन के बाद एक नए मिडिल क्लास फोर्स यानी शक्ति का उदय हुआ था। दीपक सेन, पूर्व वरिष्ठ पत्रकार , पीटीआई

राजनीति को हीन दृष्टि से देखते हैं मिडिल क्लास युवा

जेपी के नाम से मशहूर जय प्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और सुशील कुमार मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे, लेकिन आज के समय में हजारों की संख्या में राजनीतिक पार्टियां पैदा हो गई हैं, जो सिर्फ अपने हितों के लिए ज्यादा काम करती नज़र आ रही हैं। इस बात को आज के जमाने का मिडिल क्लास युवा बहुत अच्छे से समझ चुका है। इसलिए राजनीति को हीन दृष्टि से देखता है।

1991 के बाद देश में नई क्रांति आई। ओपन मार्केट होने के बाद एक नए वर्ग का जन्म हुआ, जिसे नव धनाढ्य कहा गया। जो बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाला बना और दूसरा बना आईटी सेक्टर में काम करने वाला, जिसने हमेशा अपने आपको राजनैतिक कार्यक्रमों से दूर रखा।

ये सही बात है कि मध्यम वर्ग चुनाव में ओपिनियन मेकर होता है, लेकिन राजनीति में उसकी रूचि नहीं होती है।वो देश में चल रहे किसी मुद्दे पर कभी भी किसी धरने में शामिल नहीं होता है। मध्यम वर्ग ओपिनियन मेकर होता है, लेकिन वोट देने जाने में उसकी सहभागिता उतनी नहीं होती है, जितनी होनी चाहिए। मिडिल क्लास के ओपिनियन का चुनाव में वोटों के गणित पर बहुत फर्क पड़ता है, जिसको राजनीतिक पार्टियां भी मानती हैं इसलिए पार्टियां अपने चुनावी घोषणा पत्र में मध्यम वर्ग को तरजीह देती हैं। इतने में ही वो अपने आपको खुश कर लेता है, लेकिन ये वर्ग कभी दूसरों के लिए आगे नहीं आता है ।  – मोहन सहाय, पूर्व वरिष्ठ पत्रकार, द स्टेट्स मैन

राजनीति में अरूचि

मिडिल क्लास सिटिजन्स पॉलिटिकल फोर्स इसलिए नहीं बन पाया, क्योंकि वो सेल्फ सेंटर्ड होता है। उसे जहां अपना फायदा दिखता वो उसी तरफ अग्रसर होता है। आज के समय में वो अपनी जिम्मेदारियों में ही इतना व्यस्त हो गया है कि दूसरी बातों पर उसकी नज़र ही नहीं जाती।

देश की राजनीति में हाल ही में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जो इस बात पर अपनी मुहर लगाती हैं। महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को पीटा जा रहा था। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लोग सड़कों पर अराजकता फैला रहे थे, लेकिन इस घटना के खिलाफ कोई धरना या प्रदर्शन नहीं हुआ। हां जब पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो अपनी जेब से कम जाए इसके लिए सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखाती है, ताकि महंगाई ना बढ़े।

देश के कई राज्यों में किसान बदहाल है। तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने 2014, 2015 के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े तथा वर्ष 2016 के आंकड़ों के हवाले से लोकसभा में यह जानकारी दी कि इन वर्षो के दौरान ऋण, दिवालियापन एवं अन्य कारणों से करीब 36 हजार किसानों एवं कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की है, लेकिन इसके लिए मिडिल क्लास ने कभी धरना प्रदर्शन नहीं किया, क्योंकि इसका सीधा सरोकार उससे नहीं है। लेकिन उसे समझना होगा कि ये वही किसान हैं, जो खेतों में फसल उगाकर बाजार में भेजते हैं, जिसे खरीदकर आप अपना और परिवार का पेट भरते हैं।

हां नोट बंदी के दौरान परेशानी होने पर जरूर अपने गुस्से को जाहिर किया। क्योंकि इसका असर उस पर भी पड़ रहा था, लेकिन फिर भी खुलकर के सामने नहीं आया।

मिडिल क्लास सिटिजन्स एक उपभोक्ता के रूप में हो गया है। जब मिडिल क्लास को बाजार बना दिया गया तो वो कहीं ना कहीं अपने आपको राजनीति में नहीं देख पाता। रोजगार के पीछे ज्यादा भागता है। आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होता इसलिए वह मनोवैज्ञानिक रूप में जूझता रहता है‘।  – डॉ. राजेश त्रिपाठी . प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून

खर्चीला चुनाव

देश में लोकसभा का चुनाव समय के साथ खर्चीला होता गया। आंकड़े बताते हैं कि 1957 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 10 करोड़ रूपये खर्च हुए थे। जिसकी तुलना में साल 2019 का लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव रहा।सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस चुनाव में तकरीबन 60 हजार करोड़ रूपये खर्च हुए।

17वीं लोकसभा के गठन के लिए देश ने 542 सांसदों को चुना। देश के चुनावों पर नज़र रखने वाली संस्था नेशनल इलेक्शन वॉच और ADR ने 542 में से 539 सांसदों के शपथ पत्रों को जांचा। इसमें से 475 सांसद करोड़पति हैं।यानि कुल 88 प्रतिशत। जबकि ये संख्या 2014 में सिर्फ 82 प्रतिशत थी।

इन आंकड़ो से साफ पता चलता है कि चुनावों में धनबल का कितना ज्यादा इस्तेमाल बढ़ गया है, वहीं चुने गए 542 में से 233 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। वहीं मिडिल क्लास के पास पैसे बड़े ही हिसाब के होते हैं। इसलिए आज के खर्चीले होते चुनाव में वो अपनी भागीदारी नहीं निभा पाता।

मिडिल क्लास का सारा समय समाज में अपने रूतबे और अपने स्टेटस को मेंटेन करने में ही खर्च हो जाता है। उसे अपने घर-परिवार और बीवी-बच्चे के भविष्य के बारे में ज्यादा चिंता होती है, इसीलिए वो नौकरी को करने में ज्यादा समय बिताता है। रही बात पार्टियों या राजनीति में उसके हिस्सा लेने की, तो वो सरकार के छोटे-मोटे टैक्स में छूट की घोषणा में ही अपने आप को बाजीगर समझ लेता है।

जानेमाने जर्मन कवि और लेखक बेट्रोल्ट ब्रेष्ट का एक कोट भारत में मिडिल क्लास का पॉलिटिकल फोर्स नहीं बन पाने के कारणों पर सटीक बैठता है-

“राजनीति में हिस्सा न लेने का एक दंड यह है कि अयोग्य लोग आप पर शासन करते हैं।” अतः राजनीति में भाग लेना आपका कर्तव्य है, क्योंकि आपका भी एक मत है जिससे योग्य / अयोग्य शासक चुने जाते हैं। राजनीति करना अपने हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए ज़रूरी है।

“सबसे जाहिल व्यक्ति वह है जो राजनीतिक रूप से जाहिल है। वह कुछ सुनता नहीं, कुछ देखता नहीं, राजनीतिक जीवन में कोई भाग नहीं लेता। लगता है उसे पता नहीं कि जीने का खर्च, सब्ज़ियों की, आटे की, दवाओं की क़ीमत, किराया-भाड़ा, सब कुछ राजनीतिक फ़ैसलों पर निर्भर करता है। वह तो अपने राजनीतिक अज्ञान पर गर्व भी करता है और सीना फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफ़रत करता है। उस मूर्ख को पता नहीं कि राजनीति में उसकी ग़ैर-भागीदारी का ही नतीजा हैं – वेश्याएँ, परित्यक्त बच्चे़, लुटेरे और इस सबसे बदतर, भ्रष्ट अफ़सर तथा शोषक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चाकर। यही कारण है कि मिडिल क्लास एक राजनैतिक फोर्स याशक्ति के रूप में नहीं उभर पाया है।