Monday, February 16, 2026

गैरों से नहीं अपनों से ही मार खायी है हिन्दी ने- कृष्ण बलदेव वैद

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नई दिल्ली: वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद ने हिन्दी के उचित रूप से प्रचार प्रसार नहीं का दोष आलोचकों, प्रकाशकों और प्राध्यापकों सिर पर मढ़ते हुए कहा कि इन लोगों ने हिन्दी साहित्य को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है और पाठक वर्ग बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया है।

छह दशक से अधिक का साहित्यिक सफर तय कर चुके वैद ने खास मुलाकात में कहा, “हमारे यहां साहित्य समीक्षा ईमानदारी से नहीं की जा सकती है। हिन्दी साहित्य में वस्तुपरक आलोचना की हमेशा से कमी रही है। बड़े लेखक भी गुटबाजी का शिकार हैं जो सृजनात्मकता को बहुत नुकसान पहुचाती है। लेखकों में पुरस्कार की हवस दिन ब दिन बढ़ती जा रही है।

हालांकि, यह सभी भाषाओं में होता है, लेकिन हमारे यहां उनकी तरह उदारता की कमी है। प्रगतिशील होने का मतलब गालियां देना नहीं होता बल्कि समस्याओं पर गौर करना है। इस गुटबाजी के लिए प्रकाशक भी जिम्मेदार हैं।”

उन्होंने कहा, “मेरे रचनाकर्म के केंद्र में विपन्नता और आत्मचेतना है। पहला उपन्यास 1957 में ‘बचपन’ लिखा और उस वक्त भी मेरे मन में एक बात थी कि मैं ढीला उपन्यास न लिखूं। शायद इसलिए मेरे शिल्प में कसावट रहती है। विभाजन का असर मेरे मनोमस्तिष्क में पर आज भी है जो मेरे साहित्य में जगह जगह झलकता है।”

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वैद साहब कहते हैं, “विभाजन के बाद भारत आया और फिर विदेश चला गया, लेकिन वहां जाकर का न हो सका और वापस आने के बाद यहां का ना हो सका। मैं ‘गुजरा हुआ जमाना’ को अपना मुख्य काम मानता हूं। अध्ययन के दौरान पाश्चात्य साहित्य को करीब से देखने को मिला। शायद यही कारण है कि मेरे लेखन में सामाजिक जिम्मेदारी और शिल्प की प्रधानता झलकती है।”

उनके अनुसार, “उर्दू के अलावा नवीन शब्दों का बखूबी इस्तेमाल करता हूं। हिन्दी के पाठक शब्दकोश से परहेज करते हैं जो साहित्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। हैरी पॉटर अंग्रेजी के गंभीर साहित्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है और कभी भी मुकाबला गंभीर साहित्य से होना चाहिए।”

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उन्होंने कहा, “हिन्दी साहित्य जगत में गुटबाजी से दूर रहना बहुत कठिन है। इसके चलते लेखक का ध्यान कृति की जगह विकृति पर रहता है। रचनाकार का ध्यान कलात्मक पक्ष और विषय वस्तु पर होना चाहिए। इसमें शिल्प और शैली दोनों आते हैं। साहित्यकार, कलाकार और प्रचारक में अंतर होता है।”

वह दो टूक कहते हैं, “हिन्दी में पाठकों की कमी का मुख्य कारण हमारा समाज साहित्य विरोधी है और हमारे यहां पुस्तक संस्कृति का विकास ही नहीं हुआ। विदेशों में अच्छा साहित्य काफी बिकता है और हमारे यहां काफी कम। उच्च वर्ग की साहित्य में रूचि नहीं है और मध्यम वर्ग के लिए पुस्तकालयों का अभाव है।”

उन्होंने कहा, “हमारे यहां पुस्तकें भी काफी महंगी है,इसलिए सभी का पैपरबैक संस्करण आना चाहिए। ऐसी व्यवस्था हो कि हिन्दी की किताबें सभी बुक स्टोर में मिलनी चाहिए। हमारी वितरण प्रणाली 19वीं शताब्दी की है जिसमें बदलाव की सख्त जरूरत है। किताबें बेचने के लिए साहित्य का स्तर ना गिराये बल्कि नये पाठक तैयार करें। पुस्तक मेले इसके लिए प्रभावी माध्यम हो सकते हैं।”

उन्होंने कहा, “हिन्दी की कहानियों का नाट्य रूपांतर साहित्य प्रचार के लिए लाभप्रद हो सकता है। साहित्यकारों को नाट्य रूपांतर परंपरा को प्रात्साहित करना चाहिए। इससे पाठक बढ़ेंगे।”

वह सीधे तौर पर कहते हैंए “हिन्दी के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे गलत प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि इसके पीछे नीतिगत अभाव है। हम अपने देश में हिन्दी को वह दर्जा नहीं दे सके जिसकी वह हकदार है तो बाहर क्या दिलायेंगे।”

उन्होंने उदाहरण दिया, “इसके लिए हमें ब्रिटिश काउंसिल और मैक्समूलर भवन जैसे संस्थानों से प्रेरणा लेनी चाहिए। विदेशों में अपने दूतावासों का इस्तेमाल हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए करना चाहिए। हिन्दी वाले सूचना प्रौद्योगिकी को हिकारत की नजर से न देंखे बल्कि इसका उपयोग करें और हिन्दी के मानक साफ्टवेयर का विकास करें। हम तो आदिकाल से मौखिक और वाचिक परंपरा के पक्षधर रहे हैं।”

वैद साहब कहते ​हैं, “आजादी के पहले जो बहुत अच्छा था, वह आज भी बहुत अच्छा है। आजादी के बाद हिन्दी साहित्य में कई सकारात्मक बदलाव आये हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य आज राष्ट्रीयता होना चाहिए। अब समय है कि अपनी रूचि के अनुसार जो करना चाहे करें। हिन्दी में क्षेत्रीय भाषाओें के रंग अवश्य आये हैं, लेकिन हिन्दी का भविष्य खड़ी बोली है और हमें उसे सुधारना एवं संवारना होगा।”

उन्होंने कहा, “युवा लेखक प्रतिभावान है और मैं यहीं चाहता हूं कि वे उन्मुक्त होकर लिखें तथा प्रयोगों से न डरें। रचनाकर्म में जोखिम उठाये, लेकिन गुटबाजी से दूर रहें ताकि हम भविष्य में बेहतर साहित्य का सृजन कर सकें।”

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