अभय वाणीः एक पता, एक गली, एक इमारत-और पूरा जीवन उसी के बोझ तले परिभाषित। यह कहानी है पुरानी दिल्ली के कारोबारी नक्शे पर एक साधारण बाज़ार की तरह दर्ज स्वामी श्रद्धानंद मार्ग की, जिसे अधिकतर लोग GB Road के नाम से जानते हैं। दिन के उजाले में यहाँ लोहे की दुकानें हैं, औज़ारों की खनक है, मशीनों के पुर्ज़ों की खरीद-फरोख़्त है। लेकिन रात ढलते ही इन्हीं इमारतों के ऊपर बने कोठों की दुनिया जागने लगती है। बाहर सब कुछ ठोस, सख़्त और व्यवस्थित दिखाई देता है, जबकि भीतर अनगिनत ज़िंदगियाँ अपने हिस्से की मजबूरियों और ख़ामोशियों के साथ सांस लेती हैं।
बाहर लोहे की दुकानें हैं-और भीतर कई दिल लोहे सा कलेजा बनाकर धड़कते हैं। बाहर मशीनों का शोर है-और अंदर मशीन की तरह काम करती इंसानी जिस्म की ख़ामोशी।
दिन का बाज़ार, रात की दुनिया
रात के सन्नाटे में नीचे बंद होती लोहे की दुकानों के ऊपर कई खिड़कियों में रोशनी तब जलती है, जब बाकी शहर सोने की तैयारी कर रहा होता है। उन्हीं रोशन खिड़कियों के पीछे एक ऐसी दुनिया सांस लेती है, जहाँ मजबूरी, तिरस्कार और उम्मीद एक साथ रहती हैं।
यह विडंबना सिर्फ एक भौगोलिक विरोधाभास नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक चरित्र का आईना है। दिन में जिन इमारतों के सामने हम बेखटके गुजर जाते हैं, रात में उन्हीं इमारतों की ऊपरी मंज़िलों पर एक अलग दुनिया जागती है। वहाँ रोशनी है, रंग है, संगीत है-लेकिन इन सबके पीछे असुरक्षा, आर्थिक विवशता और सामाजिक उपेक्षा की गहरी परछाइयाँ भी हैं।
Read also: पढ़िए- इतिहास बयां करते इलाहाबाद के पुराने मोहल्लों के दिलचस्प किस्से
दिल्ली के इस इलाके में दशकों से देह व्यापार और थोक व्यापार साथ-साथ चलते रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों के अनुसार, यहाँ रहने वाले बच्चों की शिक्षा, पहचान और सुरक्षित भविष्य आज भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
बचपन, जो गलियारों में बड़ा होता है
इन परछाइयों में एक और सच्चाई छिपी है-वे लड़कियाँ जो यहीं पैदा होती हैं। जिनकी पहली किलकारी किसी खुले आँगन में नहीं, बल्कि तंग कमरों और बंद खिड़कियों के बीच गूंजती है। उनका बचपन अक्सर सीढ़ियों और गलियारों में खेलते-खेलते बीतता है, जहाँ बाहर की दुनिया उनके लिए सपना भी है और दूरी भी। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते समाज की निगाहें बदलने लगती हैं-मानो वे अपनी परिस्थितियों की उत्तराधिकारी हों।
कई सामाजिक संगठन इन बच्चों को शिक्षा और सुरक्षित माहौल देने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर कोशिश उस सामाजिक दीवार से टकराती है, जो उनके नाम और पते के साथ खड़ी कर दी जाती है। कुछ लड़कियाँ इस चक्र को तोड़ने में सफल हो जाती हैं, लेकिन अनेक के लिए ज़िंदगी वही गलियारा बन जाती है, जो बचपन में खेल का मैदान था और युवावस्था में नियति। फिर बुढ़ापे में वही कमरा, जहाँ कभी रौनक थी, एक लंबी ख़ामोशी में बदल जाता है-बीमारी, अकेलेपन और आर्थिक असुरक्षा के साथ।
पहचान का बोझ उठाते लड़के
इन्हीं कोनों में जन्म लेने वाले लड़कों की कहानी भी कम जटिल नहीं है। उनका बचपन अक्सर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश में बीतता है। स्कूल में पता चलते ही फुसफुसाहटें शुरू हो जाती हैं-जैसे जन्मस्थान ही उनका अपराध हो। समाज उन्हें संदेह की नज़र से देखता है, मानो वे किसी अनदेखे दाग़ के साथ पैदा हुए हों। कई लड़के पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं, कुछ छोटे-मोटे काम पकड़ लेते हैं और कुछ गलत संगत की तरफ़ खिंच जाते हैं-क्योंकि अवसरों के दरवाज़े उनके लिए आधे ही खुलते हैं।
बदनामी के पीछे की सच्चाई
यह समझना आसान है कि यह इलाका “बदनाम” है; कठिन यह स्वीकार करना है कि इस बदनामी के पीछे हमारे समाज की असमानताएँ, बेरोज़गारी, लैंगिक भेदभाव और आर्थिक विवशताएँ भी बराबर की हिस्सेदार हैं। यहाँ काम करने वाली अनेक महिलाएँ किसी रोमांच या विकल्प के कारण नहीं, बल्कि हालात के दबाव में इस दुनिया तक पहुँची हैं। उनके हिस्से में अक्सर दोहरी सज़ा आती है-पहली परिस्थितियों की, दूसरी समाज के तिरस्कार की।
कानून, समाज और अनसुनी आवाज़ें
कानून की अपनी सीमाएँ हैं और नैतिकता की अपनी बहसें। लेकिन इन बहसों के बीच सबसे अधिक अनसुनी आवाज़ उन महिलाओं की है, जो अपने अस्तित्व को रोज़ बचाए रखने की जद्दोजहद करती हैं। वे सिर्फ एक पेशे की परिभाषा नहीं हैं; वे माँ हैं, बेटियाँ हैं, नागरिक हैं। वे अपने बच्चों को उस चक्र से बाहर निकालने का सपना देखती हैं-ताकि अगली पीढ़ी को अपना परिचय छिपाना न पड़े।
आख़िर सवाल किससे है?
सवाल यह नहीं कि जीबी रोड क्यों है। सवाल यह है कि ऐसी सड़कों की ज़रूरत क्यों पड़ती है। जब तक समाज में अवसरों की समानता नहीं होगी, जब तक शिक्षा और रोज़गार तक बराबर पहुँच नहीं होगी, तब तक ऐसी गलियाँ किसी-न-किसी शहर में सांस लेती रहेंगी।
समस्या सिर्फ जीबी रोड की नहीं है। समस्या उस समाज की है, जो इन गलियों से होकर तो गुजरता है, लेकिन इनके भीतर रहने वाले लोगों को बराबरी की नज़र से देखने से अब भी हिचकता है। विकास सिर्फ सड़कों और बाज़ारों से नहीं मापा जाता; वह इस बात से भी तय होता है कि हम अपने सबसे हाशिये पर खड़े लोगों को कितनी इज़्ज़त, सुरक्षा और अवसर देते हैं।
