अभय वाणीः बिहार में इस वक्त दो घटनाएं साथ-साथ चल रही हैं, जिनकी चर्चा देशभर में हो रही है। एक तरफ करोड़ों के कथित टेंडर घोटाले में “टेंडर किंग” कहे जाने वाले रिशु श्री (Rishu Shree) पर SVU और ED का शिकंजा कस रहा है। दूसरी तरफ खान सर विवाद (Khan Sir Controversy) ने मीडिया और सोशल मीडिया का पूरा नैरेटिव अपने कब्जे में ले लिया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संयोग है? या फिर वही पुराना खेल-“असल मुद्दा दबाओ, भावनात्मक बहस चलाओ”?
टेंडर साम्राज्य का काला सच
तथ्य बेहद गंभीर हैं। SVU ने रिशु श्री के पटना स्थित ठिकानों पर छापेमारी में करीब 2 करोड़ रुपये के गहने, नकदी, जमीन के दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत बरामद किए। जांच एजेंसियों का दावा है कि सरकारी टेंडरों में हेराफेरी, कमीशनखोरी और अफसरों को कथित लाभ पहुंचाने का पूरा नेटवर्क सक्रिय था।
अफसरशाही तक पहुंचता नेटवर्क
ED की रिपोर्ट में यह आरोप भी सामने आया कि कुछ वरिष्ठ IAS अधिकारियों की विदेश यात्राओं तक का खर्च रिशु श्री ने उठाया। इसके बाद बिहार सरकार को 2014 बैच की IAS अभिलाषा शर्मा और 2017 बैच के IAS योगेश कुमार सागर को सस्पेंड करना पड़ा।
अब मामला सिर्फ एक ठेकेदार का नहीं रह गया है। यह सीधे-सीधे उस नौकरशाही पर सवाल है, जिसे राज्य की रीढ़ कहा जाता है।
“IAS भैया” कनेक्शन का खुलासा
सबसे विस्फोटक खुलासा तथाकथित “IAS भैया” कनेक्शन का है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ED को डिजिटल चैट, डायरी और कोडवर्ड्स मिले हैं, जिनमें “5 किलो आम भेजो” जैसे वाक्य कथित रिश्वत के संकेत बताए जा रहे हैं। यानी भ्रष्टाचार अब फाइलों में नहीं, बाकायदा एक “सिस्टम” बन चुका था-जहां टेंडर सिर्फ कागज पर निकलते थे, असली फैसला नेटवर्क करता था।
जांच बढ़ी तो बेचैनी भी बढ़ी
यहीं से असली बेचैनी शुरू होती है। क्योंकि जैसे-जैसे SVU की जांच ऊपर की तरफ बढ़ी, बिहार की सत्ता और नौकरशाही के कई सफेदपोश चेहरों पर खतरा मंडराने लगा। जांच एजेंसियां रिश्तों, यात्राओं, बैंकिंग ट्रेल और टेंडर आवंटन की कड़ियां जोड़ रही थीं। SVU ने रिशु श्री के करीबी संतोष कुमार को भी गिरफ्तार किया है और कई अन्य नाम जांच के घेरे में बताए जा रहे हैं।
और अचानक बदल गया पूरा नैरेटिव
लेकिन ठीक उसी समय पूरा सार्वजनिक विमर्श अचानक खान सर विवाद की तरफ मुड़ जाता है। ‘खान सर’ की पहचान को लेकर बहस छिड़ जाती है और उन्हें ‘फैसल खान’ बताकर नया नैरेटिव गढ़ा जाने लगता है। टीवी डिबेट बदल जाती हैं। सोशल मीडिया ट्रेंड बदल जाते हैं। न्यूज रूम का फोकस भी बदल जाता है। जो मीडिया कुछ दिन पहले “टेंडर सिंडिकेट” की परतें खोल रहा था, वही अब भावनात्मक बहसों, जातीय प्रतिक्रियाओं और वायरल क्लिप्स में उलझ जाता है।
शोर में दबता असली मुद्दा
यही भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक तकनीक है-“डायवर्जन”। जब बेरोजगारी पर सवाल उठे, तो धर्म ले आइए। जब भ्रष्टाचार पर जांच तेज हो, तो कोई विवाद उछाल दीजिए। जब सिस्टम कटघरे में हो, तो जनता को भावनाओं में उलझा दीजिए।
और दुखद यह है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा इस खेल में साझेदार बन चुका है। खोजी पत्रकारिता महंगी है, लेकिन चीखती बहसें सस्ती और वायरल हैं।
मीडिया का बदलता चेहरा
बिहार को आज यह तय करना होगा कि वह असली मुद्दा क्या मानता है-एक शिक्षक का विवाद? या सरकारी टेंडरों पर कब्जा जमाकर अफसरशाही तक पहुंच बना चुके कथित भ्रष्ट नेटवर्क?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं होता। सबसे बड़ा अपराध होता है-भ्रष्टाचार पर से जनता का ध्यान हटा देना।
बिहार के सामने असली सवाल
रिशु श्री मामला अगर निष्पक्ष जांच तक पहुंचा, तो यह बिहार की नौकरशाही और राजनीतिक संरक्षण के कई चेहरे बेनकाब कर सकता है। लेकिन अगर जनता और मीडिया शोर में उलझ गए, तो यह मामला भी बाकी घोटालों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा।
आज बिहार के सामने असली सवाल खान सर नहीं हैं। असली सवाल यह है-
- क्या बिहार में टेंडर व्यवस्था सचमुच बिक चुकी थी?
- क्या अफसरशाही का एक हिस्सा ठेकेदारों के नेटवर्क से संचालित हो रहा था?
- और क्या जनता को फिर एक बार मुद्दे से भटका दिया गया?
अगर इन सवालों का जवाब नहीं मांगा गया, तो कल कोई नया रिशु श्री (Rishu Shree) पैदा होगा। और कोई नया विवाद फिर जनता का ध्यान खींच लेगा।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सच्चाई
- “एक वायरल चेहरे के शोर में दबने लगी टेंडर साम्राज्य की कहानी…”
- “रील और विवाद के शोर में खोने लगी बिहार के सबसे बड़े टेंडर नेटवर्क की जांच…”
- “जनता की नजरें वहां टिक गईं, जहां शोर था; जबकि असली कहानी कहीं और चल रही थी…”
- “एक विवाद ने उस घोटाले को पर्दे के पीछे धकेल दिया, जिसकी आंच सत्ता तक पहुंच रही थी…”
- “बिहार में इस वक्त शोर ज्यादा बिक रहा है, सच कम दिख रहा है…”
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