Wednesday, June 3, 2026

सृजन, बालिका गृह और रिशु श्री: नीतीश के सुशासन पर दाग, अब सम्राट की अग्निपरीक्षा

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अभय वाणीः बिहार की राजनीति में “सुशासन” हमेशा से भरोसा, स्थिरता और बेहतर प्रशासन का पर्याय माना जाता रहा है। Nitish Kumar ने लंबे समय तक खुद को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया, जिसने बिहार को अराजक राजनीति से निकालकर विकास और कानून-व्यवस्था की राह पर आगे बढ़ाया। लेकिन समय के साथ सामने आए कई बड़े घोटालों और कांडों (Bihar NDA Government Scam) ने इस दावे की बुनियाद पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सृजन घोटाला, मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड और अब रिशु श्री मामला-इन तीनों घटनाओं की प्रकृति भले अलग हो, लेकिन एक समानता साफ दिखाई देती है: इन सबकी जड़ें उसी “सुशासन काल” में विकसित हुईं, जिसे बिहार की सबसे बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि बताया गया।

सृजन घोटाला: सिस्टम में जड़ जमा चुका भ्रष्टाचार

अगस्त 2017 में सामने आया भागलपुर का सृजन घोटाला इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि किस तरह सरकारी तंत्र के भीतर भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया था। सरकारी विभागों के करोड़ों रुपये वर्षों तक फर्जी खातों में ट्रांसफर होते रहे, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी मौन बनी रही। यह कोई एक दिन में हुआ अपराध नहीं था; यह लंबे समय तक चलने वाला संगठित खेल था, जो बिना राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं माना जा सकता।

बालिका गृह कांड: संवेदनहीन व्यवस्था का चेहरा

इसी तरह मई 2018 में बेपर्द हुआ मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया। जिन बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार पर थी, वे सरकारी निगरानी वाले संस्थान में शोषण का शिकार होती रहीं। सबसे भयावह तथ्य यह था कि अत्याचार की शिकायतों और संकेतों के बावजूद व्यवस्था लंबे समय तक निष्क्रिय बनी रही। यह घटना केवल सामाजिक अपराध नहीं थी, बल्कि उस प्रशासनिक संवेदनहीनता का चेहरा थी, जो “सुशासन” के दावों के समानांतर पनप रही थी।

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रिशु श्री मामला: पुराने नेटवर्क की नई परतें

अब साल 2026 में रिशु श्री मामला उसी बहस को फिर से जीवित कर रहा है। मामला भले आज खुलकर सामने आया हो, लेकिन आरोप यही हैं कि ठेकेदारी, अफसरशाही और प्रभावशाली संपर्कों का नेटवर्क पिछले कई वर्षों में मजबूत हुआ। यानी इसकी बुनियाद भी उसी दौर में तैयार हुई, जब बिहार में “सुशासन” की सबसे अधिक चर्चा हो रही थी।

विपक्ष के निशाने पर सुशासन मॉडल

यही वह बिंदु है, जहां विपक्ष सरकार पर सबसे तीखा हमला करता है। सवाल यह नहीं है कि किसी सरकार के कार्यकाल में अपराध या भ्रष्टाचार क्यों हुआ; सवाल यह है कि क्या व्यवस्था ने ऐसे तत्वों को बढ़ने दिया? क्या राजनीतिक स्थिरता के नाम पर नौकरशाही और सत्ता के आसपास ऐसे नेटवर्क तैयार हो गए, जो धीरे-धीरे व्यवस्था पर हावी होते चले गए?

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सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती

आज बिहार की सत्ता Samrat Choudhary के हाथों में है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती विरासत में मिली इसी प्रशासनिक संस्कृति को बदलने की है। क्योंकि जनता अब केवल सड़कों, पुलों और योजनाओं से प्रभावित नहीं होती; वह यह भी देखती है कि सत्ता के भीतर जवाबदेही कितनी है और भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी मजबूत है।

सुशासन या राजनीतिक ब्रांडिंग?

वास्तव में, “सुशासन” की सबसे बड़ी परीक्षा चुनावी नारों में नहीं, बल्कि ऐसे संकटों में होती है। यदि वर्षों तक घोटाले पनपते रहें, शोषण जारी रहे और प्रभावशाली नेटवर्क सत्ता के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करते रहें, तो फिर विकास के दावे भी अधूरे लगने लगते हैं।

बिहार की राजनीति आज उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां जनता यह पूछ रही है कि क्या “सुशासन” वास्तव में प्रशासनिक सुधार था, या फिर केवल एक सफल राजनीतिक ब्रांडिंग? क्योंकि जिन घटनाओं ने सरकार की सबसे अधिक किरकिरी कराई, उनके तार बार-बार उसी दौर से जुड़ते दिखाई देते हैं, जिसे कभी बिहार के स्वर्णिम प्रशासनिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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