अभय वाणीः राजनीति में विचार बदलना असामान्य नहीं है। नेता दल बदलते हैं, गठबंधन बदलते हैं और अपने फैसलों के समर्थन में नए तर्क भी देते हैं। लेकिन जब किसी राजनीतिक फैसले को सही ठहराने के लिए दिवंगत पिता की वैचारिक विरासत को आधार बनाया जाए, तो उस दावे की समय-संगति और विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भाजपा में शामिल होने के बाद ही क्यों आया यह विचार?
पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि ने भाजपा में शामिल होने के बाद कहा कि उनके पिता, अमर शहीद जगदेव प्रसाद, का सपना आज भारतीय जनता पार्टी पूरा कर रही है। उनका तर्क है कि पहले भाजपा को सामंतों और सवर्णों की पार्टी कहा जाता था, लेकिन आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंचने का अवसर मिला है। इसलिए उन्होंने भाजपा का दामन थामा।
लेकिन इसी के साथ सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—यदि भाजपा ही जगदेव प्रसाद के सपनों को साकार कर रही थी, तो नागमणि को अपने पिता के सपनों को पूरा करने वालों की पहचान इतने वर्षों बाद ही क्यों हुई।
2014 से दिख रहा था यह बदलाव, फिर अब क्यों?
भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार 2014 से है। इसी दौरान राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और संगठन में पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज की भागीदारी लगातार बढ़ी। यदि यही जगदेव प्रसाद के सपनों की कसौटी थी, तो नागमणि ने 2014, 2019 या पिछले एक दशक में कभी सार्वजनिक रूप से यह क्यों नहीं कहा कि भाजपा ही उनके पिता के सपनों की वास्तविक वाहक है? यह वैचारिक निष्कर्ष उन्हें भाजपा की सदस्यता लेने के बाद ही क्यों मिला?
बदली विचारधारा या बदली राजनीतिक परिस्थिति?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नागमणि का राजनीतिक जीवन लगातार दलों के बदलते सफर से जुड़ा रहा है। वे अलग-अलग राजनीतिक दलों में रहे, केंद्रीय मंत्री बने और समय-समय पर नए राजनीतिक मंच तलाशते रहे। लेकिन इस लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से यह दावा नहीं किया कि जगदेव प्रसाद की विचारधारा का सबसे बड़ा प्रतिनिधि भाजपा है। ऐसे में सवाल उठता है कि भाजपा बदली है या नागमणि की राजनीतिक व्याख्या?
क्या केवल प्रतिनिधित्व ही था जगदेव प्रसाद का सपना?
जगदेव प्रसाद का संघर्ष केवल सत्ता के शीर्ष पदों पर पिछड़े, दलित या आदिवासी समाज के लोगों को बैठाने तक सीमित नहीं था। उनका आंदोलन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ता-संरचना में बुनियादी बदलाव का आंदोलन था। उनका प्रसिद्ध नारा—”सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है“—सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि संसाधनों, अवसरों और सत्ता में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी की मांग भी था।
ऐसे में केवल यह कहना कि आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री किस सामाजिक वर्ग से आते हैं, क्या जगदेव प्रसाद की पूरी वैचारिक विरासत की व्याख्या हो सकती है? यह बहस का विषय हो सकता है।
क्या राजनीतिक प्रासंगिकता की तलाश भी एक वजह है?
नागमणि कभी बिहार की राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। उनका राजनीतिक जीवन जितना सक्रिय रहा, उतना ही दल-बदल के लिए भी चर्चित रहा। विभिन्न राजनीतिक दलों में लगातार नई राजनीतिक जमीन तलाशने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। ऐसे में यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा में शामिल होना केवल वैचारिक निर्णय है, या फिर राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की रणनीति भी?
राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है जब किसी नेता ने नए दल में जाने के बाद अपने पुराने वैचारिक संदर्भों की नई व्याख्या की हो। इसलिए नागमणि के बयान को लेकर यह प्रश्न भी चर्चा में है कि क्या यह वैचारिक परिवर्तन है या बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अपनी भूमिका पुनः स्थापित करने का प्रयास।
सवाल जिनका जवाब अभी बाकी है
नागमणि का भाजपा में जाना उनका राजनीतिक अधिकार है। लेकिन जब वे यह कहते हैं कि भाजपा ही उनके पिता के सपनों को साकार कर रही है, तो कुछ सवाल स्वतः खड़े हो जाते हैं।
यदि भाजपा वर्षों से उसी दिशा में काम कर रही थी, तो यह निष्कर्ष उन्हें अब जाकर ही क्यों मिला? यदि यही सच था, तो उन्होंने वर्षों पहले यह बात क्यों नहीं कही? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पिता के सपनों की पहचान वास्तव में अब हुई है, या फिर यह पहचान भाजपा की सदस्यता के साथ आई है?
यही सवाल नागमणि के बयान को एक सामान्य दल-बदल की घटना नहीं रहने देते, बल्कि उसकी वैचारिक विश्वसनीयता और राजनीतिक समय-चयन, दोनों पर गंभीर बहस खड़ी करते हैं।
