पटनाः बिहार के खेतों में लहलहाती गेहूं की फसल अब सिर्फ मेहनत और उम्मीद का प्रतीक नहीं रह गई है, बल्कि हर साल एक नए खतरे की कहानी भी लिख रही है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य के विभिन्न जिलों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां पक चुकी गेहूं की फसल अचानक आग की भेंट चढ़ जाती है (Bihar wheat field fires)। यह समस्या अब अपवाद नहीं, बल्कि एक भयावह प्रवृत्ति बनती जा रही है।
हजारों एकड़ राख, करोड़ों का नुकसान
अनुमानों और विभिन्न जिलों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, बीते पांच वर्षों में बिहार में लगभग 25,000 से 30,000 एकड़ गेहूं की फसल आग की भेंट चढ़ चुकी है। अकेले वर्ष 2022-23 और 2023-24 में ही करीब 10,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र प्रभावित हुआ। इस आगजनी से किसानों को लगभग ₹150 से ₹200 करोड़ तक का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।
डराने वाले जिलावार आंकड़े
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे अधिक प्रभावित जिलों में भोजपुर (लगभग 3,500 एकड़), बक्सर (करीब 2,800 एकड़), रोहतास (2,500 एकड़), गया (3,000 एकड़), औरंगाबाद (2,200 एकड़) और पटना के ग्रामीण क्षेत्र (लगभग 1,800 एकड़) शामिल हैं। इसके अलावा नालंदा, कैमूर और सिवान जैसे जिलों में भी हर साल सैकड़ों एकड़ फसल जलने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह समस्या कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राज्य में फैली हुई है।
एक ओर जहां किसान पहले से ही महंगे बीज, खाद और सिंचाई के बोझ तले दबा हुआ है, वहीं फसल पकने के ठीक पहले या कटाई के दौरान लगने वाली आग उसकी पूरी साल भर की मेहनत को राख में बदल देती है।
आखिर आग लगती कैसे है?: कारणों की उलझी हुई तस्वीर
इन घटनाओं के कारणों पर नजर डालें तो कई संभावनाएं सामने आती हैं। तेज गर्मी और सूखी हवाएं आग फैलने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। खेतों के पास से गुजरने वाली बिजली की तारों में शॉर्ट सर्किट, सिगरेट या बीड़ी के टुकड़े, मशीनों से निकलने वाली चिंगारियां और कभी-कभी जानबूझकर की गई शरारतें भी आग का कारण बनती हैं। लेकिन इन सभी के बावजूद अब तक कोई ठोस और व्यापक जांच नहीं हो पाई है, जो इन घटनाओं के पीछे के असली कारणों को स्पष्ट रूप से स्थापित कर सके।
सरकार की सुस्ती पर सवाल
सबसे गंभीर सवाल यह है कि सरकार की भूमिका क्या रही है? हर साल आगजनी की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन न तो प्रभावी रोकथाम के उपाय लागू किए गए हैं और न ही किसानों के लिए पर्याप्त मुआवजा व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। राहत राशि अक्सर देर से पहुंचती है या इतनी कम होती है कि नुकसान की भरपाई नहीं कर पाती।
राहत और बचाव में बड़ी खामियां
स्थानीय प्रशासन की ओर से जागरूकता अभियान चलाने और फायर ब्रिगेड की तैनाती की बात जरूर कही जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। ग्रामीण इलाकों में आग बुझाने के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और समय पर मदद न मिल पाने के कारण छोटी चिंगारी भी बड़े हादसे में बदल जाती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी और सुझाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है। खेतों के आसपास फायर लाइन (खाली पट्टी) बनाना, बिजली लाइनों की नियमित जांच, किसानों को आग से बचाव के उपायों की ट्रेनिंग देना और तेज प्रतिक्रिया वाली आपदा प्रबंधन प्रणाली विकसित करना बेहद जरूरी है।
सरकार की जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी
विशेषज्ञों की राय के बाद अब सवाल सरकार की भूमिका पर है। इसे बेहद गंभीरता से लेना होगा। सिर्फ जागरूकता अभियान काफी नहीं हैं-कानून को कठोर और प्रशासनिक तंत्र को शख्त व जवाबदेह बनाना ही होगा, ताकि लापरवाही पर प्रभावी नियंत्रण हो सके।
राहत का ढांचा क्यों कमजोर?
इसके अलावा, फसल बीमा योजना को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना होगा ताकि नुकसान होने पर किसानों को तुरंत और पर्याप्त मुआवजा मिल सके। साथ ही, हर आगजनी की घटना की वैज्ञानिक जांच कर कारणों का डेटा तैयार करना भी जरूरी है, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
जलती फसल के साथ जलता भविष्य
बिहार के किसानों के लिए यह सिर्फ एक प्राकृतिक या आकस्मिक समस्या नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का सवाल बन चुका है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह आग सिर्फ फसलों को ही नहीं, बल्कि किसानों की उम्मीदों और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को भी राख में बदल देगी।
