ले लोटाः भारतीय रेल की चाय अपने आप में एक अद्भुत रहस्य है। ट्रेन छूटने से पहले ही “चाय-चाय” की पुकार ऐसे गूंजती है, मानो देश की अर्थव्यवस्था इसी पर टिकी हो।
कुल्हड़ हो या कागज़ का कप, चाय का स्वाद हर बार नया प्रयोग लगता है-कभी इतनी मीठी कि मधुमेह को निमंत्रण दे दे, तो कभी इतनी फीकी कि जीवन दर्शन समझा दे।
पानी, दूध और पत्ती का अनुपात शायद रेल मंत्रालय की गोपनीय फाइल में सुरक्षित है। यात्री एक घूंट लेते ही चेहरा बनाते हैं, फिर भी अगले स्टेशन पर वही आवाज सुनते ही हाथ बढ़ा देते हैं। भारतीय रेल की चाय हमें सिखाती है-उम्मीद पर दुनिया कायम है, स्वाद पर नहीं!
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