अभय वाणीः भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा – यानी Indian Administrative Service (IAS) – कभी प्रतिभा, अनुशासन, ईमानदारी और जनसेवा का सर्वोच्च प्रतीक मानी जाती थी। गांव-कस्बों में आज भी IAS बनना केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा की सबसे ऊंची सीढ़ी पर पहुंचना माना जाता है। लेकिन जब इसी सेवा के वरिष्ठ अधिकारी संजीव हंस (Sanjeev Hans) के फरार होने जैसी खबरें सामने आती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
बिहार कैडर के वरिष्ठ IAS Sanjeev Hans भ्रष्टाचार, अवैध संपत्ति और कथित आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और विशेष निगरानी इकाई (SVU) उनकी तलाश में जुटी हैं। जांच में कारोबारी रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशु श्री की भूमिका भी सामने आई है, जिन्हें संजीव हंस का करीबी सहयोगी और कथित बिचौलिया बताया जा रहा है। ऐसे में उनका फरार होना केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी अफसरशाही की साख पर सवाल खड़े कर रहा है
जब कानून लागू करने वाला ही कानून से भागने लगे
संजीव हंस प्रकरण इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यह किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक वर्ग का मामला है जिस पर कानून लागू कराने और शासन चलाने की जिम्मेदारी होती है। जिस अफसर के पास कभी सरकारी शक्ति, अधिकार और प्रभाव था, वही अगर जांच एजेंसियों से बचने की कोशिश करता दिखाई दे, तो जनता के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
IAS का औरा : सेवा से सत्ता तक का सफर
IAS अधिकारियों का “औरा” कभी उनकी सादगी, निर्णय क्षमता और जनसेवा की भावना से बनता था। आज लालबत्ती संस्कृति भले औपचारिक रूप से खत्म हो चुकी हो, लेकिन उसकी मानसिकता अब भी जीवित है। अफसरशाही का एक वर्ग खुद को जनता से अलग, विशिष्ट और लगभग अछूत मानने लगा है। सरकारी बंगले, सुरक्षा, प्रोटोकॉल, राजनीतिक पहुंच और सत्ता के विशेषाधिकारों ने कई अधिकारियों के भीतर जवाबदेही की जगह अहंकार को जन्म दिया है।
प्रतिष्ठा का बोझ या विशेषाधिकार का नशा?
समस्या केवल भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की भी है जिसमें प्रशासनिक सेवा को “लोकसेवा” से ज्यादा “स्टेटस” का माध्यम समझा जाने लगा है। समाज ने भी IAS पद को इतना महिमामंडित कर दिया कि कई बार सेवा का मूल उद्देश्य पीछे छूट गया और पद की ठसक आगे आ गई। कोचिंग संस्थानों और सामाजिक चर्चाओं में IAS का चित्र एक ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में गढ़ा गया, जो व्यवस्था से ऊपर दिखाई देता है। यही सोच आगे चलकर कई अधिकारियों के भीतर जवाबदेही की भावना को कमजोर करती है।
एक व्यक्ति की बदनामी, पूरी सेवा पर सवाल
यह सच है कि पूरी Indian Administrative Service को कुछ मामलों के आधार पर कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। आज भी अनेक अधिकारी दूरदराज के इलाकों में ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कुछ चर्चित मामलों की कालिख पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा को धूमिल कर देती है। संजीव हंस प्रकरण ने भी यही किया है।
सम्मान की असली कसौटी
किसी भी लोकतंत्र में पद की प्रतिष्ठा स्थायी नहीं होती; उसे हर दिन अपने आचरण से अर्जित करना पड़ता है। IAS सेवा की असली ताकत उसके प्रोटोकॉल, बंगले और सत्ता की ठसक में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में है। यदि देश की सर्वोच्च नौकरशाही अपने भीतर विनम्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत नहीं करेगी, तो उसका पारंपरिक “औरा” धीरे-धीरे अविश्वास और विडंबना में बदलता जाएगा।
