अभय वाणीः भरत तिवारी कोई साधारण युवक नहीं था। वह जवैनिया के बाढ़ कटाव प्रभावित और विस्थापित परिवारों की लड़ाई लड़ रहा था—उन परिवारों की, जो वर्षों से अपने घर, जमीन और सुरक्षा के अधिकार के लिए भटक रहे थे। स्थायी पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन की मांग को लेकर वह लगातार आवाज उठा रहा था। लेकिन विडंबना यह रही कि कुछ दिन पहले पुलिस की गोली से कथित मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई। उसकी मौत ने कई सवाल खड़े किए, लेकिन उसके संघर्ष का सवाल अब भी जीवित है।
संघर्ष की गूंज अब सुनाई दे रही है
आज भोजपुर प्रशासन जिन विस्थापित परिवारों को भूमि का पर्चा देकर पुनर्वास की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, वह कहीं न कहीं भरत के संघर्ष की स्वीकारोक्ति है। भरत के एनकाउंटर के बाद जिला प्रशासन ने अब तक 127 भूमिहीन परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की है, जिनमें 57 परिवारों को हाल ही में भूमि का पर्चा दिया गया, जबकि 70 परिवार पहले ही पुनर्वासित किए जा चुके हैं।
यही तो चाहता था भरत तिवारी
विस्थापितों के लिए बिलौटी में पुनर्वास टाउनशिप विकसित की जा रही है, जहां शुद्ध पेयजल, शत-प्रतिशत बिजली कनेक्शन, मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए पहुंच पथ, जलजमाव रोकने के लिए मिट्टी भराई और आवास योजना के तहत घर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है। साथ ही आंगनबाड़ी केंद्र और सामुदायिक भवन निर्माण की पहल भी शुरू हो चुकी है। यह दिखाता है कि जिन लोगों के लिए भरत आवाज उठा रहा था, उनके जीवन में अब बदलाव की ठोस शुरुआत हो रही है।
लेकिन सवाल अभी बाकी है
अगर भरत की लड़ाई सही थी, अगर उसकी मांगें न्यायपूर्ण थीं, तो फिर उसकी मौत का सच क्या है? कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे गए भरत तिवारी के परिवार के लिए अब तक न्याय की राह धुंधली है। जिस युवक ने विस्थापितों की आवाज बनने की कोशिश की, उसके अपने परिवार के हिस्से अब भी सवाल, पीड़ा और प्रतीक्षा ही आई है।
पुनर्वास से आगे की जिम्मेदारी
पुनर्वास केवल जमीन का पर्चा देने से पूरा नहीं होता। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का ढांचा तैयार करना भी उतना ही जरूरी है। प्रशासन की यह पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि भरत की लड़ाई सिर्फ बसावट की नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की थी।
इंसाफ का दायरा पूरा होना चाहिए
आज विस्थापितों को जमीन मिल रही है, तो यह भरत के संघर्ष की आंशिक जीत है। लेकिन न्याय तब पूरा होगा, जब उसके परिवार को भी यह भरोसा मिलेगा कि उसकी मौत के पीछे जो सवाल हैं, उनका निष्पक्ष जवाब मिलेगा। क्योंकि इतिहास यही पूछेगा—जिसने दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, क्या उसके अपने परिवार को कभी इंसाफ मिला?
