अभय वाणीः बिहार की राजनीति में कई बार एक घटना सिर्फ घटना नहीं रहती—वह समाज के भीतर दबे असंतोष, टूटते भरोसे और बदलते समीकरणों का आईना बन जाती है। 17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र अन्तर्गत बिलौटी गांव में घटित भरत तिवारी प्रकरण आज ठीक उसी मोड़ पर खड़ा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भरत के साथ क्या हुआ; बड़ा सवाल यह है कि इस घटना के बाद बिहार का समाज किस दिशा में खड़ा होता दिख रहा है और राजनीति किस करवट बैठने जा रही है।
बेलौटी की महापंचायत: गुस्से का पहला सार्वजनिक विस्फोट
जिस बिहार में जातियां अक्सर अपने-अपने राजनीतिक खेमों में बंटी रही हैं, वहाँ भरत तिवारी प्रकरण ने पहली बार एक अलग तस्वीर दिखाई। भरत के गांव बेलौटी में हुई महापंचायत सिर्फ एक गांव की बैठक नहीं थी; वह उस गुस्से का सार्वजनिक विस्फोट थी, जो सिस्टम मैं व्याप्त भ्रस्टाचार और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर समाज के भीतर जमा था। सबसे अहम यह कि इसमें सिर्फ सवर्ण समाज ही नहीं, बल्कि कई अन्य जातियों की भी भागीदारी दिखी। बिहार की राजनीति के लिए यह दृश्य साधारण नहीं था।
बहुजन महापंचायत का ऐलान और बदलते सामाजिक संकेत
यहीं से कहानी दिलचस्प होती है—बेलौटी की महापंचायत के तुरंत बाद अवर्ण समाज के एक खास वर्ग ने बहुजन महापंचायत का ऐलान किया। लेकिन राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि अवर्ण समाज से आने वाली यादव, बनिया और अन्य जातियों ने उससे दूरी बना ली। यह दूरी सिर्फ एक कार्यक्रम से दूरी नहीं है; यह संकेत है कि बिहार की पारंपरिक सामाजिक रेखाएं दरक रही हैं और नए समीकरण आकार ले रहे हैं।
सवर्ण नाराजगी: NDA के लिए खतरे की घंटी?
सबसे बड़ा सवाल सवर्ण वोट बैंक को लेकर है। दशकों से NDA, खासकर भाजपा-जद (यू) के सबसे भरोसेमंद सामाजिक आधार रहे सवर्णों में इस घटना को लेकर गहरी नाराजगी दिख रही है। अगर यह असंतोष टिकाऊ हुआ, तो इसका असर सीधा सत्ता की बुनियाद पर पड़ सकता है।
यादवों का रुख: असामान्य लेकिन अहम
और शायद इससे भी बड़ा संकेत यादव समाज की भूमिका है। राजद की सबसे मजबूत सामाजिक ताकत माने जाने वाले यादवों का एक बड़ा हिस्सा इस मामले में सवर्णों के साथ सहानुभूति में खड़ा दिख रहा है। बिहार की राजनीति में यह दृश्य असामान्य है। क्योंकि यहाँ सियासत का इतिहास टकरावों से भरा रहा है, साझेदारी से कम।
कुर्मी समाज की खामोशी में छिपी बेचैनी
इसी बीच कुर्मी समाज की भूमिका इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प दिख रही है। सतह पर वह भले शांत नजर आ रहा हो, लेकिन भीतर उसकी बेचैनी लगातार बढ़ रही है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद से ही कुर्मी समाज के एक हिस्से में यह भावना गहरी हुई है कि बिहार की सत्ता और संगठन में उसका प्रभाव धीरे-धीरे कुशवाहा समाज के मुकाबले कमजोर पड़ा है। यही वजह है कि फिलहाल वह खुलकर प्रतिक्रिया देने के बजाय भीतर ही भीतर असंतोष समेटे सही मौके का इंतजार करता दिख रहा है।
कुशवाहा समाज की मुखर प्रतिक्रिया
वहीं, कुशवाहा समाज का एक वर्ग इस मुद्दे पर खुलकर आक्रामक है। इसकी वजह सिर्फ सामाजिक नहीं, राजनीतिक भी है—मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी उसी समाज से आते हैं। ऐसे में इस समाज के भीतर यह धारणा बन रही है कि भरत के समर्थन में उठ रहा यह जनआंदोलन कहीं न कहीं सीधे उनके राजनीतिक नेतृत्व को घेरने की कोशिश भी है। यही वजह है कि उनकी प्रतिक्रिया ज्यादा मुखर और रक्षात्मक दिख रही है।
बयानों ने बढ़ाई तपिश
लेकिन इस पूरे माहौल में सबसे ज्यादा नुकसान उन बयानों ने किया, जो जिम्मेदारी के बजाय उत्तेजना लेकर आए। जब जनभावनाएं भरत तिवारी के पक्ष में सहानुभूति के साथ उफान पर थीं, तब NDA के वरिष्ठ नेता जीतन राम मांझी और हाल ही में भाजपा का दामन थामने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि कुशवाहा के बयान आग में घी का काम करते दिखे। ऐसे समय में शब्द सिर्फ बयान नहीं होते, वे राजनीतिक संदेश बन जाते हैं—और कभी-कभी चिंगारी भी।
क्या बदल रही है बिहार की राजनीति?
भरत तिवारी प्रकरण ने बिहार की राजनीति के सामने एक असहज सच रख दिया है—जातीय राजनीति की पुरानी लकीरें अब उतनी मजबूत नहीं रहीं, जितनी मानी जाती थीं। समाज के भीतर न्याय का सवाल कई बार जाति से बड़ा हो जाता है, और जब ऐसा होता है तो राजनीति की पूरी बिसात बदलने लगती है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह स्थायी बदलाव है। लेकिन इतना तय है कि बिहार में कुछ बदल रहा है—धीरे-धीरे, भीतर-ही-भीतर। और राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव वही होता है, जिसकी आहट पहले समाज में सुनाई देती है।
