अभय वाणीः बिहार की नई सत्ता संरचना के सामने शुरुआती महीनों में ही दो ऐसे घटनाक्रम आए हैं, जिन्होंने सरकार की कार्यशैली और निर्णय क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला मामला भरत तिवारी एनकाउंटर का है और दूसरा PMCH के प्रिंसिपल Dr. Narendra Pratap Singh को अचानक हटाए जाने का। दोनों घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि नई सरकार के भीतर राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव की कमी साफ दिखाई दे रही है।
एनकाउंटर और राजनीतिक संकेत
भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल टाइमिंग और राजनीतिक संदेश को लेकर है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सार्वजनिक बयान के तुरंत बाद पुलिस कार्रवाई होती है और आरोपी का एनकाउंटर हो जाता है। यह संयोग हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में संयोग भी सवाल पैदा करते हैं। क्या पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया या राजनीतिक दबाव में त्वरित कार्रवाई की? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि कानून का राज केवल न्याय करने से नहीं, बल्कि न्याय होते हुए दिखने से भी स्थापित होता है।
PMCH विवाद और प्रशासनिक मर्यादा
दूसरी तरफ PMCH प्रिंसिपल डॉ नरेन्द्र प्रताप सिंह के खिलाफ स्वास्थ्य मंत्री का रवैया प्रशासनिक मर्यादाओं पर बहस छेड़ता है। बिना नोटिस, बिना विभागीय प्रक्रिया और बिना स्पष्ट जांच के सीधे पद से हटाने का निर्णय यह दर्शाता है कि सरकार के भीतर संस्थागत प्रक्रियाओं की समझ अभी परिपक्व नहीं हुई है। किसी भी बड़े सरकारी संस्थान में जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उसका तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नीतीश मॉडल बनाम नई कार्यशैली
इन दोनों घटनाओं की तुलना अगर नीतीश कुमार के शासनकाल से करें, तो अंतर स्पष्ट दिखता है। नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका प्रशासनिक संतुलन रहा है। वे विवादित फैसलों में सार्वजनिक बयान देने से बचते थे और संस्थागत प्रक्रिया को प्राथमिकता देते थे। चाहे कानून-व्यवस्था का मामला हो या स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही—उनकी सरकार में कार्रवाई अक्सर पर्दे के पीछे तय होती थी, जिससे राजनीतिक शोर कम होता था और प्रशासनिक स्थिरता बनी रहती थी।
अनुभव बनाम जल्दबाज़ी
यह नहीं कहा जा सकता कि नीतीश काल में सब कुछ आदर्श था। आलोचनाएं तब भी थीं। लेकिन निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की एक स्पष्ट प्रक्रिया थी। मौजूदा सरकार में यही प्रक्रिया अक्सर जल्दबाजी और राजनीतिक प्रदर्शन के दबाव में कमजोर पड़ती दिख रही है।
विश्वसनीयता की असली परीक्षा
नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ शासन चलाना नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता बनाए रखना है। सत्ता में आना और सत्ता को स्थिरता के साथ चलाना—दो अलग बातें हैं। बिहार जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक राज्य में अनुभव केवल एक योग्यता नहीं, बल्कि शासन की बुनियादी आवश्यकता है।
अगर सरकार को जनता का भरोसा मजबूत रखना है, तो उसे त्वरित और भावनात्मक फैसलों के बजाय संस्थागत, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देनी होगी। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की ताकत उसकी सख्ती से नहीं, उसकी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से मापी जाती है।
