अभय वाणीः बिहार में अब पहाड़ों की बारी है। नीतीश कुमार की लंबी राजनीतिक पारी में जिन फैसलों ने उनकी सरकार की एक अलग पहचान बनाई, उनमें शराबबंदी के साथ पहाड़ों पर खनन से जुड़ी रोक भी महत्वपूर्ण रही। अब सत्ता बदली है, मुख्यमंत्री बदले हैं और विकास की प्राथमिकताओं की भाषा भी बदलती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि बिहार में करीब 20 साल बाद खनन गतिविधियां फिर शुरू की जाएंगी और 15 अक्टूबर के बाद इसकी शुरुआत होगी। सरकार खनिज ब्लॉकों की नीलामी और आवंटन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा रही है।
सरकार का तर्क सीधा है—बिहार की खनिज संपदा का इस्तेमाल राज्य और जनता के कल्याण के लिए होना चाहिए। रोजगार चाहिए, उद्योग चाहिए, निवेश चाहिए और राजस्व चाहिए। इन तर्कों को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि विकास की इस दौड़ में पहाड़ की कीमत कौन तय करेगा? मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। बात सुनने में संतुलित है, लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—आखिर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत वाला पहाड़ कौन है और सिर्फ खनिज संसाधन वाला पहाड़ कौन?
पहाड़ सिर्फ पत्थर नहीं है
पहाड़ को अगर सिर्फ चट्टान और उसके भीतर छिपे खनिज के रूप में देखा जाएगा, तो शायद खनन का फैसला बहुत आसान लगेगा। लेकिन पहाड़ को प्रकृति की नजर से देखिए। पहाड़ सिर्फ पत्थर नहीं है। वह जंगल है, जल का भंडार है, भूजल के पुनर्भरण का हिस्सा है, असंख्य जीव-जंतुओं का घर है, मिट्टी और स्थानीय जलवायु को प्रभावित करने वाला प्राकृतिक तंत्र है। वह गांवों की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है और लोककथाओं, आस्था और परंपराओं में मौजूद है। और सबसे महत्वपूर्ण—पहाड़ सृष्टि का श्रृंगार है।
किसी पहाड़ के ऊपर मंदिर बना हो, गुफा में कोई पुरातात्विक अवशेष मिले हों या वहां किसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति जुड़ी हो, तभी वह विरासत नहीं बन जाता। कई बार पहाड़ का पूरा भू-दृश्य ही उस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान होता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पहाड़ पर कोई ऐतिहासिक स्मारक मौजूद है या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि क्या उस पहाड़ का अस्तित्व अपने आप में संरक्षण योग्य है?
सम्राट चौधरी को बताना होगा—किसे काटेंगे, किसे बचाएंगे?
मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की बात कही है। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन सरकार को अब इसकी स्पष्ट परिभाषा भी देनी होगी। क्या संरक्षण केवल उन पहाड़ों का होगा जिन्हें पुरातत्व विभाग ने किसी सूची में दर्ज कर रखा है? क्या जिस पहाड़ पर कोई प्राचीन मंदिर या गुफा है, सिर्फ वही बचाया जाएगा? क्या जिस पहाड़ पर कोई शिलालेख नहीं है, उसे खनन के लिए उपलब्ध मान लिया जाएगा?
और यदि किसी पहाड़ के एक हिस्से में खनन होता है और दूसरे हिस्से को विरासत घोषित किया जाता है, तो क्या विस्फोटकों, मशीनों, धूल और भूगर्भीय हलचल का असर केवल उस हिस्से तक सीमित रहेगा जिसे सरकार ने खनन क्षेत्र घोषित किया है? इन सवालों के जवाब सिर्फ सरकारी बयान से नहीं, स्पष्ट नीति से मिलने चाहिए। क्योंकि पहाड़ की विरासत को उसके ऊपर खड़े किसी मंदिर, मूर्ति या शिलालेख की सीमा में कैद नहीं किया जा सकता।
विकास जरूरी है, लेकिन विकास की परिभाषा भी जरूरी है
यह कहना भी गलत होगा कि खनन का हर रूप विनाश है। बिहार को उद्योग चाहिए। निर्माण के लिए कच्चा माल चाहिए। रोजगार चाहिए। निवेश चाहिए। राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भी करना होगा। मुख्यमंत्री ने भी खनिज संपदा के इस्तेमाल को राज्य के विकास और जनता के कल्याण से जोड़ा है। सरकार कई खनिज ब्लॉकों को चरणबद्ध तरीके से संचालित करने की दिशा में काम कर रही है।
लेकिन संसाधन का इस्तेमाल और संसाधन का दोहन—इन दोनों के बीच फर्क है। पहला विकास की जरूरत हो सकता है, दूसरा आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट। सरकार यदि खनन शुरू करना चाहती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खनन वैज्ञानिक हो, सीमित हो, पर्यावरणीय प्रभाव का सही आकलन हो और निगरानी इतनी मजबूत हो कि अवैध खनन के लिए कोई रास्ता न बचे। लेकिन सवाल यह भी है कि मानव की जरूरतें पूरी करने के लिए पहाड़ों की कटाई और धरती का चीरहरण आखिर कितना जायज है?
20 साल में पहाड़ वहीं नहीं रहे
एक और सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। अगर सरकार कह रही है कि बिहार में 20 साल बाद खनन फिर शुरू होगा, तो इन दो दशकों में पर्यावरण, आबादी, जलस्रोत, वन क्षेत्र और स्थानीय परिस्थितियों में जो बदलाव हुए हैं, उनका नया आकलन कहां है? बीस साल पहले जिस भूगोल में खनन रोका गया था, वह भूगोल आज बिल्कुल वैसा ही नहीं है। कहीं गांव बढ़े होंगे, कहीं सड़कें बनी होंगी, कहीं जलस्रोत विकसित हुए होंगे, कहीं जंगलों का स्वरूप बदला होगा और कहीं वन्यजीवों का आवास बदला होगा।
इसलिए पुराने आंकड़ों के आधार पर नया खनन शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा। हर खनन क्षेत्र का वर्तमान पर्यावरणीय और सामाजिक मूल्यांकन जरूरी है।
पहाड़ को सिर्फ ‘खनिज ब्लॉक’ मत बनाइए
सरकार की भाषा में कोई पहाड़ ‘मिनरल ब्लॉक’ हो सकता है। उद्योग के लिए वह निवेश का अवसर हो सकता है। ठेकेदार के लिए वह कारोबार हो सकता है। सरकार के लिए वह राजस्व का स्रोत हो सकता है। लेकिन वहां रहने वाले लोगों के लिए? वह उनका पहाड़ है। उनकी जमीन का प्राकृतिक प्रहरी है, उनके पानी का आधार है, उनके खेतों की पारिस्थितिकी का हिस्सा है और उनकी स्मृतियों का हिस्सा है।
और प्रकृति के लिए वह करोड़ों वर्षों में बनी एक ऐसी संरचना है, जिसे मनुष्य कुछ वर्षों में काट सकता है, लेकिन फिर अपनी इच्छा से बना नहीं सकता। यही फर्क विकास और विनाश के बीच की रेखा तय करता है।
सरकार को विरोध नहीं, स्पष्टता का सामना करना है
सम्राट चौधरी सरकार के सामने चुनौती खनन शुरू करने की नहीं है। असली चुनौती यह साबित करने की है कि खनन और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। अगर सरकार ऐसा कर पाती है तो यह बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा कदम हो सकता है। लेकिन अगर ‘विरासत’ की परिभाषा इतनी संकरी रखी गई कि सिर्फ मंदिर, गुफा या पुरातात्विक अवशेष बचें और बाकी पहाड़ खनन के हवाले कर दिए जाएं, तो यह संरक्षण नहीं होगा। क्योंकि पहाड़ की विरासत सिर्फ उसके इतिहास में नहीं, उसके अस्तित्व में है।
नीतीश कुमार के दौर में जिस पहाड़ को बचाने का फैसला हुआ था, अब सम्राट चौधरी के दौर में उसी पहाड़ को विकास के लिए खोलने की तैयारी है। यह बदलाव अपने आप में गलत नहीं है। नीतियां समय और जरूरत के साथ बदलती हैं। लेकिन नीति बदलने के साथ जवाबदेही की कसौटी भी बदलनी चाहिए।
सरकार को जनता को यह बताना होगा—कौन-सा पहाड़ खनन के लिए खुलेगा? कौन-सा पहाड़ संरक्षित रहेगा? किस आधार पर फैसला होगा? और क्या किसी पहाड़ को केवल इसलिए काटा जा सकता है कि उसके ऊपर कोई ‘ऐतिहासिक स्मारक’ दर्ज नहीं है?
क्योंकि पहाड़ किसी सरकार की बनाई हुई चीज नहीं है। पहाड़ सृष्टि का श्रृंगार हैं। उनका मूल्य सिर्फ इस बात से तय नहीं हो सकता कि उनमें कितना पत्थर या कितना खनिज है। और इसलिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के फैसले के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा है—आखिर आप किस पहाड़ को काटने जा रहे हैं और किस पहाड़ को बचाने जा रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि इतिहास और संस्कृति बचाने के नाम पर हम पहाड़ों की कटाई करते-करते उनका अस्तित्व ही खो दें?
विकास हो, जरूर हो। खनन हो, जरूरत हो तो जरूर हो। लेकिन पहाड़ बचे रहें—क्योंकि पहाड़ बचेंगे, तभी सृष्टि का यह श्रृंगार भी बचा रहेगा।
