पटनाः बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब विधानमंडल के भीतर भी सत्ता-संतुलन का एक और अहम बदलाव सामने आया है। बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने 28 सितंबर 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा कोटे से सभापति रहे सिंह ने अपना इस्तीफा परिषद के उपसभापति रामवचन राय को सौंपा। उनके इस्तीफे के साथ ही यह लगभग साफ हो गया कि विधान परिषद की शीर्ष कुर्सी अब जनता दल यूनाइटेड (JDU) के हिस्से में जाएगी। 29 सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक रामवचन राय को नया सभापति नियुक्त किया गया है।
अवधेश नारायण सिंह का इस्तीफा केवल एक संवैधानिक पद पर बदलाव भर नहीं है। इसके पीछे बिहार में सत्तारूढ़ NDA के भीतर पदों के बंटवारे और राजनीतिक संतुलन का सवाल भी जुड़ा है। नई सरकार बनने के बाद भाजपा के पास विधानसभा अध्यक्ष का पद है, जबकि विधान परिषद के सभापति का पद JDU के हिस्से में जाने की व्यवस्था सामने आई है। ऐसे में यह बदलाव समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर विधान परिषद के सभापति की कुर्सी इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है।
मुख्यमंत्री या मंत्री पद नहीं, सदन में चाहिए बड़ी संवैधानिक भूमिका
विधान परिषद के सभापति सरकार का हिस्सा नहीं होते। उनका काम कार्यपालिका चलाना नहीं, बल्कि परिषद की कार्यवाही को संवैधानिक और संसदीय नियमों के मुताबिक संचालित करना होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 182 के तहत विधान परिषद अपने सदस्यों में से सभापति और उपसभापति का चुनाव करती है। अनुच्छेद 183 सभापति के इस्तीफे और पद से हटाने की प्रक्रिया तय करता है, जबकि अनुच्छेद 184 के मुताबिक सभापति का पद खाली होने पर उपसभापति उनके दायित्वों का निर्वहन करते हैं।
यही वजह है कि सभापति को केवल सदन की अध्यक्षता करने वाला व्यक्ति समझना इस पद की भूमिका को छोटा करके देखना होगा। परिषद की बैठक कब और किस तरह चलेगी, सदन में किस सदस्य को बोलने का अवसर मिलेगा, संसदीय नियमों की व्याख्या कैसे होगी और कार्यवाही किस अनुशासन के साथ आगे बढ़ेगी—इन तमाम मामलों में सभापति की भूमिका केंद्रीय होती है।
विधान परिषद में सरकार और विपक्ष दोनों के सदस्य होते हैं। ऐसे में सभापति की कुर्सी सदन की कार्यवाही के संचालन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार की नीतियों पर चर्चा हो या विपक्ष की ओर से उठाए गए सवाल, पूरी प्रक्रिया संसदीय नियमों के तहत आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सभापति के पद से जुड़ी होती है।
बराबर वोट की स्थिति में भी अहम भूमिका
सभापति की भूमिका का एक और संवैधानिक पहलू मतदान से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 189 में विधान परिषद में मतदान से संबंधित प्रावधान हैं। सामान्य तौर पर सभापति सदन की कार्यवाही संचालित करते हैं और मतदान में उनकी भूमिका विशेष परिस्थितियों में सामने आती है। यदि किसी प्रश्न पर मत बराबर हो जाएं, तो सभापति निर्णायक मत दे सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभापति सरकार के पक्ष में मतदान करने वाला पद है। इसके विपरीत, यह पद सदन की प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से संचालित करने के संवैधानिक दायित्व से जुड़ा है। लेकिन किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतों की बराबरी जैसी स्थिति पैदा होने पर सभापति की संवैधानिक भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसके अलावा परिषद की विभिन्न संसदीय प्रक्रियाओं और समितियों से जुड़ी जिम्मेदारियों में भी सभापति का स्थान महत्वपूर्ण होता है। इसलिए राजनीतिक दल इस पद को केवल औपचारिक या प्रोटोकॉल की कुर्सी के रूप में नहीं देखते।
फिर JDU को क्यों चाहिए यह कुर्सी?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। बिहार में नई सरकार के गठन के बाद सत्ता के शीर्ष पदों का समीकरण बदला है। मुख्यमंत्री पद भाजपा के पास है और विधानसभा अध्यक्ष का पद भी भाजपा के पास है। ऐसे में विधान परिषद के सभापति का पद JDU के हिस्से में जाना NDA के भीतर दोनों प्रमुख सहयोगी दलों के बीच पदों के संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भाजपा और JDU के बीच सत्ता-साझेदारी के तहत दोनों दलों को विधानमंडल के दो महत्वपूर्ण पीठासीन पदों में से एक-एक पद मिलना तय हुआ था। भाजपा के प्रेम कुमार विधानसभा अध्यक्ष हैं, जबकि अब विधान परिषद की सभापति की कुर्सी JDU के पास चली गई है।
यह व्यवस्था राजनीतिक तौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विधान परिषद बिहार की द्विसदनीय विधायिका का ऊपरी सदन है। विधानसभा में सरकार की राजनीतिक ताकत सीधे तौर पर दिखाई देती है, जबकि विधान परिषद में अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक समूहों का प्रतिनिधित्व होता है। ऐसे सदन की अध्यक्षता करने वाला पद गठबंधन के भीतर एक अलग तरह की संस्थागत भूमिका देता है।
रामवचन राय क्यों बने स्वाभाविक दावेदार?
अवधेश नारायण सिंह के इस्तीफे के बाद JDU की ओर से रामवचन राय का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आया। वह लंबे समय से विधान परिषद से जुड़े रहे हैं और जुलाई 2024 से परिषद के उपसभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। ऐसे में सभापति का पद रिक्त होने पर उनके पास सदन की कार्यवाही का अनुभव और तत्काल जिम्मेदारी संभालने की संवैधानिक स्थिति दोनों मौजूद थीं।
28 सितंबर को सिंह के इस्तीफे के बाद राय ने कार्यकारी सभापति के रूप में कार्यभार संभाला था। अगले दिन की रिपोर्टों में उन्हें विधान परिषद का नया सभापति नियुक्त किए जाने की जानकारी सामने आई। रामवचन राय अकादमिक पृष्ठभूमि से भी आते हैं और पटना विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रह चुके हैं।
इस तरह उनके चयन में केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, बल्कि सदन के कामकाज का अनुभव भी एक महत्वपूर्ण पहलू रहा।
अवधेश नारायण सिंह के इस्तीफे का मतलब क्या?
अवधेश नारायण सिंह के लिए यह पद कोई पहली संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं थी। वह करीब 33 वर्षों से विधान परिषद के सदस्य रहे हैं और NDA सरकारों के दौरान चार बार सभापति की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि वह आगे भी विधान परिषद के सदस्य के रूप में सक्रिय रहेंगे।
अपने इस्तीफे में सिंह ने भाजपा में अपने राजनीतिक सफर, संगठन में निभाई गई जिम्मेदारियों और NDA के नेताओं के प्रति आभार जताया। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का भी उल्लेख किया। यानी उन्होंने पद छोड़ने के बावजूद सक्रिय राजनीतिक भूमिका जारी रखने का संकेत दिया है।
चुनाव से पहले बदलाव क्यों अहम?
विधान परिषद की आठ स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चुनाव 23 अक्टूबर को होने हैं। इन चुनावों से कुछ ही सप्ताह पहले सभापति की कुर्सी में बदलाव हुआ है। हालांकि सभापति का पद सीधे इन चुनावों का संचालन करने वाला राजनीतिक पद नहीं है, लेकिन चुनावी माहौल में सत्ता गठबंधन के भीतर महत्वपूर्ण पदों का पुनर्विन्यास अपने आप में ध्यान खींचता है।
इस पूरे घटनाक्रम को फिलहाल सबसे स्पष्ट रूप से NDA के भीतर सत्ता-संतुलन के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। भाजपा के पास विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी है और JDU के पास विधान परिषद की सभापति की जिम्मेदारी आ गई है।
इसलिए अवधेश नारायण सिंह का इस्तीफा केवल एक व्यक्ति के पद छोड़ने की कहानी नहीं है। इसके पीछे बिहार के दो सदनों के बीच संवैधानिक भूमिका, सरकार और विपक्ष के बीच संसदीय संतुलन और NDA के भीतर प्रमुख सहयोगी दलों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। आने वाले दिनों में परिषद की कार्यवाही और आगामी MLC चुनावों के दौरान यह बदलाव किस तरह राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
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