अभय वाणीः सियासत में गठबंधन सिर्फ साथ चलने का नाम नहीं है। गठबंधन में रहते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। खासकर तब, जब किसी दल का अपना सामाजिक आधार हो और उसका नेता भविष्य की राजनीति को लेकर अपनी जमीन मजबूत कर रहा हो। चिराग पासवान की मौजूदा राजनीति को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है।
चिराग NDA के साथ हैं। केंद्र सरकार में मंत्री हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में लगातार खुलकर बोलते रहे हैं। लेकिन हाल के उनके बयानों पर गौर करें तो एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। कई मुद्दों पर उनका सुर गठबंधन के दूसरे नेताओं से अलग सुनाई देता है। यही अलग सुर अब बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय है।
साथ भी, सवाल भी
हालिया उदाहरण चुनाव आयोग से जुड़ा है। SIR और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच चिराग ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा हो रहा है, तो आयोग को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना था कि आयोग को विपक्ष को जवाब देने की जरूरत नहीं, लेकिन जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।
बाद में NDA के कुछ अन्य सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण की मांग की। यानी चिराग की बात अकेली नहीं रही। लेकिन उन्होंने गठबंधन सरकार का हिस्सा होते हुए भी एक संवैधानिक संस्था से सार्वजनिक स्पष्टीकरण की जरूरत पर जोर देकर अपनी अलग राजनीतिक लाइन जरूर दिखाई।
यहीं से सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ तत्काल प्रतिक्रिया है या चिराग अपनी राजनीति के लिए एक अलग स्पेस भी तैयार कर रहे हैं?
आरक्षण पर भी अलग रास्ता
इस सवाल को समझने के लिए आरक्षण विवाद भी महत्वपूर्ण है। SC/ST आरक्षण में सब-कैटेगरी और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच खुला मतभेद सामने आया। दोनों NDA का हिस्सा हैं, लेकिन इस मुद्दे पर दोनों की राय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रही।
मामला इतना बढ़ा कि दोनों खेमों से एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक सामने आई। BJP को भी दोनों नेताओं से सार्वजनिक टकराव खत्म करने की अपील करनी पड़ी।
यह विवाद सिर्फ दो नेताओं की बयानबाजी नहीं था। इसके पीछे बिहार के अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपने-अपने राजनीतिक आधार को मजबूत रखने की कोशिश भी दिखाई देती है। चिराग के लिए आरक्षण का मुद्दा उनकी राजनीति से सीधे जुड़ा है। ऐसे में इस पर अपनी स्पष्ट स्थिति रखना उनके लिए महज गठबंधन की राजनीति का सवाल नहीं हो सकता।
बिहार में सरकार से सवाल
कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी चिराग कई मौकों पर सरकार और प्रशासन से कार्रवाई की मांग कर चुके हैं। उनका रुख यह संकेत देता है कि सत्ता के साथ खड़े होने का मतलब हर मामले में सरकार का बचाव करना जरूरी नहीं है।
यही बात उनकी राजनीति को दिलचस्प बनाती है। वह सरकार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन असहज मुद्दों पर सवाल उठाने से भी पीछे नहीं हटते। इससे उन्हें गठबंधन के भीतर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने का अवसर मिलता है।
चिराग के सामने असल चुनौती भी यही है। उन्हें NDA के साथ अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है और साथ ही LJP (रामविलास) की स्वतंत्र पहचान को भी मजबूत करना है। बिहार जैसे राज्य में, जहां सामाजिक समीकरण राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं, यह संतुलन आसान नहीं है।
क्या चिराग अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं?
तो क्या चिराग की यह राजनीति सिर्फ सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति है? या वह भविष्य के लिए अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं?
इसका निश्चित जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी। लेकिन हाल के बयानों को एक साथ रखकर देखें तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि चिराग अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज को बनाए रखना चाहते हैं।
UCC इसका एक और उदाहरण है। चिराग ने इस मुद्दे पर तत्काल कोई अंतिम रुख घोषित करने के बजाय कहा कि ड्राफ्ट सामने आने के बाद LJP (रामविलास) उसका अध्ययन करेगी और अपना पक्ष स्पष्ट करेगी।
यानी गठबंधन के साथ रहना अपनी जगह है और हर मुद्दे पर अपनी राजनीतिक स्थिति तय करना अपनी जगह।
NDA में आग या सहयोगी का दबाव?
NDA जैसे बड़े गठबंधन में मतभेद कोई असामान्य बात नहीं है। हर दल का अपना सामाजिक आधार और अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं होती हैं। इसलिए हर अलग बयान को गठबंधन में दरार मान लेना सही नहीं होगा।
लेकिन लगातार अलग-अलग मुद्दों पर अलग आवाजें सुनाई दें तो उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब वह आवाज सत्ता में हिस्सेदार किसी ऐसे नेता की हो, जो अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सक्रिय है।
चिराग की मौजूदा राजनीति इसी संतुलन के बीच दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी के प्रति उनका समर्थन स्पष्ट है। NDA के साथ उनका जुड़ाव भी स्पष्ट है। लेकिन इसके साथ अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश भी दिखाई देती है।
यही संतुलन आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि गठबंधन की राजनीति में सबसे मुश्किल काम विपक्ष में बैठकर सरकार की आलोचना करना नहीं है। मुश्किल काम है सत्ता के साथ रहते हुए अपनी राजनीतिक जमीन को भी बचाए रखना।
चिराग फिलहाल यही कर रहे हैं। इसलिए सवाल यह नहीं है कि चिराग NDA के साथ हैं या नहीं। सवाल यह है कि NDA के साथ रहते हुए वह अपनी अलग राजनीतिक आवाज को कितनी दूर तक ले जाते हैं।
एक सहयोगी का अलग सुर कभी-कभी सिर्फ दबाव की राजनीति होता है। लेकिन वही सुर लगातार तेज हो जाए, तो गठबंधन के भीतर राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है।
चिराग का यह ‘राग’ फिलहाल किसी दरार का ऐलान नहीं है। लेकिन यह जरूर बताता है कि गठबंधन की राजनीति में उनकी अपनी धुन मौजूद है।
और सियासत में असली सवाल यही है—साथ चलने वाला कब तक सिर्फ साथ चलता है और कब अपनी राह की आवाज भी सुनाने लगता है?





