अभय वाणीः पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20 Petrol) को लेकर देश में बहस तेज है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। वहीं, वाहन उद्योग के एक वर्ग, विशेषज्ञों और उपभोक्ताओं की अपनी आशंकाएं हैं। लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल लगभग गायब है—क्या E20 भारत की ईंधन नीति का अंतिम पड़ाव है, या यह केवल एक शुरुआत है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने केवल E20 तक ही तैयारी नहीं की है। E22, E25, E27 और E30 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रणों के मानक अधिसूचित किए जा चुके हैं। साथ ही फ्लेक्स-फ्यूल (Flex Fuel) वाहनों और E100 जैसे ईंधनों को लेकर भी काम चल रहा है। यानी, भारत की ईंधन नीति का दायरा E20 से कहीं आगे तक जाता दिखाई देता है।
ऐसे में बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि E20 सही है या गलत। असली चर्चा यह होनी चाहिए कि यदि भारत अधिक एथेनॉल आधारित ईंधन व्यवस्था की ओर बढ़ता है, तो क्या हमारी खेती, जल संसाधन, वाहन उद्योग और आम उपभोक्ता उस बदलाव के लिए तैयार हैं?
सरकार के तर्क कितने मजबूत हैं?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने से विदेशी मुद्रा की बचत, ऊर्जा सुरक्षा और कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद है। इसके साथ ही गन्ना और मक्का उत्पादकों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और चीनी मिलों की भुगतान क्षमता भी बेहतर होती है। इन आधारों पर E20 नीति का आर्थिक और रणनीतिक महत्व स्पष्ट दिखाई देता है।
आम आदमी की चिंता क्या है?
नीति के लाभ अपनी जगह हैं, लेकिन आम उपभोक्ता के मन में भी कुछ स्वाभाविक सवाल हैं। देश की सड़कों पर आज भी करोड़ों ऐसे वाहन हैं जिन्हें E20 से अधिक एथेनॉल मिश्रण के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। यदि भविष्य में E25 या E30 लागू होता है, तो क्या पुराने वाहनों की कार्यक्षमता प्रभावित होगी? क्या माइलेज कम होगी? क्या रखरखाव का खर्च बढ़ेगा? इन सवालों के स्पष्ट जवाब समय रहते देने होंगे।
किसान को लाभ, लेकिन कितनी कीमत पर?
एथेनॉल उद्योग किसानों के लिए अवसर लेकर आया है। लेकिन यदि भविष्य में इसकी मांग लगातार बढ़ती है, तो अधिक गन्ना और मक्का ईंधन उत्पादन में जाएगा। तब खाद्य सुरक्षा, पशु चारे और कृषि संसाधनों पर दबाव बढ़ने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
जल और पर्यावरण की चुनौती
एथेनॉल को हरित ईंधन माना जाता है, लेकिन उसका पर्यावरणीय मूल्यांकन केवल वाहन से निकलने वाले धुएं से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि उसके उत्पादन में कितना पानी, कितनी ऊर्जा और कितनी कृषि भूमि का उपयोग हो रहा है। विशेष रूप से गन्ना जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसल पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जल संकट को और गहरा कर सकती है। इसलिए कृषि अवशेष और दूसरी पीढ़ी (2G) के एथेनॉल जैसे विकल्पों को समान महत्व देना होगा।
आगे की राह
भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना ही चाहिए। लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आयातित तेल पर निर्भरता कम करना नहीं है। इसका अर्थ ऐसी नीति बनाना भी है जो किसानों के हित, उपभोक्ताओं के अधिकार, खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और पर्यावरण—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करे।
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यही कारण है कि E20 को किसी अंतिम उपलब्धि या अंतिम समाधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है। इसलिए सरकार को E20 के साथ-साथ अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर भी खुलकर संवाद करना चाहिए। यदि भविष्य में E25, E30 या फ्लेक्स-फ्यूल व्यवस्था की दिशा में बढ़ना है, तो उसके लिए आज से ही वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शी नीति और जनविश्वास का मजबूत आधार तैयार करना होगा।
E20 के बाद क्या?
E20 पर समर्थन और विरोध—दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन असली बहस E20 की नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति की दिशा की है। यदि यह बदलाव विज्ञान, पारदर्शिता और व्यापक जनहित के साथ आगे बढ़ता है, तो भारत ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक नया अध्याय लिख सकता है। लेकिन यदि जल्दबाजी में फैसले लिए गए और लोगों की आशंकाओं को नजरअंदाज किया गया, तो यही नीति विवाद का कारण भी बन सकती है।
सवाल यह नहीं है कि भारत E20 तक पहुंच गया है या नहीं। सवाल यह है कि E20 के बाद भारत किस दिशा में जाएगा, और क्या उस यात्रा के लिए देश पूरी तरह तैयार है?
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