अभय वाणीः प्रेमचंद की कहानी “रक्षा में हत्या” का सार यही है कि कई बार बचाने के उत्साह में वही काम कर दिया जाता है, जिससे सबसे अधिक नुकसान उसी का होता है जिसकी रक्षा का दावा किया जा रहा हो। बिहार की राजनीति में नागमणि इन दिनों मानो इसी कहानी का नया राजनीतिक संस्करण लिख रहे हैं।
सवाल सरकार से था, जवाब जाति से क्यों?
भरत तिवारी प्रकरण के बाद सरकार से सवाल उठे। सवाल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार से थे। लोकतंत्र में यही स्वाभाविक है। सरकार जवाब देती, तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखती और विवाद समाप्त हो जाता। लेकिन नागमणि ने जवाबदेही की बहस को सीधे जातीय अस्मिता की लड़ाई में बदल दिया। उनका संदेश साफ है—सम्राट चौधरी पर सवाल उठेंगे तो पूरा कुशवाहा समाज सड़क पर उतरेगा। यहीं से लोकतंत्र की बहस खत्म होती है और जातीय लामबंदी की राजनीति शुरू होती है।
राजनीतिक प्रतिरोध या शक्ति प्रदर्शन?
नागमणि की फेसबुक पोस्ट पढ़िए। दावा है कि Bahujan Mahapanchayat को लेकर जगदीशपुर में छह-सात लाख लोग जुटने वाले थे। प्रशासन ने धारा 144 लगा दी, इसलिए कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। फिर घोषणा होती है—”मैं 159 मीडिया में मुख्यमंत्री के लिए लड़ा”, “ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं”, “अब सम्राट चौधरी और नागमणि का जमाना है”, “सुतल कोइरी साग बराबर, जागल कोइरी आग बराबर।”
यह भाषा किसी लोकतांत्रिक आंदोलन की नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की प्रतीत होती है। ऐसा लगता है जैसे मुख्यमंत्री कोई संवैधानिक पद नहीं, बल्कि किसी एक जाति की निजी विरासत हों, जिनकी रक्षा का ठेका पूरे समाज को उठाना है।
मुख्यमंत्री पूरे बिहार के हैं या किसी एक समाज के?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सम्राट चौधरी आखिर किसके मुख्यमंत्री हैं—पूरे बिहार के या केवल कुशवाहा समाज के? यदि वे पूरे बिहार के मुख्यमंत्री हैं, तो उनके कामकाज पर सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन यदि हर सवाल का जवाब जातीय गोलबंदी होगा, तो फिर लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र ही बचेगा।
विडंबना देखिए। जिन नागमणि ने कभी सामाजिक न्याय, बहुजन राजनीति और सत्ता के केंद्रीकरण पर लंबी-लंबी बातें कीं, वही आज एक व्यक्ति की आलोचना को पूरी जाति का अपमान साबित करने में जुटे हैं। यह राजनीति नहीं, राजनीतिक असुरक्षा का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
सम्राट की रक्षा या अपनी राजनीतिक जमीन की चिंता?
कुशवाहा राजनीति नागमणि की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत रही है। भला कोई अपनी विरासत को इतनी आसानी से हाथ से क्यों जाने देगा? लेकिन सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुशवाहा समाज के एक बड़े वर्ग का राजनीतिक झुकाव उनकी ओर बढ़ा है। ऐसे में हर विवाद को सम्राट बनाम कुशवाहा समाज का सवाल बनाना केवल मुख्यमंत्री की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
इतिहास का सबक: लालू युग की सबसे बड़ी भूल
इतिहास का दुर्भाग्य यह है कि बिहार यह प्रयोग पहले भी देख चुका है। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की राजनीति ने इतिहास बदला। वंचित तबकों को आवाज मिली, सत्ता के सामाजिक समीकरण बदले। लेकिन धीरे-धीरे सत्ता और समाज का फर्क मिटा दिया गया। सरकार की आलोचना को यादव समाज पर हमला बताया जाने लगा। राजनीतिक नेतृत्व और पूरी जाति एक-दूसरे के पर्याय बना दिए गए।
परिणाम यह हुआ कि सरकार की हर विफलता का बोझ अंततः पूरे यादव समाज के सिर पर डाल दिया गया। कानून-व्यवस्था की खराब छवि हो या प्रशासनिक अक्षमता—राजनीतिक विरोधियों ने उसका नैरेटिव पूरी जाति के खिलाफ गढ़ दिया। सबसे अधिक नुकसान उस समाज को हुआ, जिसने सत्ता से सबसे अधिक उम्मीदें लगाई थीं। नेता बदलते रहे, लेकिन सामाजिक पूर्वाग्रह दशकों तक बने रहे।
क्या वही गलती अब कुशवाहा समाज के साथ?
आज वही पटकथा नए पात्रों के साथ लिखी जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय ढाल यादव समाज था, आज कुशवाहा समाज को ढाल बनाने की कोशिश हो रही है।
यह राजनीति सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी सेवा नहीं, बल्कि उनका सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान है। क्योंकि जिस दिन किसी मुख्यमंत्री की पहचान उसके काम से अधिक उसकी जाति से होने लगे, उसी दिन उसका जननेता से जातीय नेता में अवमूल्यन शुरू हो जाता है।
जवाबदेही का विकल्प नहीं है जातीय गोलबंदी
किसी मुख्यमंत्री को बचाने का सबसे सही तरीका यह नहीं है कि पूरी जाति को मैदान में उतार दिया जाए। सबसे सही तरीका यह है कि सरकार तथ्यों से जवाब दे, पारदर्शिता दिखाए और जनता का विश्वास जीते।
लोकतंत्र में आलोचना का उत्तर तर्क से दिया जाता है, ताकत के प्रदर्शन से नहीं। सवालों का जवाब दस्तावेज़ देते हैं, जातीय रैलियाँ नहीं। मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा प्रशासनिक ईमानदारी से बनती है, लाखों की भीड़ के दावों से नहीं।
नागमणि शायद यह भूल रहे हैं कि राजनीति में सबसे खतरनाक मित्र वही होता है, जो नेता की रक्षा के नाम पर उसे समाज से काट दे।
प्रेमचंद की कहानी का राजनीतिक सच
प्रेमचंद की कहानी में रक्षा करते-करते हत्या हो जाती है। बिहार की राजनीति में कहीं ऐसा न हो कि सम्राट चौधरी की रक्षा करते-करते उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता ही घायल कर दी जाए। तब इतिहास लिखेगा कि हमला विपक्ष ने नहीं, बल्कि बचाव का दावा करने वालों ने किया था।
