अभय वाणीः भरत तिवारी की मौत ने बिहार में एक पुराना और असहज सवाल फिर खड़ा कर दिया है—पुलिस की गोली से मारा गया व्यक्ति शहीद कहलाएगा या अपराधी? यह सवाल नया नहीं है। करीब पाँच दशक पहले यही बहस जगदेव प्रसाद की मौत के बाद भी उठी थी। 5 सितंबर 1974 को कुर्था में पुलिस गोलीबारी में उनकी मृत्यु हुई और बाद में उन्हें शहीद का सम्मान मिला। उनकी प्रतिमा लगी, सड़कें उनके नाम पर हुईं और वे सामाजिक न्याय के संघर्ष का प्रतीक बने। आज, उसी विरासत के बीच, भरत तिवारी की मौत ने वही पुराना सवाल नए सिरे से समाज के सामने रख दिया है।
बदलती परिभाषाएँ, बदलते नजरिए
लेकिन इतिहास का एक कठिन सच यह भी है कि समय के साथ उसकी व्याख्याएँ बदलती रहती हैं। आज जगदेव बाबू के पुत्र पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणी का यह कहना कि “पुलिस की गोली से मरने वाला हर व्यक्ति शहीद नहीं होता; वह अपराधी, कुत्ता-बिल्ली या कोई भी हो सकता है”—सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि शहादत की परिभाषा पर गंभीर बहस का विषय है। यह विडंबना भी है कि जिस राजनीतिक विरासत की नींव एक पुलिस गोलीबारी से बनी, उसी विरासत का उत्तराधिकारी आज शहादत की कसौटी को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
भरत तिवारी प्रकरण: अपराध या प्रतिरोध?
यही बहस आज भरत तिवारी प्रकरण में भी दिखाई देती है। भरत की मौत भी पुलिस की गोली से हुई। एक पक्ष का कहना है कि वह अपराधी था, उसने पुलिस के खिलाफ हथियार उठाया और कानून ने अपना काम किया। वहीं आम जनमानस का एक वर्ग इसे अलग नजरिए से देखता है। उनका तर्क है कि भरत व्यवस्था की खामियों, भ्रष्टाचार और लगातार अनसुनी से उपजे आक्रोश का प्रतीक था। उसने हथियार जरूर उठाए, लेकिन उसकी मंशा निजी अपराध नहीं बल्कि व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध थी। साथ ही यह आरोप भी सामने आए हैं कि आत्मसमर्पण के बाद उसे हिरासत में लेकर गोली मारी गई।
जांच, सच और प्रतीक्षा
बहरहाल, भरत की मौत किन परिस्थितियों में हुई और उसके पीछे वास्तविक तथ्य क्या हैं, इस पर अभी जांच जारी है। जब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो जाती, तब तक इस मामले में किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी। भरत का नाम इतिहास में अपराधियों की सूची में लिखा जाएगा या शहीदों की पंक्ति में, यह फैसला अभी वक्त और सच के सामने आने पर ही होगा।
बड़ा सवाल: शहादत की कसौटी क्या है?
लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु का अर्थ केवल उसके खिलाफ दर्ज आरोपों से तय होगा, या उस सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ से भी, जिसने उसे उस रास्ते पर धकेला? अगर व्यवस्था के खिलाफ उठी आवाज़ एक दौर में शहादत बन सकती है, तो दूसरे दौर में वही प्रतिरोध अपराध कैसे बन जाता है?
इतिहास का फैसला बनाम सत्ता का फैसला
समस्या यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। असली समस्या यह है कि हमारे समाज में शहादत और अपराध की रेखा अक्सर सत्ता, समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती दिखती है। इतिहास हमें सिखाता है कि हर विद्रोही अपराधी नहीं होता, और हर मारा गया व्यक्ति शहीद भी नहीं होता। लेकिन इन दोनों के बीच की दूरी तय करने का अधिकार केवल सत्ता के पास भी नहीं होना चाहिए।
क्योंकि जब न्याय की परिभाषा बदलती रहती है, तब इतिहास सवाल पूछता है—और उन सवालों का जवाब देना समाज की जिम्मेदारी होती है।
