ले लोटाः भारत के राजनेता लोकतंत्र के ऐसे जादूगर हैं, जो अपनी टोपी से कभी विकास, कभी वादा और कभी हर समस्या का समाधान निकाल लेते हैं। चुनाव आते ही उनका हृदय इतना विशाल हो जाता है कि हर मतदाता अचानक चचेरा, मौसेरा, ममेरा, फूफेरा भाई या दूर का रिश्तेदार बन जाता है। चाय की दुकानों पर बैठकर वे देश बचाते हैं, और सड़क के गड्ढों में भविष्य का ब्लूप्रिंट खोजते हैं।
वादों की ऐसी फसल बोई जाती है कि सुनने वाले को लगे-बस अगली सुबह स्वर्ग का उद्घाटन यहीं होने वाला है। चुनाव से पहले उनकी विनम्रता इतनी बढ़ जाती है कि सड़क का हर पत्थर भी उन्हें प्रणाम करता दिखाई देता है। घर-घर जाकर हाल पूछते हैं, मानो बरसों से खानदानी रिश्ता निभा रहे हों।
लेकिन जीतते ही दृश्य बदल जाता है। मोबाइल नंबर बदल जाते हैं, चेहरे पर काला चश्मा चढ़ जाता है और महंगी गाड़ियों में बैठकर जनसेवक सीधे जेड-प्लस सुरक्षा के घेरे में प्रवेश कर जाते हैं। वही जनता, जो कल तक “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों” थी, अब बैरिकेड के उस पार खड़ी दिखाई देती है। भाषणों में त्याग की गंगा और व्यवहार में सुविधा की यमुना बहती है।
घोटाले पर सवाल पूछिए तो जवाब मिलता है-“यह विपक्ष की साजिश है।” विपक्ष से पूछिए तो वही संवाद उधर से लौट आता है। जनता हर पाँच साल में फिर ताली बजाती है, नई स्याही से वोट डालती है और मन ही मन सोचती है-शायद इस बार जादू नहीं, सचमुच काम दिखाई देगा।
