अभय वाणीः नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति की सबसे मजबूत पहचान परिवारवाद के विरोध से बनाई। वे बार-बार कहते रहे कि राजनीति किसी परिवार की निजी जागीर नहीं हो सकती। लालू यादव और कांग्रेस समेत तमाम दलों पर उनका सबसे बड़ा हमला यही होता था कि उन्होंने सत्ता को परिवार के भीतर सीमित कर दिया है। लेकिन वक्त ने आखिरकार नीतीश कुमार को भी उसी मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां भारतीय राजनीति अक्सर पहुंच जाती है। लंबे इंतजार के बाद उन्होंने अपने इकलौते बेटे निशांत कुमार को राजनीति में उतार दिया और सीधे बिहार का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया।
राजा का बेटा राजा बने – भारतीय लोकतंत्र में यह अब असामान्य नहीं रहा। इसलिए निशांत के सीधे मंत्री बनने पर मुझे कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन उनकी राजनीतिक सफलता को लेकर संशय जरूर है, क्योंकि मैंने निशांत कुमार को हमेशा अशांत देखा है।
अशांत दिखने वाली मौजूदगी
निशांत कुमार जब भी सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए, वे अक्सर असहज नजर आए। कैमरे के सामने उनका आत्मविश्वास कभी स्वाभाविक नहीं दिखा। भीड़, मंच और राजनीतिक माहौल में उनकी बॉडी लैंग्वेज कई बार संकोची और बेचैन लगी।
राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कहते हैं। और निशांत का चेहरा अब तक एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा लगा है, जो सत्ता के लिए तैयार कम और सत्ता के बीच धकेला गया ज्यादा दिखाई देता है। यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद उनके व्यक्तित्व पर चर्चा ज्यादा हो रही है और राजनीति कम।
बिना संघर्ष सीधे मंत्री
बिहार की राजनीति में नेता बनने के लिए लंबी राजनीतिक तपस्या करनी पड़ती है। सड़क से सदन तक का सफर तय करना पड़ता है। खुद नीतीश कुमार ने भी यह सफर तय किया है, लेकिन निशांत कुमार ने राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय सीधे सत्ता की लिफ्ट पकड़ ली।
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न संगठन में लंबा काम, न चुनावी संघर्ष, न जनता के बीच सक्रिय राजनीति। फिर भी सीधे बिहार जैसे बड़े और चुनौतीपूर्ण राज्य का स्वास्थ्य मंत्रालय। यहीं से परिवारवाद पर नीतीश कुमार की पूरी राजनीति सवालों के घेरे में आ जाती है।
बिहार की सेहत अब अशांत निशांत के हाथ में
स्वास्थ्य मंत्रालय कोई हल्का विभाग नहीं है। यह बिहार के अस्पतालों, डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की व्यवस्था, एंबुलेंस नेटवर्क और गांवों तक चिकित्सा पहुंचाने की जिम्मेदारी वाला विभाग है।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही सवालों में रही है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली, डॉक्टरों की कमी और इलाज के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता जैसे मुद्दे लगातार सरकार को घेरते रहे हैं। अब ऐसे विभाग की जिम्मेदारी एक ऐसे चेहरे को दी गई है, जिसकी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक पकड़ दोनों अभी अपरीक्षित हैं। यानी बिहार की सेहत अब “अशांत निशांत” के हाथ में है।
सबसे बड़ी विडंबना
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस नेता ने परिवारवाद के खिलाफ राजनीति की सबसे ऊंची दीवार खड़ी की, आखिरकार वही अपने बेटे को उत्तराधिकारी बनाने पर मजबूर दिखे।
यह सिर्फ निशांत कुमार की एंट्री की कहानी नहीं है। यह उस राजनीति की कहानी भी है, जहां सिद्धांत अंततः सत्ता के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
अब देखना यह है कि निशांत कुमार सिर्फ नीतीश कुमार के बेटे बनकर रह जाते हैं या सचमुच बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बना पाते हैं।
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