पटनाः बिहार की राजनीति में कुछ नाम सिर्फ चुनावी आंकड़ों से नहीं, बल्कि किस्सों, दास्तानों और टकरावों से पहचाने जाते हैं। अनंत सिंह उन्हीं नामों में से एक हैं। उनके जीवन की कहानी (Anant Singh Story) सीधी रेखा में नहीं चलती-यह गांव की पगडंडियों, साधु-संतों की कुटिया, खून से सनी दुश्मनी, जेल की सलाखों और विधानसभा की चौखट तक फैली एक लंबी, उलझी और तीखी यात्रा है।
जन्म और जड़ों की जमीन
अनंत कुमार सिंह उर्फ आनंत सिंह का जन्म 1961 में पटना जिला स्थित मोकामा क्षेत्र के लदमा गाँव में एक भूमिहार परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े अनंत बचपन से ही दबंग मिजाज और नेतृत्व प्रवृत्ति के माने जाते थे। शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्कूलों में हुई। पढ़ाई में मन नहीं लगा इसलिए औपचारिक रूप से बहुत लंबी नहीं चली, लेकिन व्यवहारिक समझ और सामाजिक समीकरणों को साधने की कला उन्होंने कम उम्र में ही सीख ली थी। गांव की चौपाल, खेत-खलिहान और जातीय-सामाजिक समीकरण-यही उनके असली ‘क्लासरूम’ थे।
हरिद्वार का अध्याय: वैराग्य की तलाश
युवावस्था में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने घर-परिवार की हलचल से दूरी बना ली। कहा जाता है कि वे कुछ समय के लिए घर छोड़कर हरिद्वार चले गए, जहां साधु-संतों के बीच रहे। गंगा किनारे का वह समय उनके स्वभाव का दूसरा पहलू गढ़ता है-एक ऐसा पक्ष जो आध्यात्मिकता, पूजा-पाठ और धार्मिक आस्था से जुड़ा है। तमाम राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी उनका झुकाव धर्म और अनुष्ठानों की ओर बना रहा। हरिद्वार का वह अध्याय उनके जीवन का शांत, लेकिन प्रभावशाली मोड़ माना जाता है।
खून का घाव: भाई की हत्या
लेकिन नियति ने Anant Singh को साधु जीवन में ठहरने नहीं दिया। बिहार के बाहुबली नेता अनंत सिंह चार भाइयों में से एक हैं। परिवार पर एक के बाद एक संकट टूटे-उनके दो भाइयों, विरंचि सिंह और फोजो सिंह, की अलग-अलग समय पर हत्या कर दी गई। इन हत्याओं ने मोकामा और आसपास के इलाकों में गहरा असर डाला और लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति और आपराधिक समीकरणों पर चर्चा का केंद्र बनी रहीं।
कुछ रिपोर्टों में अनंत सिंह के एक अन्य भाई दिलीप सिंह का भी जिक्र मिलता है, जो लालू-राबड़ी सरकार के दौर में मंत्री रहे थे। हालांकि हत्या की घटनाओं को लेकर वर्षों तक आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी प्रक्रियाएं चलती रहीं, लेकिन विरंचि सिंह की हत्या को उस दौर की निर्णायक घटना माना जाता है, जिसने अनंत सिंह के जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल दी।
प्रतिशोध से प्रभाव तक
भाई की हत्या ने अनंत सिंह के भीतर आग भर दी। कहा जाता है कि Anant Singh ने इस घटना को व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया और बदला लेने का संकल्प किया। इसी दौर में उनकी छवि एक सख्त, प्रतिशोधी और प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरकर सामने आई। समर्थकों के बीच वे ‘छोटे सरकार’ कहलाने लगे-एक ऐसा संबोधन जो डर, सम्मान और प्रभाव तीनों का मिश्रण था। उन्होंने अपने प्रभाव को संगठित शक्ति में बदला और स्थानीय समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभानी शुरू की।
राजनीति में औपचारिक प्रवेश
2005 में Anant Singh ने मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर औपचारिक रूप से राजनीति में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2010 और 2015 में भी जीत दर्ज कर उन्होंने खुद को क्षेत्र का अडिग चेहरा साबित किया। अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ उनका सफर रहा, लेकिन उनकी असली ताकत पार्टी से ज्यादा व्यक्तिगत जनाधार में दिखी। समर्थकों का मानना था कि वे “अपने आदमी” हैं-जो संकट में साथ खड़ा रहता है।
विवादों के बीच कायम प्रभाव
उनका राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। कानूनी मामलों, आरोपों और जेल तक की यात्राओं ने उनकी छवि को दो ध्रुवों में बांटा-एक ओर आलोचक, दूसरी ओर अंध-समर्थक। लेकिन हर बार वे राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहे। यह उनकी जमीनी पकड़ और सामाजिक समीकरणों की गहरी समझ का परिणाम था।
जेल से रिश्ता: सियासत और सलाखें
अनंत सिंह के राजनीतिक जीवन में जेल भी एक स्थायी अध्याय की तरह जुड़ता रहा है। विभिन्न मामलों में गिरफ्तारी, जेल यात्राएं और कानूनी लड़ाइयों ने उनकी छवि को और जटिल बनाया। आलोचकों ने इसे आपराधिक पृष्ठभूमि से जोड़ा, जबकि समर्थकों ने इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम बताया। हाल के वर्षों में भी उन्हें सजा और जेल जाने की स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसने एक बार फिर उन्हें सुर्खियों में ला खड़ा किया। दिलचस्प यह रहा कि जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए भी उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ-उनका नाम और नेटवर्क सक्रिय बना रहा।
शौक, शैली और व्यक्तित्व
अनंत सिंह का व्यक्तित्व सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्हें घुड़सवारी और पशुपालन का शौक बताया जाता है। पारंपरिक हथियारों और आधुनिक बंदूकों के प्रति रुचि की चर्चा भी अक्सर होती रही है। महंगी गाड़ियों का काफिला, खास अंदाज की टोपी और काला चश्मा-उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बन चुके हैं। धार्मिक अनुष्ठान, भव्य पूजा-पाठ और सामाजिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेना उनकी पहचान का दूसरा पहलू है। गांव में बड़े पैमाने पर भोज देना, समर्थकों के बीच बैठकर लंबी बातचीत करना और अपने अंदाज में फैसले सुनाना-यह सब उनकी शैली का हिस्सा है।
मीडिया से संवाद: टकराव और ठसक
अनंत सिंह का मीडिया से रिश्ता भी कम दिलचस्प नहीं रहा। कैमरों के सामने उनका अंदाज हमेशा बेबाक और बिना लाग-लपेट के जवाब देने वाला रहा है। वे सवालों से बचने के बजाय कई बार सीधा और चुनौतीपूर्ण जवाब देते दिखे। उनके बयान अक्सर सुर्खियों में रहे-कभी विवाद की वजह से, तो कभी अपने ठेठ अंदाज के कारण। मीडिया के साथ उनका संवाद एक तरह से उनकी राजनीतिक शैली का विस्तार ही रहा-सीधा, आक्रामक और आत्मविश्वासी।
दर्द से गढ़ी गई राजनीति
उनकी कहानी में आध्यात्मिकता भी है और सख्ती भी; निजी त्रासदी भी है और सार्वजनिक शक्ति भी। भाई की हत्या ने उन्हें तोड़ा नहीं-उन्हें राजनीतिक रूप से गढ़ दिया। हरिद्वार की शांति से लेकर मोकामा की सियासी तपिश तक, अनंत सिंह का जीवन एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जिसने दर्द को कमजोरी नहीं बनने दिया। बिहार की राजनीति में वे सिर्फ एक विधायक नहीं, बल्कि एक प्रतीक बनकर उभरे-वर्चस्व, विवाद और अडिग जिद के प्रतीक। यही कारण है कि उनकि कथा को लोग ‘बेअंत’ कहते हैं-क्योंकि इसमें मोड़ खत्म नहीं होते, सिर्फ अध्याय बदलते रहते हैं।
