अभय वाणीः बिहार में बाढ़ की तस्वीर 11 सितंबर तक और गंभीर हो चुकी है। 15 जिलों में 47.33 लाख से अधिक लोग प्रभावित हैं और गंगा तथा उसकी सहायक नदियां कई जगह खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। भागलपुर में अलग-अलग स्थानों पर तटबंधों में कम-से-कम चार जगह कटाव या टूटने की सूचना है; कुछ जगह मरम्मत हो चुकी है, जबकि बाकी स्थानों पर काम जारी है। उधर उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की सरयू खतरे के निशान से ऊपर है, कानपुर के पांच गांवों में गंगा का पानी पहुंच चुका है और प्रयागराज में टोंस-बेलन के दबाव से गंगा-यमुना के जलस्तर को लेकर चिंता बनी हुई है। यानी यह सिर्फ बिहार की बाढ़ नहीं, बल्कि बड़े नदी-तंत्र की समस्या है।
लेकिन इस बाढ़ की सबसे बड़ी पहेली यही है कि आखिर बिहार में इतना पानी आया कहां से? क्योंकि 1 जून से 8 सितंबर के बीच बिहार में सामान्य से करीब 27 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। इस अवधि में राज्य में 601.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई। यानी मानसून के बड़े हिस्से में बिहार बाढ़ से नहीं, बल्कि बारिश की कमी से जूझ रहा था। फिर सितंबर की शुरुआत में अचानक नदी का व्यवहार बदला और कुछ ही दिनों में वही राज्य भीषण बाढ़ की चपेट में आ गया। यही विरोधाभास इस बार की बाढ़ को समझने की पहली कुंजी है।
बिहार में पानी सिर्फ बिहार से नहीं आता
दरअसल, बिहार की बाढ़ को केवल बिहार में हुई बारिश के आंकड़े से समझना ही गलत शुरुआत होगी। बिहार की कई बड़ी नदियों का जलग्रहण क्षेत्र राज्य की सीमाओं से बहुत बाहर है। उत्तर बिहार की नदियां हिमालय और नेपाल के ऊपरी क्षेत्रों से पानी और गाद लेकर आती हैं, जबकि गंगा का विशाल बेसिन उत्तर प्रदेश, झारखंड और दूसरे हिस्सों से आने वाले प्रवाह को भी समेटता है। इसलिए किसी नदी का बिहार में बढ़ना जरूरी नहीं कि उसी नदी के बिहार वाले हिस्से में हुई भारी बारिश का सीधा परिणाम हो। नदी की पूरी यात्रा, उसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र और रास्ते में आने वाले दूसरे प्रवाह को साथ देखकर ही तस्वीर साफ होती है।
यही कारण है कि हर बार बाढ़ के लिए सिर्फ नेपाल को जिम्मेदार ठहरा देना आसान जरूर है, लेकिन इस बार उपलब्ध आंकड़े उससे कहीं अधिक जटिल कहानी बताते हैं। भारतीय एक्सप्रेस की 10 सितंबर की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, इस बार नेपाल से आने वाली नदियों का असामान्य उफान मुख्य कारण नहीं था; बिहार में बाढ़ का पैटर्न स्थानीय मौसम और पड़ोसी भारतीय राज्यों में हुई बारिश से भी गहराई से जुड़ा था। नेपाल की भूमिका कभी नहीं होती, ऐसा भी नहीं है। सही बात यह है कि बिहार की बाढ़ साझा नदी-बेसिन की समस्या है, जिसे किसी एक देश, राज्य या एक दिन की बारिश के खाते में डाल देना अधूरा निष्कर्ष है।
जब गंगा ने अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए
इस बार गंगा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देती है। पटना के गांधी घाट पर 5 सितंबर को गंगा 50.58 मीटर तक पहुंची, जो 2016 के 50.52 मीटर के पिछले उच्चतम बाढ़ स्तर से ऊपर थी। भागलपुर के सुल्तानगंज में भी नदी 36.80 मीटर तक पहुंची, जबकि वहां पिछला उच्चतम स्तर 36.75 मीटर था। जब मुख्य नदी पहले ही असाधारण ऊंचाई पर बह रही हो, तब उससे जुड़ी सहायक नदियों और निचले इलाकों का पानी तेजी से निकल नहीं पाता। कई जगह बैकवाटर जैसी स्थिति बन सकती है और जलनिकासी की समस्या बढ़ती है। इसलिए बाढ़ को केवल ‘ऊपर से कितना पानी आया’ से नहीं, बल्कि ‘नीचे नदी में पानी निकलने की कितनी जगह और क्षमता बची’ से भी समझना होगा।
यहीं बिहार की भौगोलिक स्थिति इस संकट को और गंभीर बनाती है। राज्य का बड़ा हिस्सा निचला और समतल है। उत्तर बिहार की अनेक नदियां हिमालय से उतरते समय भारी मात्रा में गाद लाती हैं। वर्षों से नदी तल, चैनलों और आसपास के जलनिकासी तंत्र में जमा होती गाद नदी की वहन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। दूसरी तरफ शहरों और गांवों का विस्तार, प्राकृतिक जलमार्गों का सिकुड़ना, सड़कों और अन्य संरचनाओं से पानी के रास्ते बाधित होना तथा जलनिकासी की कमजोर व्यवस्था बाढ़ के पानी को ज्यादा देर तक रोके रखती है। इनका साझा परिणाम पानी का ज्यादा फैलाव और ठहराव है।
तटबंध: सुरक्षा भी, सवाल भी
तटबंधों का सवाल इससे अलग नहीं है। तटबंध जरूरी हैं क्योंकि वे आबादी और खेती को नदी की सीधी मार से बचाते हैं, लेकिन तटबंध अपने आप में बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं हैं। उनकी गुणवत्ता, ऊंचाई, चौड़ाई, नींव, पुराने कमजोर हिस्से और नियमित निरीक्षण उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 11 सितंबर को भागलपुर में कम-से-कम चार जगह तटबंधों में कटाव या टूटने की खबर सामने आना इसलिए सिर्फ एक दिन की प्रशासनिक चुनौती नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी है कि मानसून से पहले संवेदनशील हिस्सों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कितना प्रभावी था, कमजोर हिस्सों की पहचान और मरम्मत किस स्तर तक हुई थी और नदी के दबाव के बदलते स्वरूप के हिसाब से निगरानी कितनी लगातार की गई।
हालांकि यहां एक सावधानी भी जरूरी है। किसी तटबंध के टूटने की खबर अपने आप यह साबित नहीं करती कि उसकी मरम्मत में लापरवाही हुई थी। अत्यधिक जलदबाव, कटाव और नदी की धारा का अचानक बदलना भी तटबंध को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए राजनीतिक आरोपों से पहले तकनीकी जांच जरूरी है। लेकिन हर साल बाढ़ के दौरान तटबंध टूटने के बाद सिर्फ आपात मरम्मत कर देना और अगले साल फिर उसी चक्र में लौट जाना भी समाधान नहीं है। तटबंधों की जवाबदेही और रखरखाव को नियमित, पारदर्शी और मापने योग्य व्यवस्था बनाना होगा।
नदियां सीमाएं नहीं मानतीं
बिहार और उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्थिति एक और बड़ी सच्चाई सामने रखती है—नदियां राज्य की सीमाएं नहीं मानतीं। गोरखपुर में सरयू का बढ़ना, कानपुर के गांवों में गंगा का पानी पहुंचना और प्रयागराज में टोंस-बेलन के दबाव से गंगा-यमुना की चिंता यह बताती है कि एक जिले या एक राज्य में लिया गया फैसला पूरे नदी तंत्र को प्रभावित कर सकता है। पानी के प्रबंधन को इसलिए जिला-स्तर की राहत व्यवस्था से ऊपर उठाकर नदी-बेसिन स्तर पर देखना होगा। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, केंद्र और नेपाल के बीच आंकड़ों और पूर्वानुमानों का वास्तविक समय में साझा होना इसी दिशा में पहला कदम हो सकता है।
आज राहत और बचाव पहली प्राथमिकता है। लेकिन नाव, सामुदायिक रसोई, राहत शिविर और तटबंध मरम्मत को ही बाढ़ प्रबंधन का मुख्य मॉडल मान लेना पर्याप्त नहीं है। मुआवजा जरूरी है, मगर उससे खेतों की गाद, टूटे घर और अगली बाढ़ का डर खत्म नहीं होता। बाढ़ को आपदा मानकर केवल उसके आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे एक स्थायी जल-प्रबंधन चुनौती के रूप में देखना होगा।
असली जरूरत नदी-बेसिन की योजना
इसके लिए सबसे पहले पूरे नदी-बेसिन का वास्तविक समय वाला डेटा तंत्र मजबूत करना होगा। बारिश, नदियों का जलस्तर, बैराज से छोड़ा गया पानी, तटबंधों का दबाव और जलनिकासी की स्थिति को एक साझा कमांड सिस्टम में देखना होगा। बाढ़ पूर्वानुमान गांव और पंचायत स्तर तक उपयोगी होना चाहिए, ताकि लोगों को पता चले कि पानी कब तक पहुंच सकता है और उन्हें कहां जाना है। चेतावनी केवल प्रशासनिक प्रेस नोट न रहे, बल्कि जमीन पर कार्रवाई का आधार बने।
दूसरा बड़ा काम फ्लडप्लेन यानी बाढ़ के प्राकृतिक फैलाव वाले क्षेत्रों को लेकर करना होगा। नदी के किनारे ऐसे इलाकों में स्थायी निर्माण, सड़क और दूसरी संरचनाएं किस तरह पानी के प्रवाह को प्रभावित कर रही हैं, इसका वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। जहां प्राकृतिक जलनिकासी के रास्ते बंद हो चुके हैं, वहां उन्हें पुनर्जीवित करना होगा। शहरों के लिए ड्रेनेज योजना और गांवों के लिए जलनिकासी व्यवस्था को अलग-अलग परियोजनाओं की तरह देखने के बजाय नदी तंत्र से जोड़ना होगा। गाद और नदी की बदलती धारा की निगरानी भी इसी स्थायी योजना का हिस्सा होनी चाहिए।
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तीसरा सवाल तटबंधों का है। केवल बजट खर्च होने को तटबंध सुरक्षा का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हर संवेदनशील तटबंध का डिजिटल रिकॉर्ड, मरम्मत का इतिहास, तकनीकी निरीक्षण, कमजोर बिंदु और जिम्मेदार एजेंसी सार्वजनिक होनी चाहिए। मानसून से पहले और मानसून के दौरान स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट की व्यवस्था हो, ताकि तटबंध टूटने के बाद दोष खोजने की बजाय पहले से जोखिम कम किया जा सके। जहां तटबंध बनाना ही समस्या को दूसरी जगह धकेलता है, वहां वैकल्पिक बाढ़ प्रबंधन उपायों पर भी विचार होना चाहिए।
राहत से आगे की राजनीति
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार को बाढ़ के साथ जीने की मजबूरी को बाढ़ के सामने स्थायी बेबसी में नहीं बदलना चाहिए। बिहार की भौगोलिक वास्तविकता ऐसी है कि यहां बाढ़ को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं हो सकता, लेकिन बाढ़ से होने वाली तबाही को कम करना पूरी तरह असंभव भी नहीं है। इसके लिए राहत से आगे बढ़कर नदी, जलग्रहण क्षेत्र, तटबंध, गाद, जलनिकासी, भूमि उपयोग और मौसम पूर्वानुमान—इन सभी को एक ही नीति में जोड़ना होगा।
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आज सवाल यह नहीं है कि इस बार बाढ़ क्यों आई और किसे दोष दिया जाए। असली सवाल यह है कि जब हमें पता है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह भूभाग हर साल बाढ़ के जोखिम में रहता है, जब हमारे पास नदियों का दशकों का रिकॉर्ड है और जब तकनीक पहले से बेहतर है, तो फिर हर बड़ी बाढ़ हमारे सामने वही पुरानी तस्वीर क्यों छोड़ जाती है—डूबे गांव, टूटी सड़कें, कमजोर तटबंध, नावों पर निर्भर जिंदगी और राहत की प्रतीक्षा करते लोग? इस सवाल का जवाब सिर्फ मौसम के पास नहीं है। इसका एक बड़ा हिस्सा हमारी योजना, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे सिस्टम के पास है।
पानी को रोकना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होगा। लेकिन पानी से होने वाली तबाही कितनी होगी, यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। बिहार और उत्तर प्रदेश की मौजूदा बाढ़ इसी फर्क को समझने का मौका है। अगर इस बार भी पूरा ध्यान सिर्फ राहत बांटने और पानी उतरने का इंतजार करने तक सीमित रहा, तो अगली बाढ़ फिर यही सवाल लेकर आएगी। और तब जवाब देने के लिए हमारे पास शायद फिर वही पुरानी दलील होगी—बारिश ज्यादा हो गई थी।
