पटनाः बिहार में मानव तस्करी की समस्या लगातार भयावह होती जा रही है। National Crime Records Bureau (NCRB) और National Human Rights Commission (NHRC) की हालिया रिपोर्टों ने राज्य की चिंताजनक स्थिति को सामने ला दिया है। रिपोर्टों के अनुसार मानव तस्करी के मामलों में बिहार देश के सबसे प्रभावित राज्यों में शामिल है। महिलाओं और बच्चों की तस्करी के बढ़ते मामलों ने प्रशासन और मानवाधिकार संस्थाओं दोनों की चिंता बढ़ा दी है (Bihar human trafficking crisis)।
NHRC की चिंता और लापता लोगों के आंकड़े
NHRC ने मार्च 2026 में बिहार में बढ़ते लापता लोगों और मानव तस्करी के मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया। आयोग के अनुसार बिहार में हर साल 12 से 14 हजार लोगों के लापता होने के मामले दर्ज हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। रिपोर्ट में कहा गया कि NCRB के आंकड़ों के मुताबिक मानव तस्करी के सबसे अधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना, राजस्थान और महाराष्ट्र में दर्ज किए गए हैं। आयोग ने बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है।
NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं
NCRB के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि मानव तस्करी देशभर में तेजी से बढ़ती चुनौती बन चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में देशभर में मानव तस्करी के 2,250 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में हजारों लोगों को तस्करी का शिकार बनाया गया, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। बिहार उन राज्यों में शामिल रहा जहां तस्करी और लापता बच्चों के मामले लगातार बढ़े हैं।
मानव तस्करी के पीछे की बड़ी वजहें
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और बड़े पैमाने पर पलायन मानव तस्करी की सबसे बड़ी वजह हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं। इसी का फायदा उठाकर तस्कर गरीब परिवारों को नौकरी, बेहतर जीवन और शादी का झांसा देकर महिलाओं और बच्चों को बाहर ले जाते हैं। बाद में उन्हें बंधुआ मजदूरी, घरेलू दासता, बाल श्रम और देह व्यापार जैसी अमानवीय परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है।
बाल तस्करी सबसे बड़ी चुनौती
एक अध्ययन के अनुसार बिहार में बाल तस्करी सबसे गंभीर समस्या बन चुकी है। राज्य के कई जिलों से बच्चों को राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में ले जाए जाने के मामले सामने आए हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि सीमित शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण गरीब परिवार आसानी से दलालों के जाल में फंस जाते हैं।
सरकार और पुलिस की कार्रवाई
बिहार पुलिस और सरकार ने मानव तस्करी रोकने के लिए एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU), रेलवे स्टेशन निगरानी, बाल संरक्षण इकाइयों और विशेष अभियान शुरू किए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। जब तक रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक इस अपराध पर पूरी तरह नियंत्रण संभव नहीं होगा।
सामाजिक और मानवाधिकार संकट बनता अपराध
मानव तस्करी अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह बिहार में सामाजिक और मानवाधिकार संकट का रूप ले चुका है। NCRB और NHRC की रिपोर्टें साफ संकेत देती हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
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