‘हिन्दी की जमीन’ नहीं पकड़ पा रहे विदेशी प्रकाशक- डॉ. नामवर सिंह

न्यूज़ डेस्क
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नई दिल्ली: नामचीन समालोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा था कि हिन्दी में आने वाले प्रकाशक वास्तव में ‘हिन्दी की जमीन’ को नहीं पकड़ पा रहे हैं। इनमें साम्राज्यवादी सोच का भी प्रभाव है। डॉ. नामवर सिंह ने बातचीत में कहा था कि हिन्दी में पुस्तकें प्रकाशित करने वाले हकीकत में हिन्दी की जमीन को नहीं पकड पा रहे हैं। यही उनकी असफलता का सबसे बडा राज है। इसकी कारण मैकमिलन जैसा बडा प्रकाशक हिन्दी में आया। बाद में उसने हिन्दी प्रकाशन बंद कर दिया।

लेखक उत्तर भारत के गांव का

नामवर सिंह ने कहा, “शुरूआत में कोलकाता और मुंबई प्रकाशन उद्योग के केंद्र थे और सभी बडे लेखक एवं पत्रकार यहीं से आते थे। बाद में यह केंद्र इलाहाबाद चला गया और इस वक्त हिन्दी के प्रकाशन का केंद्र भले ही दिल्ली हो। मगर लेखक आज भी उत्तर भारत के गांव का होता है।“

आलोचना के बारे में नामवर जी कहते हैं कि साहित्य की इस विधा को हमेशा पक्षपातपूर्ण ही कहा जायेगा, क्योंकि आलोचक किसी की खुलकर बडाई नहीं कर सकता है। इसलिए इसके लिए समालोचक अधिक बेहतर शब्द है। उनके अनुसार “अभिव्यक्ति के दो माध्यम हैं ‘कलम’ और ‘जीभ’। और हिन्दी साहित्य में आलोचक दूसरी विधा का उपयोग अधिक करता है।“

संक्रमण के दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया

वह मानते हैं, “इलेक्ट्रानिक मीडिया इस वक्त संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इसकी खबरें भी विज्ञापन लगती हैं। साहित्य भी जनसंचार है और एक तरह से मीडिया का हिस्सा है। मगर इस माध्यम में साहित्य के लिए कोई स्थान ही नहीं है।“

उन्होंने कहा, “अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद तो अभी शुरू हुआ है। इसकी शुरूआत में तो विदेशी प्रकाशक हिन्दी की बेस्टसेलर किताब का अंग्रेजी में अनुवाद करते थे। इन प्रकाशकों ने राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गांव’ और श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ के अंग्रेजी अनुवाद छापे थे।

हिन्दी के बढते बाजार को देखते हुए पेंग्विन, हॉर्पर कालिन्स और मैकमिलन जैसे बडे प्रकाशक हिन्दी में आये। मगर ये अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित करने लगे। इन प्रकाशकों के लेखकों के साथ रिश्ते अच्छे नहीं है। इस कारण लेखकों में असंतोष रहता है। इसी कारण मैकमिलन ने हिन्दी का प्रकाशन बंद कर दिया।

हिन्दी के पाठक खास तरह की किताबें पसंद

नामवर सिंह ने कहा था कि अन्य भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों ने भी हिन्दी के बडे बाजार में कदम जमाने की कोशिश की। मगर सभी असफल हो जाते हैं। इसका बडा कारण जो मेरी समझ में आता है कि हिन्दी का पाठक खास तरह की किताबें पढना पसंद करता है। इसका अंदाजा दूसरी भाषाओं के प्रकाशक नहीं लगा पाते।

उनके अनुसार, “पुस्तक विक्रेता और किताबों के प्रकाशक में बहुत बडा अंतर होता है। बतौर प्रकाशक हिन्दी में कदम रखने वाले इसे नहीं समझ पाते हैं। कुकरमुत्ते की तरह हिन्दी में विफल होने वाले प्रकाशकों की लंबी फेहरिस्त है।“

हिन्दी के भविष्य के बारे में डॉक्टर साहब का मानना हैं कि वैश्विक बाजार हिन्दी ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं का बांह फैलाकर स्वागत कर रहा है। अब देखने वाली बात यह है कि भारतीय समाज इसे किस प्रकार ग्रहण करता है।

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