अभय वाणीः पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, वह महज़ दो कोचिंग संस्थानों का टकराव नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का विस्फोट था, जहाँ ज्ञान पीछे छूट चुका है और “ब्रांड”, “भीड़”, “प्रभाव” और “बाजार” आगे निकल चुके हैं। फैजल खान उर्फ खान सर और रौशन आनंद प्रकरण ने बिहार की कोचिंग इंडस्ट्री के उस चेहरे को सामने ला दिया, जिसे वर्षों से सफलता, मोटिवेशन और रिजल्ट के चमकदार पोस्टरों के पीछे छिपाया जाता रहा।
विवाद की शुरुआत और उसका विस्तार
मुसल्लहपुर हाट इलाके में खान सर के संस्थान के बाहर हुई हिंसा, तोड़फोड़, फायरिंग के आरोप और उसके बाद रौशन आनंद की गिरफ्तारी ने पूरे मामले को अचानक शिक्षा से उठाकर शक्ति संघर्ष में बदल दिया। पुलिस ने गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया, जबकि दूसरी ओर Raushan Anand ने इसे साजिश करार दिया। देखते ही देखते यह विवाद सोशल मीडिया, छात्र समूहों और समर्थकों की भीड़ के बीच “कोचिंग युद्ध” में बदल गया।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। असली सवाल यह है कि शिक्षा का यह माहौल आखिर बना कैसे?
शिक्षा नहीं, एक विशाल उद्योग
दरअसल बिहार समेत पूरे उत्तर भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब सिर्फ पढ़ाई नहीं रह गई है। यह एक विशाल उद्योग बन चुका है। लाखों बेरोजगार युवाओं की उम्मीदें, सरकारी नौकरी का सपना और परिवारों की आर्थिक मजबूरियाँ मिलकर कोचिंग संस्थानों को असाधारण ताकत देती हैं। एक सफल रिजल्ट हजारों नए एडमिशन लाता है, करोड़ों की फीस लाता है और उसी अनुपात में सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभाव भी पैदा करता है। यही कारण है कि अब कोचिंग संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल शिक्षा की नहीं, बाजार पर कब्जे की लड़ाई बन चुकी है।
शिक्षक से “ब्रांड” बनने तक
सोशल मीडिया ने इस लड़ाई को और तीखा कर दिया है। आज शिक्षक सिर्फ शिक्षक नहीं रहे। वे इन्फ्लुएंसर हैं, ब्रांड हैं, भीड़ जुटाने की क्षमता रखने वाले सार्वजनिक चेहरे हैं। उनके वीडियो लाखों लोग देखते हैं, उनके बयान वायरल होते हैं और उनके समर्थक किसी राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह Social Media पर सक्रिय रहते हैं। ऐसे में जब दो बड़े नाम आमने-सामने आते हैं, तो टकराव केवल संस्थानों का नहीं रह जाता, बल्कि “फॉलोअर बनाम फॉलोअर” की लड़ाई में बदल जाता है।
शिक्षा का अपराधीकरण
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू शिक्षा का अपराधीकरण है। जब कोचिंग संस्थानों के बाहर हिंसा होने लगे, हथियारों की चर्चा होने लगे, सुरक्षा गार्डों की गिरफ्तारी हो और छात्र सड़क पर शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बन जाएँ, तब यह मान लेना चाहिए कि शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। ज्ञान का स्थान अब प्रभाव ने ले लिया है और तर्क की जगह भीड़ खड़ी हो रही है।
सरकारी शिक्षा की विफलता
Khan Sir-Raushan Anand controversy ने एक और कड़वी सच्चाई उजागर की है-सरकारी शिक्षा व्यवस्था की विफलता। विश्वविद्यालय कमजोर होते गए, कॉलेजों का भरोसा टूटता गया और कोचिंग संस्थान समानांतर शिक्षा व्यवस्था बनते गए। आज लाखों छात्र विश्वविद्यालय से ज्यादा कोचिंग पर भरोसा करते हैं। डिग्री से ज्यादा “सेलेक्शन” महत्वपूर्ण हो गया है। शिक्षक से ज्यादा “ब्रांडेड सर” प्रभावशाली हो चुके हैं। शिक्षा धीरे-धीरे लोकतांत्रिक व्यवस्था से निकलकर निजी साम्राज्य में बदलती जा रही है।
राजनीति और कोचिंग का गठजोड़
राजनीति भी इस पूरी प्रक्रिया से अलग नहीं है। बड़े कोचिंग संस्थान अब केवल पढ़ाने वाले केंद्र नहीं रहे, बल्कि युवाओं की भावनाओं और जनमत को प्रभावित करने वाली ताकत बन चुके हैं। यही वजह है कि सरकारें भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पातीं। इस प्रकरण के बाद बिहार में कोचिंग संस्थानों को लेकर नई नीति की चर्चा शुरू होना इसी बदलती ताकत का संकेत है।
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
लेकिन इस पूरे संघर्ष में सबसे ज्यादा नुकसान किसका हो रहा है? न खान सर का, न रौशन आनंद का। सबसे ज्यादा नुकसान उस छात्र का हो रहा है जो गाँव से शहर आया है, जिसने परिवार की जमीन गिरवी रखकर फीस भरी है, जो नौकरी के सपने लेकर किताब खोलता है। उसे शिक्षा कम और गुटबाजी ज्यादा मिल रही है। उसे मार्गदर्शन कम और ब्रांड युद्ध ज्यादा दिखाई दे रहा है।
शिक्षा या साम्राज्य?
खान सर–रौशन आनंद प्रकरण दरअसल एक बड़े संकट का प्रतीक है। यह दिखाता है कि जब शिक्षा बाजार में बदल जाती है, तब ज्ञान पीछे छूट जाता है और वर्चस्व सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। जब शिक्षक संस्थानों से बड़े हो जाएँ, जब छात्र समर्थक सेना में बदल जाएँ और जब शिक्षा संवाद के बजाय टकराव पैदा करने लगे, तब समाज को रुककर यह सवाल पूछना ही होगा— क्या आप सचमुच पढ़ा रहे हैं, या शिक्षा के नाम पर नए साम्राज्य खड़े कर रहे हैं?
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