Saturday, May 30, 2026

फर्जी शपथपत्र से जमीन का म्यूटेशन! भोजपुर में तत्कालीन CO समेत कई पर FIR

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भोजपुरः जिले में जमीन दाखिल-खारिज से जुड़ा एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने राजस्व प्रशासन, जमीन रजिस्ट्री व्यवस्था और सरकारी कार्यप्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों तक दबा रहा यह मामला अब उस समय सुर्खियों में आ गया है जब पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्राथमिकी दर्ज कर ली है।

मामले में उदवंतनगर के तत्कालीन अंचलाधिकारी वकील प्रसाद सिंह, अंचल निरीक्षक अनिल कुमार सिंह, राजस्व कर्मचारी तारकेश्वर राम तथा कथित भू-माफियाओं को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि एक व्यक्ति के हिस्से की बहुमूल्य जमीन को फर्जी शपथपत्र, जाली हस्ताक्षर और कथित मिलीभगत के जरिए अवैध रूप से दाखिल-खारिज करा लिया गया। सभी के ऊपर BNS-2023 की धारा 318(4), 338 , 336(3), 340(2) और 61(2) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

“मेरे नाम से फर्जी शपथपत्र बना दिया गया”

पीड़ित नागेन्द्र पाण्डेय के मुताबिक, उनके पिता की पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर Partition Suit No. 255/11 व्यवहार न्यायालय, आरा में लंबित है। इसी बीच वर्ष 2017 में उनके छोटे भाई की विधवा पत्नी द्वारा अपने हिस्से से अधिक जमीन कुछ दबंग लोगों के हाथों बेच दी गई। जमीन की खरीदने वालों में बड़हरा थाना के ज्ञानपुर-सेमरिया निवासी जटाशंकर पाण्डेय, अख्तियारपुर निवासी हृदयानंद मिश्रा, बामपाली के सत्येन्द्र सिंह, जितेन्द्र कुमार सिंह तथा उमेश सिंह जैसे लोगों के नाम शामिल हैं। आरोप है कि इन सभी लोगों ने अंचलाधिकारी, सीआई और हल्का कर्मचारी से मिलीभगत कर विवादित जमीन का दाखिल-खारिज कराया।

नागेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि उन्होंने पहले ही संबंधित अंचलाधिकारी को लिखित आवेदन देकर दाखिल-खारिज रोकने का अनुरोध किया था। उस समय अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन भी दिया, लेकिन बाद में  पूरे मामले को दबाकर mutation कर दिया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि 10 फरवरी 2018 को आरा कोर्ट के नोटरी से उनके नाम का शपथपत्र तैयार कराया गया और उस पर जाली हस्ताक्षर कर यह दर्शाया गया कि उन्हें दाखिल-खारिज पर कोई आपत्ति नहीं है।

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“नोटिस नहीं, सुनवाई नहीं, फिर भी mutation”

मामले में सबसे बड़ा सवाल पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है। पीड़ित का दावा है कि उन्हें न तो किसी प्रकार का नोटिस दिया गया, न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया और न ही कथित शपथपत्र के संबंध में उनसे कोई सत्यापन किया गया। इसके बावजूद विवादित जमीन का दाखिल-खारिज कर दिया गया।

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी दाखिल-खारिज प्रक्रिया में प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक माना जाता है। ऐसे में यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक साजिश का मामला बन सकता है।

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पुलिस तक पहुंचा मामला, FIR दर्ज

पीड़ित ने इस मामले को लेकर लगातार प्रशासनिक स्तर पर प्रयास किए। उन्होंने पुलिस अधीक्षक, भोजपुर को आवेदन देकर जालसाजी और फर्जी हस्ताक्षर के आधार पर हुई कार्रवाई की शिकायत की। इसके बाद मामला संबंधित थाना तक पहुंचा। सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं और सरकारी पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर विचार-विमर्श किया गया। बाद में उपलब्ध दस्तावेजों, शिकायतों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर ली।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस द्वारा FIR दर्ज किया जाना पीड़ित के लिए बड़ी राहत है और यह दर्शाता है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में कानून अंततः संज्ञान लेता है। मामले में पुलिस की कार्रवाई को कानूनसम्मत और पीड़ित के लिए सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

“कानून से ऊपर कोई नहीं”

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार जाली हस्ताक्षर, फर्जी शपथपत्र तथा सरकारी अभिलेखों में कथित हेरफेर जैसे आरोप गंभीर संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि किसी सरकारी पदाधिकारी की भूमिका जांच में संदिग्ध पाई जाती है, तो कानून उसके विरुद्ध भी कार्रवाई की अनुमति देता है।

आरोपी अधिकारी पहले भी रहे चर्चा में

मामले में नामजद तत्कालीन अंचलाधिकारी वकील प्रसाद सिंह का नाम पहले भी चर्चा में आ चुका है। उनके विरुद्ध आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई किए जाने की खबरें पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं। हालांकि वर्तमान प्रकरण में उनकी भूमिका की पुष्टि अब पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

फोरेंसिक जांच की उठी मांग

पीड़ित ने अब मांग की है कि कथित शपथपत्र की फोरेंसिक जांच कराई जाए, हस्ताक्षरों का वैज्ञानिक परीक्षण हो तथा दाखिल-खारिज प्रक्रिया से जुड़े सभी अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि फोरेंसिक जांच में हस्ताक्षर फर्जी पाए जाते हैं, तो मामला और अधिक गंभीर हो सकता है।

“यह सिर्फ जमीन विवाद नहीं, सिस्टम की परीक्षा है”

भोजपुर में यह मामला अब आम चर्चा का विषय बन चुका है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या जमीन विवादों में संगठित तरीके से फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हो रहा है, क्या आम आदमी की आपत्ति और अधिकारों की अनदेखी की जा रही है और क्या प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता पर्याप्त है।

हालांकि, FIR दर्ज होने के बाद अब लोगों की नजर आगे की जांच पर टिकी हुई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या दोषियों तक कार्रवाई पहुंचती है। फिलहाल, पीड़ित परिवार ने प्राथमिकी दर्ज होने को “न्याय की दिशा में पहला बड़ा कदम” बताया है और निष्पक्ष जांच की उम्मीद जताई है।

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