Monday, June 22, 2026

भरत तिवारी एनकाउंटर: सच, सत्ता और इतिहास की कसौटी पर न्याय की तलाश

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अभय वाणीः भोजपुर के शाहपुर का भरत तिवारी प्रकरण इस वक्त सामाजिक और राजनीतिक—दोनों स्तरों पर बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। पुलिस का दावा है कि भरत तिवारी पर गंभीर आपराधिक आरोप थे और उसे पकड़ने गई टीम पर हमले के बाद जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी जिससे उसकी मौत हुई। वहीं परिजनों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह मुठभेड़ संदिग्ध परिस्थितियों में हुई और इसमें कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अब तक स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि यह मामला अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि न्याय और राज्यसत्ता की वैधता पर बहस का विषय बन गया है।

शासन और प्रशासन इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अनिवार्य कार्रवाई बता रहे हैं, जबकि आम आवाम, सामाजिक संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों का एक बड़ा वर्ग इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर परखने की मांग कर रहा है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का नहीं है; सवाल यह है कि क्या राज्य की हर कार्रवाई अपने आप में न्यायसंगत मान ली जानी चाहिए?

यहीं से उठता है मूल प्रश्न

यहीं से असली बहस शुरू होती है। समस्या पुलिस या कानून के अस्तित्व से नहीं है; समस्या उस सोच से है जो राज्यसत्ता को नैतिकता से ऊपर रख देती है। इतिहास गवाह है कि हर सत्ता न्यायपूर्ण नहीं रही। सत्ता अपने विरोध को अक्सर “कानून-व्यवस्था का खतरा” बताती रही है, जबकि समय और इतिहास बाद में तय करते हैं कि वह प्रतिरोध अन्याय के खिलाफ था या निजी हिंसा का माध्यम।

इतिहास की कसौटी और सत्ता का सच

अगर “राज्य को चुनौती देना” अपने आप में अपराध मान लिया जाए, तो फिर भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आज़ाद भी उसी कसौटी पर अपराधी ठहरेंगे—क्योंकि उन्होंने भी अपने समय की स्थापित राज्यसत्ता के खिलाफ हथियार उठाए थे। फर्क सिर्फ इतना है कि इतिहास ने उनके संघर्ष को अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के रूप में दर्ज किया।

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यह तुलना किसी व्यक्ति-विशेष के हर कर्म का महिमामंडन नहीं है, न ही किसी भी प्रकार की हिंसा को वैध ठहराने का प्रयास। लोकतंत्र में हिंसा—चाहे वह नागरिक की हो या राज्य की—दोनों को न्याय, नैतिकता और कानून की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। लेकिन यह मान लेना कि “राज्य जो करे वही सही”—यह सोच लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यही मानसिकता समाज को नागरिकता से प्रजा और अंततः गुलामी की ओर ले जाती है।

भरत तिवारी प्रकरण का बड़ा अर्थ

भरत तिवारी प्रकरण की असली प्रासंगिकता इसी में है कि उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है—क्या पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना राज्य का विरोध है, या लोकतंत्र में जवाबदेही की स्वाभाविक मांग? यदि किसी मुठभेड़ पर संदेह है, यदि जनता और परिवार न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं, तो उन सवालों को सुनना और उनकी निष्पक्ष जांच कराना राज्य की जिम्मेदारी है, न कि उन्हें दबा देना।

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लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार

लोकतंत्र में पुलिस कानून की रक्षक है, कानून से ऊपर नहीं। राज्य की वैधता उसकी ताकत से नहीं, उसके न्याय से तय होती है। इसलिए भरत तिवारी प्रकरण में उठ रहे सवालों को महज़ “अराजकता” या “राज्य-विरोध” कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। सवाल पूछना लोकतंत्र का अपराध नहीं, उसका आधार है।

अंतिम सवाल समाज के सामने

अंततः यह तय करना जांच और न्यायपालिका का काम है कि इस घटना में सत्य क्या है। लेकिन समाज के लिए इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह न्याय को सिर्फ सत्ता की भाषा में समझेगा, या न्याय के अपने स्वतंत्र नैतिक पैमाने पर भी परखेगा। क्योंकि इतिहास हमेशा सत्ता की ताकत से नहीं, न्याय की सच्चाई से लिखा जाता है।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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