Saturday, June 20, 2026

Bharat Tiwari Encounter: सिस्टम से सवाल-मानसिक बीमार था भरत, तो इलाज के बदले ‘मौत का वारंट’ क्यों?

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अभय वाणीः जिस देश का कानून विषैले सांप, पागल कुत्ते या किसी नरभक्षी जानवर तक को बिना वजह मारने की इजाजत नहीं देता, उसी देश में अगर समाज के प्रति समर्पित एक युवक को पुलिस पहले मानसिक रूप से अस्वस्थ बताए और फिर अपनी गोलियों का शिकार बना दे, तो इसे क्या कहा जाए—कानून का राज, पुलिसिया कार्रवाई या फिर सिस्टम की संवेदनहीनता?

भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुई भरत तिवारी की मौत को अब कुछ दिन बीत चुके हैं, लेकिन सवाल अभी भी जिंदा हैं। बल्कि समय बीतने के साथ यह मामला और गंभीर होता जा रहा है।

भरत भूषण तिवारी—एक ऐसा युवक, जिसे पुलिस ने खुद मानसिक रूप से अस्वस्थ माना, जिसके इलाज की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही गई—वही भरत बाद में पुलिस फायरिंग में घायल हुआ और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। यही वह विरोधाभास है, जिसने इस पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

घटना से पहले ही पुलिस को थी मानसिक स्थिति की जानकारी

इस पूरे मामले का सबसे अहम तथ्य यह है कि पुलिस कार्रवाई से पहले, 16 जून 2026 को भोजपुर पुलिस की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में साफ कहा गया था कि भरत तिवारी मानसिक रूप से अस्वस्थ है और उसे मानसिक आरोग्यशाला भेजने की प्रक्रिया चल रही है।

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यानी पुलिस के पास पहले से यह जानकारी थी कि मामला अपराध का नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य संकट का है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सिस्टम पहले से सब जानता था भरत तिवारी मानसीक रूप से अस्वस्थ है, तो हालात गोलीबारी तक क्यों पहुंचे?

पुलिस का दावा बनाम परिवार का आरोप

पुलिस का दावा है कि भरत तिवारी ने पुलिस टीम पर हथियार ताना और कथित रूप से फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई।

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दूसरी तरफ परिवार और ग्रामीणों का आरोप है कि भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उस पर गोली चलाई गई। यानी इस पूरे मामले में दो अलग-अलग दावे हैं और सच की तह तक पहुंचने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है।

निलंबन की कार्रवाई, लेकिन क्या इतना काफी है?

घटना के बाद बढ़ते दबाव और जनाक्रोश के बीच संबंधित थानाध्यक्ष और कुछ पुलिसकर्मियों पर निलंबन की कार्रवाई की गई। यह प्रशासनिक कदम इस बात का संकेत है कि पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या निलंबन ही जवाबदेही का अंत है, या सच की पूरी परतें अब भी सामने आनी बाकी हैं?

मानवाधिकार और संकट-प्रबंधन पर बड़ा सवाल

मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक रोगियों से निपटने के लिए पुलिस को विशेष प्रशिक्षण और गैर-घातक रणनीतियों का इस्तेमाल करना चाहिए। दुनिया भर में ऐसे मामलों में टेजर, ट्रैंक्विलाइज़र, शील्ड कंट्रोल और मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप का सहारा लिया जाता है।

ऐसे में भोजपुर की घटना यह सवाल और तीखा कर देती है—क्या यहां भी उन विकल्पों की पूरी कोशिश हुई, या सिस्टम एक बार फिर उस मोड़ पर पहुंच गया, जहां संकट-प्रबंधन का अंत गोली पर जाकर रुका?

अब जवाबदेही तय होनी चाहिए

इस पूरे मामले में अब यह जानना जरूरी है—गोली चलाने का आदेश किसने दिया? क्या मौके पर मेडिकल टीम मौजूद थी? क्या गैर-घातक उपायों की पूरी कोशिश हुई? और क्या पुलिस ने मानसिक रोगी से निपटने के स्थापित प्रोटोकॉल का पालन किया?

क्योंकि अगर एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति, जिसे सिस्टम पहले से पहचानता था, आखिरकार उसी सिस्टम की गोली का शिकार बन जाए, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि हमारी संस्थागत संवेदनशीलता की परीक्षा है।

भरत तिवारी की मौत अब सिर्फ एक खबर नहीं रह गई है। यह उस सवाल का चेहरा बन चुकी है, जिसका जवाब पूरे देश को देना होगा-क्या मानसिक बीमारी अब इलाज का विषय नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के नाम पर मौत का वारंट बनती जा रही है?

इसे भी पढ़ेंः गोली, गुस्सा और व्यवस्था: राहुल राज से भरत तिवारी एंकाउंटर तक वही अधूरा सवाल

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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