अभय वाणीः भारत के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1990 को केवल सत्ता परिवर्तन और गठबंधन राजनीति के दौर के रूप में नहीं देखा जाता। यह वह साल भी था, जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले ने देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से लेकर सड़कों तक एक तीखा विरोध आंदोलन खड़ा कर दिया।
7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लोकसभा में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। इसके बाद 13 अगस्त को केंद्र सरकार ने कार्यालय ज्ञापन जारी कर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए केंद्रीय सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया।
फैसले के विरोध में खासकर उत्तर भारत के कई हिस्सों में छात्र सड़कों पर उतर आए। शुरुआत में प्रदर्शन, नारेबाजी, बंद और जुलूस तक सीमित रहने वाला आंदोलन सितंबर आते-आते बेहद उग्र रूप लेने लगा।
अगस्त से सितंबर तक बदल गया आंदोलन का चेहरा
मंडल विरोध की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली और दूसरे राज्यों में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई जगह कॉलेज बंद हुए, बाजारों पर असर पड़ा और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव की घटनाएं सामने आईं।
19 सितंबर 1990 को दिल्ली में देशभर का ध्यान खींचने वाली घटना हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के छात्र राजीव गोस्वामी ने मंडल आयोग की सिफारिशों के विरोध में आत्मदाह का प्रयास किया। वह गंभीर रूप से झुलसे, लेकिन इस घटना ने आंदोलन का चेहरा ही बदल दिया। उनके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में आत्मदाह के प्रयासों की घटनाएं सामने आने लगीं।
राजीव गोस्वामी की तस्वीर उस समय के अखबारों और समाचार माध्यमों में आंदोलन के सबसे चर्चित प्रतीकों में शामिल हो गई। बाद के वर्षों में भी आत्मदाह के प्रयासों की संख्या और उनसे हुई मौतों को लेकर अलग-अलग स्रोतों में आंकड़ों का अंतर मिलता है। कई ऐतिहासिक विवरण करीब 200 आत्मदाह के प्रयासों और 60 से अधिक मौतों का उल्लेख करते हैं।
24 सितंबर 1990: पहली बड़ी आत्मदाह मौत
राजीव गोस्वामी की घटना के कुछ ही दिन बाद आंदोलन ने और भयावह रूप ले लिया। 24 सितंबर 1990 को सुरिंदर सिंह चौहान आत्मदाह के बाद हुई चोटों के कारण जिंदगी की जंग हार गए। उन्हें मंडल विरोधी आंदोलन के दौरान आत्मदाह से मरने वाला पहला छात्र बताया जाता है।
इसके बाद आत्मदाह की घटनाओं का सिलसिला और तेज हुआ। दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान तक कई जगह छात्र सड़कों पर थे। आंदोलन अब केवल आरक्षण नीति के खिलाफ राजनीतिक विरोध नहीं रह गया था, बल्कि बड़ी संख्या में युवाओं की भावनाओं और भविष्य की आशंकाओं से जुड़ा आंदोलन बन चुका था।
पुलिस कार्रवाई, हिंसा और मौतों का दौर
मंडल विरोधी आंदोलन के दौरान कई राज्यों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक टकराव हुआ। सरकारी इमारतों पर हमले, आगजनी, सड़क और रेल यातायात बाधित करने तथा पुलिस कार्रवाई की घटनाएं भी सामने आईं।
एक ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक आंदोलन के दौरान छह राज्यों में पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुईं और 50 से अधिक लोगों की मौत हुई। हालांकि आंदोलन में हुई कुल मौतों का आंकड़ा अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलता है, इसलिए इसे किसी एक अंतिम संख्या के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
यानी 1990 का मंडल विरोध केवल आत्मदाह की घटनाओं की कहानी नहीं था। इसमें पुलिस फायरिंग, झड़पों और अन्य परिस्थितियों में हुई मौतें भी शामिल थीं।
गोरखपुर में भी भड़की थी आंदोलन की आग
पूर्वी उत्तर प्रदेश का गोरखपुर भी उस दौर में मंडल विरोधी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना। यहां छात्र प्रदर्शन लंबे समय तक चर्चा में रहे और कई घटनाओं ने पूरे इलाके को झकझोर दिया।
गोरखपुर के बरहलगंज में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के दौरान नेशनल पीजी कॉलेज के छात्र निःभिकार त्रिपाठी की पुलिस फायरिंग में मौत की घटना दर्ज है। इसके बाद गोरखपुर शहर में भी आंदोलन ने गंभीर रूप लिया।
इसी दौर में कक्षा 11 के छात्र हेमंत राय द्वारा आत्मदाह का प्रयास किया गया, जिसके बाद उनकी मौत हो गई। और फिर आया 4 अक्टूबर 1990—गोरखपुर के अलहदादपुर निवासी छात्र राजेश त्रिपाठी की मौत का दिन।
4 अक्टूबर 1990: राजेश त्रिपाठी की मौत
राजेश त्रिपाठी उस समय छात्र थे। मंडल विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने आत्महत्या कर ली। 4 अक्टूबर 1990 को हुई राजेश त्रिपाठी की मौत उस दौर की उन घटनाओं में शामिल है, जिनमें आरक्षण के सवाल पर भड़के छात्र आंदोलन ने एक और युवा जिंदगी छीन ली।
राजेश त्रिपाठी का नाम गोरखपुर के मंडल विरोधी आंदोलन के इतिहास से इसलिए भी जुड़ा है क्योंकि वह बाद में राजनीतिक रूप से चर्चित हुए गोविंदगंज के पूर्व विधायक राजन तिवारी और मौजूदा MLA राजू तिवारी के बड़े भाई थे। गोरखपुर के उस दौर के आंदोलन पर प्रकाशित विवरणों में राजेश त्रिपाठी की मौत का उल्लेख मिलता है।
राजेश का परिवार उनकी मौत को आज भी शहादत के रूप में देखता है। परिवार की स्मृति में वह केवल उस दौर में जान गंवाने वाले एक छात्र नहीं, बल्कि आरक्षण विरोधी आंदोलन में अपना जीवन देने वाले शहीद हैं।
उनकी मौत 1990 के उस दौर की एक और तस्वीर सामने रखती है, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा अपने भविष्य, रोजगार और सरकारी नौकरियों में अवसरों को लेकर बेहद आक्रोशित थे।
अकेले नहीं थे राजेश त्रिपाठी
1990 के मंडल विरोध को केवल राजीव गोस्वामी या राजेश त्रिपाठी की कहानी मानना उस आंदोलन की व्यापकता को छोटा कर देना होगा।
दिल्ली में राजीव गोस्वामी का आत्मदाह प्रयास, सुरिंदर सिंह चौहान की मौत, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में पुलिस कार्रवाई और छात्रों की मौतें, हरियाणा के अंबाला सहित कई इलाकों में आत्महत्या की घटनाएं—ये सभी उस व्यापक आंदोलन की अलग-अलग कड़ियां थीं।
सितंबर 1990 के अंतिम सप्ताह तक आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैल चुका था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ, शिक्षण संस्थान बंद रहे और कई जगह प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच संघर्ष हुआ।
इसीलिए 1990 के मंडल विरोध का इतिहास केवल एक शहर, एक छात्र संगठन या एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं लिखा जा सकता। यह हजारों छात्रों के उस सामूहिक आक्रोश की कहानी थी, जिसने तत्कालीन राजनीति को चुनौती दी और जिसके बीच कई परिवारों ने अपने बेटे-बेटियों को खो दिया।
कितने युवाओं ने गंवाई जान?
यह सवाल आज भी पूरी तरह एकमत आंकड़े के साथ सामने नहीं आता। मंडल विरोधी आंदोलन पर उपलब्ध अलग-अलग किताबों, रिपोर्टों और शोध सामग्री में आत्मदाह के प्रयासों और मौतों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। कुछ स्रोत करीब 200 आत्मदाह के प्रयासों और 62 मौतों का उल्लेख करते हैं, जबकि पुलिस फायरिंग और अन्य हिंसक घटनाओं में हुई मौतें इससे अलग थीं।
इसलिए आंदोलन में मारे गए लोगों की एक अंतिम और सर्वमान्य सूची या संख्या बताना इतिहास के उपलब्ध स्रोतों के आधार पर आसान नहीं है। लेकिन नामों के पीछे छिपी त्रासदी निर्विवाद है—किसी ने आत्मदाह किया, किसी की पुलिस कार्रवाई में मौत हुई और किसी ने आंदोलन के दबाव में आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया।
1990 का मंडल विरोध: एक ऐसा मोड़ जिसने देश बदल दिया
मंडल आयोग की सिफारिशों का विरोध केवल तत्कालीन सरकार के फैसले का विरोध नहीं था। इसके पीछे रोजगार, प्रतियोगिता, सामाजिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और अवसरों को लेकर गहरे मतभेद थे।
एक तरफ मंडल की सिफारिशों को पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जोड़कर देखा गया। दूसरी तरफ विरोध करने वाले छात्रों और वर्गों का तर्क था कि आरक्षण से सामान्य वर्ग के युवाओं के अवसर प्रभावित होंगे।
इसी टकराव ने 1990 में भारतीय राजनीति और समाज को एक नए दौर में प्रवेश कराया। आखिरकार मंडल आयोग की सिफारिशों पर कानूनी लड़ाई भी चली और 1992 में इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण व्यवस्था के संवैधानिक पहलुओं पर अपना महत्वपूर्ण फैसला दिया। केंद्र सरकार की 27 प्रतिशत OBC आरक्षण व्यवस्था बाद में लागू हुई।
लेकिन 1990 की सड़कों पर जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अलग अध्याय बन गया। राजीव गोस्वामी की आग, सुरिंदर सिंह चौहान की मौत, गोरखपुर के निःभिकार त्रिपाठी और हेमंत राय की मौत और 4 अक्टूबर 1990 को राजेश त्रिपाठी की मौत—ये नाम उस दौर की उस पीढ़ी की कहानी कहते हैं, जिसने मंडल के सवाल पर अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा दी।
तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी 1990 का मंडल विरोध भारतीय राजनीति और सामाजिक संरचना को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ाव है। और राजेश त्रिपाठी जैसे युवाओं के नाम इस इतिहास का वह मानवीय पक्ष हैं, जिसे आंकड़ों के बीच भुलाया नहीं जा सकता।
