Sunday, September 27, 2026

M.K. झा से विनय कुमार तक: बिहार में DGP की कुर्सी और विदाई के बदलते रास्ते

M.K. झा से विनय कुमार तक बिहार के DGP की बदलती कहानी, किसी की समय से पहले विदाई तो किसी का VRS; आखिर क्यों चर्चा में रही पुलिस प्रमुख की कुर्सी?

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अभय वाणीः बिहार में पुलिस महानिदेशक की कुर्सी एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह कोई बड़ा अपराध, कानून-व्यवस्था का संकट या पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि खुद उस कुर्सी पर बैठे अधिकारी का फैसला है। बिहार के DGP विनय कुमार ने VRS ले लिया है और सरकार ने उन्हें राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया है। खास बात यह है कि उनका DGP के रूप में निर्धारित कार्यकाल दिसंबर 2026 तक था, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने पुलिस की सर्वोच्च जिम्मेदारी छोड़ दी।

विनय कुमार का VRS इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि बिहार के पुलिस इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी DGP ने नियमित सेवानिवृत्ति से पहले सेवा छोड़ने का रास्ता चुना हो। लेकिन अगर M.K. झा से लेकर विनय कुमार तक बिहार के DGP पद की पूरी यात्रा को देखा जाए तो कहानी सिर्फ VRS की नहीं है। यह कहानी बताती है कि समय के साथ इस बेहद महत्वपूर्ण कुर्सी से विदाई के रास्ते भी बदलते गए हैं।

कभी DGP की पारी नियमित सेवानिवृत्ति के साथ खत्म हुई, कभी अधिकारी को पद से हटाया गया, कभी दूसरी जिम्मेदारी देकर पुलिस की कमान बदली गई, कभी केंद्र में नई जिम्मेदारी के लिए DGP ने बिहार छोड़ा और कभी VRS के रास्ते नई सार्वजनिक भूमिका सामने आई। यानी बिहार में DGP की कहानी को समझने के लिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि कौन DGP बना, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उसने यह कुर्सी छोड़ी कैसे।

जब DGP की कुर्सी लंबी पारी का पर्याय थी

बिहार पुलिस के पुराने दौर में DGP का पद आज की तरह लगातार बदलाव और चर्चाओं के केंद्र में नहीं रहता था। M.K. झा और उनके बाद के अधिकारियों के दौर में यह जिम्मेदारी एक लंबी प्रशासनिक पारी का हिस्सा मानी जाती थी।

लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलने लगी। DGP बदलना सिर्फ रिटायरमेंट की वजह से नहीं रहा। प्रशासनिक फैसले, स्थानांतरण, दूसरी जिम्मेदारियां और केंद्र में नई भूमिकाएं भी इस पद की विदाई की वजह बनने लगीं।

यहीं से DGP की कुर्सी की कहानी में एक अहम बदलाव आया—इस कुर्सी पर बैठना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह सवाल भी हो गया कि अधिकारी यहां से बाहर कैसे गया?

D.P. ओझा से शुरू हुआ समय से पहले विदाई का अध्याय

बिहार के DGP इतिहास में डी.पी. ओझा का नाम इस बदलाव को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 2003 में बिहार पुलिस की कमान संभालने वाले ओझा की पारी सामान्य तरीके से खत्म नहीं हुई। दिसंबर 2003 में उन्हें DGP पद से हटा दिया गया और उनकी जगह वारिस हयात को पुलिस महानिदेशक बनाया गया। उस समय ओझा की निर्धारित सेवानिवृत्ति में करीब दो महीने बाकी थे।

ओझा के कार्यकाल के दौरान अपराध और राजनीतिक संरक्षण को लेकर उनकी सख्त टिप्पणियां चर्चा में थीं। तत्कालीन सरकार के साथ उनके मतभेद भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि बिहार के DGP को निर्धारित सेवानिवृत्ति से पहले ही पद से हटा दिया गया।

इसके बाद ओझा ने VRS ले लिया। इस तरह बिहार के पुलिस इतिहास में DGP पद से समय से पहले हटाए जाने और उसके बाद VRS लेने का एक चर्चित अध्याय जुड़ गया।

यहीं से एक सवाल भी सामने आया—क्या DGP की कुर्सी पर बैठने का मतलब निर्धारित कार्यकाल पूरा करना भी है? बिहार का आगे का इतिहास बताता है कि इसका जवाब हमेशा एक जैसा नहीं रहा।

अभयानंद से लेकर बदलती तस्वीर

करीब एक दशक बाद 2014 में अभयानंद का मामला सामने आया। उन्होंने अगस्त 2011 में बिहार के DGP का पद संभाला था। जून 2014 में उन्हें DGP पद से हटाकर DG-cum-Commandant General, Home Guards की जिम्मेदारी दे दी गई। उस समय उनकी नियमित सेवानिवृत्ति में करीब छह महीने बाकी थे। उनकी जगह पी.के. ठाकुर को बिहार का नया DGP बनाया गया।

यह VRS नहीं था और इसे ओझा वाले घटनाक्रम के समान भी नहीं माना जा सकता। लेकिन इस मामले ने एक बात जरूर स्पष्ट कर दी—DGP की कुर्सी से विदाई का रास्ता सिर्फ नियमित रिटायरमेंट नहीं है। किसी अधिकारी को दूसरी जिम्मेदारी देकर भी पुलिस प्रमुख की कुर्सी बदली जा सकती है।

इसके बाद बिहार में DGP पद पर कई चेहरे आए और गए। किसी ने नियमित सेवानिवृत्ति ली तो किसी का कार्यकाल प्रशासनिक बदलाव के साथ खत्म हुआ। लेकिन 2020 में यह पद एक बार फिर VRS की वजह से राष्ट्रीय चर्चा में आया।

गुप्तेश्वर पांडेय ने VRS को फिर सुर्खियों में ला दिया

गुप्तेश्वर पांडेय ने 22 सितंबर 2020 को बिहार के DGP पद से VRS लिया। उनका नियमित रिटायरमेंट कुछ महीने बाद होना था, लेकिन उन्होंने उससे पहले ही सेवा छोड़ दी। उनके VRS के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई। उस समय बिहार विधानसभा चुनाव भी सामने थे।

यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—VRS लेना अपने आप में कोई असामान्य या गलत कदम नहीं है। लेकिन जब कोई अधिकारी पुलिस के सर्वोच्च पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेता है और उसके बाद उसके अगले सार्वजनिक जीवन को लेकर चर्चा शुरू होती है, तो वह घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से ज्यादा ध्यान खींचता है।

बिहार में VRS का यह अध्याय यहीं खत्म नहीं हुआ। छह साल बाद, 2026 में, एक बार फिर DGP पद से VRS ने सुर्खियां बटोरीं—लेकिन इस बार कहानी का अगला पड़ाव बिल्कुल अलग था।

R.S. Bhatti की विदाई ने दिखाया एक और रास्ता

गुप्तेश्वर पांडेय के बाद जब बिहार के DGP पद से अधिकारियों की विदाई की बात होती है तो R.S. Bhatti का मामला भी अलग से समझना जरूरी है।

दिसंबर 2022 में बिहार के DGP बने आर.एस. भट्टी ने करीब डेढ़ साल से ज्यादा समय तक राज्य पुलिस की कमान संभाली। अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने उन्हें CISF का महानिदेशक नियुक्त किया। इसके बाद उन्हें केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया और उन्होंने 30 अगस्त 2024 को बिहार DGP का प्रभार छोड़ दिया।

भट्टी की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी विदाई को VRS या पद से हटाए जाने की श्रेणी में रखना सही नहीं होगा। उन्होंने बिहार की DGP की कुर्सी छोड़ी, लेकिन उसके बाद सीधे केंद्र की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्था की कमान संभालने चले गए।

यानी DGP की कुर्सी से बाहर निकलने का एक रास्ता यह भी रहा—न रिटायरमेंट, न VRS और न पद से हटाया जाना, बल्कि केंद्र में नई जिम्मेदारी। और इसी बदलती तस्वीर के बीच अब विनय कुमार का मामला सामने आया है।

विनय कुमार: VRS के साथ नई संवैधानिक जिम्मेदारी

विनय कुमार ने 25 सितंबर 2026 को VRS के लिए आवेदन किया। सरकार ने अगले ही दिन उनका VRS तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया। इसके बाद उन्हें बिहार का राज्य मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया गया। उनका DGP के रूप में निर्धारित कार्यकाल दिसंबर 2026 तक था।

इस पूरे घटनाक्रम में तीन चीजें बेहद तेजी से हुईं—DGP पद से विदाई, VRS की मंजूरी और राज्य मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति।

यहीं पर विनय कुमार का मामला गुप्तेश्वर पांडेय के मामले से अलग हो जाता है। पांडेय के VRS के बाद राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा हुई थी, जबकि विनय कुमार के मामले में तत्काल एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक और संवैधानिक प्रकृति की जिम्मेदारी सामने आई है।

DGP और मुख्य सूचना आयुक्त की भूमिकाएं बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ पूरे पुलिस बल का नेतृत्व है, कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी है; दूसरी तरफ सूचना आयोग नागरिकों के सूचना के अधिकार और सरकारी जवाबदेही से जुड़े मामलों का महत्वपूर्ण संस्थान है।

इसलिए विनय कुमार का VRS केवल एक अधिकारी के नौकरी छोड़ने की खबर नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें पुलिस के सर्वोच्च पद से निकलने वाला अधिकारी सीधे एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी संभालता दिखाई देता है।

M.K. झा से विनय कुमार तक आखिर बदला क्या?

चार दशक से ज्यादा की इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखें तो बिहार में DGP की कुर्सी राज्य के बदलते प्रशासनिक दौर का आईना दिखाई देती है।

एक दौर में लंबी पारी महत्वपूर्ण थी। फिर DGP को निर्धारित समय से पहले हटाए जाने के उदाहरण सामने आए। इसके बाद दूसरी जिम्मेदारी देकर पुलिस प्रमुख बदले गए। फिर VRS ने इस पद के आसपास एक नया सवाल खड़ा किया। R.S. Bhatti केंद्र में नई जिम्मेदारी के लिए बिहार से बाहर गए और अब विनय कुमार ने VRS लेकर राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी संभाली है।

यानी कहानी सिर्फ यह नहीं है कि बिहार में कितने DGP हुए। असली कहानी यह है कि DGP बनने के बाद उनकी पारी खत्म कैसे हुई। यही शायद इस पूरे इतिहास को देखने का सबसे दिलचस्प तरीका भी है।

किसी ने नियमित रिटायरमेंट लिया। किसी को पद से हटाया गया। किसी को दूसरी जिम्मेदारी दी गई। किसी ने केंद्र में नई जिम्मेदारी संभालने के लिए बिहार छोड़ा। किसी ने VRS लिया। और अब एक अधिकारी ने VRS लेकर तुरंत एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक पद संभाल लिया।

इन घटनाओं को एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। हर अधिकारी की परिस्थितियां अलग रही हैं। लेकिन इन सबको एक साथ देखने पर बिहार पुलिस के शीर्ष नेतृत्व की एक दिलचस्प तस्वीर जरूर सामने आती है।

सवाल विनय कुमार से ज्यादा व्यवस्था का है

विनय कुमार ने VRS क्यों लिया—इस पर अनुमान लगाना आसान है, लेकिन आधिकारिक रूप से सामने आए तथ्यों से आगे जाना उचित नहीं होगा। तथ्य यह है कि उन्होंने VRS का आवेदन दिया, सरकार ने उसे तत्काल मंजूर किया और उन्हें राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया। इसलिए असली सवाल व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर होना चाहिए।

क्या वरिष्ठ अधिकारियों के VRS और उसके बाद मिलने वाली सार्वजनिक जिम्मेदारियों के लिए और स्पष्ट नियम होने चाहिए? क्या ऐसी नियुक्तियों की प्रक्रिया को जनता के सामने और विस्तार से रखा जाना चाहिए? क्या पुलिस के सर्वोच्च पद पर नियुक्ति और कार्यकाल में ज्यादा स्थिरता होनी चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी राज्य की पुलिस व्यवस्था की मजबूती उसके DGP के नाम से तय होगी या उस व्यवस्था से, जिसमें DGP कोई भी हो, लेकिन संस्थान अपनी निरंतरता बनाए रखे?

अब अगला DGP कौन नहीं, कैसा होगा—यह सवाल भी जरूरी है

विनय कुमार के VRS के साथ बिहार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे एक नया DGP चुनना है। अब चर्चा स्वाभाविक रूप से संभावित नामों पर होगी। लेकिन नाम से आगे भी एक बड़ा सवाल है—अगला DGP कितने समय तक रहेगा, उसे कितनी संस्थागत स्थिरता मिलेगी और उसकी विदाई किस रास्ते से होगी?

क्योंकि बिहार के इतिहास में DGP की कुर्सी से उतरने के रास्ते एक जैसे नहीं रहे। कभी हटाया गया, कभी दूसरी जिम्मेदारी मिली, कभी केंद्र में बुलावा आया और कभी VRS लेकर अधिकारी ने नई भूमिका संभाली।

M.K. झा से शुरू हुई यह लंबी यात्रा डी.पी. ओझा की समय से पहले विदाई, अभयानंद के स्थानांतरण, गुप्तेश्वर पांडेय के VRS, R.S. Bhatti की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और अब विनय कुमार के VRS तक पहुंच चुकी है।

चेहरे बदलते रहे। सरकारें बदलती रहीं। परिस्थितियां बदलती रहीं। लेकिन DGP की कुर्सी के साथ एक सवाल लगातार चलता रहा— इस कुर्सी पर बैठने वाले को अपनी पारी पूरी करने का कितना भरोसा है? शायद बिहार की पुलिस व्यवस्था पर सबसे बड़ा विमर्श इसी सवाल से शुरू होना चाहिए। बिहार में सिर्फ DGP बदल रहे हैं या DGP की कुर्सी का मतलब ही बदल रहा है?

अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttps://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।
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