Thursday, June 11, 2026

एक अधेड़ युवराज की अनंत पदयात्रा: खोज अब भी जारी है

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ले लोटाः भारतीय राजनीति के एक “अधेड़ युवराज” की यात्रा किसी अंतहीन बैकपैकिंग ट्रिप से कम नहीं लगती। फर्क बस इतना है कि आम यात्री पहाड़ों में खुद को खोजता है, जबकि ये महोदय राजनीति में अपनी पार्टी, रणनीति और सही समय को। कभी वे झोला कंधे पर डालकर सादगी की पदयात्रा पर निकल पड़ते हैं, तो कभी अचानक मंच पर प्रकट होकर लोकतंत्र को नया पाठ पढ़ाने लगते हैं।

उनके भाषणों में ऐसी मासूमियत झलकती है, मानो राजनीति अभी-अभी स्कूल में दाखिल हुई हो और पहला निबंध लिख रही हो-“मेरा प्रिय लोकतंत्र।” समर्थक उन्हें भविष्य का विचारक और व्यवस्था से लड़ने वाला सच्चा योद्धा मानते हैं, जबकि विरोधी अब भी उन्हें राजनीति का “इंटर्न” समझकर अनुभव प्रमाणपत्र खोजते रहते हैं।

चुनाव आते ही उनमें ऊर्जा का ऐसा संचार होता है कि रैलियाँ, यात्राएँ और संवाद लगातार चलते रहते हैं। लेकिन नतीजे आते ही वे आत्ममंथन की पहाड़ियों पर ऐसे चढ़ जाते हैं, जैसे कोई ऋषि चुनावी हार में आध्यात्मिक ज्ञान खोज रहा हो। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कभी तीखे सवाल दागते हैं, कभी मुस्कुराकर व्यंग्य करते हैं, और कभी ऐसा लगता है कि अगला वाक्य खुद उन्हें भी सरप्राइज़ देने वाला है।

राजनीति के इस विशाल रंगमंच पर उनका किरदार अब स्थायी हो चुका है। खोज अभी भी जारी है-पार्टी की दिशा की, जीत के फ़ॉर्मूले की, और शायद उस दिन की भी, जब “युवराज” शब्द विरासत नहीं, उपलब्धि से पहचाना जाएगा।

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