Thursday, June 4, 2026

वक्त बदला, बिहार नहीं: कभी डीएन गौतम बनाम गिरीश बाबा… अब विनय तिवारी बनाम अमरेंद्र पाण्डेय

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अभय वाणीः बिहार को समझना हो तो केवल उसके चुनावी नतीजे पढ़ लेना काफी नहीं होता। बिहार को समझने के लिए उसकी चौपालों पर बैठना पड़ता है, थानों की पुरानी फाइलों की धूल देखनी पड़ती है, और उन कहानियों को सुनना पड़ता है जो सरकारी दस्तावेजों में कम और लोगों की स्मृतियों में ज्यादा जीवित रहती हैं।

दो अलग-अलग दौर की ऐसी ही दो कहानियाँ हैं- एक 80–90 के दशक की रोहतास की कहानी, दूसरी आज के गोपालगंज की। एक में थे IPS अफसर डीएन गौतम और रोहतास के प्रभावशाली नेता गिरीश नाराण मिश्रा। दूसरी में हैं गोपालगंज के एसपी विनय तिवारी और JDU विधायक अमरेन्द्र पाण्डेय तथा उनके भाई कुचायकोट की राजनीति के चर्चित चेहरे सतीश पाण्डेय।

समय के बीच लगभग चार दशक का फासला है, लेकिन बिहार की राजनीति का रंग, उसकी बेचैनी और सत्ता–प्रशासन के बीच की खामोश टकराहट आज भी लगभग वैसी ही दिखाई देती है।

“ई अफसर फोन से नहीं डरता…” – रोहतास में शुरू हुई थी कहानी

उस दौर का बिहार कुछ और था। शाम ढलते ही सन्नाटा जल्दी उतर आता था। थाने से ज्यादा नेताओं के दरबार प्रभावशाली माने जाते थे। सरकार कांग्रेस की थी और कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सत्ता की सबसे बड़ी संरचना थी। उसी दौर में रोहतास और शाहाबाद के इलाके में एक नाम तेजी से उभरा-D.N. Gautam का। लोग कहते थे, “ई अफसर फोन से नहीं डरता।”

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बिहार में किसी अफसर के लिए यह सामान्य तारीफ नहीं होती। इसका मतलब होता है कि वह व्यक्ति सत्ता के स्थापित समीकरणों को चुनौती देने का जोखिम उठा रहा है।

IPS D.N Gautam अपराध और दबंग नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के लिए चर्चित हो रहे थे। लेकिन बिहार में जब कोई पुलिस अफसर सख्ती दिखाता है, तो उसकी टक्कर केवल अपराधियों से नहीं होती; धीरे-धीरे वह राजनीति, जातीय प्रभाव और स्थानीय सत्ता संरचना से भी उलझने लगता है। यहीं से उस दौर की चर्चित रस्साकशी शुरू हुई, जिसका प्रतीक बाद में D.N. Gautam और Girish Narayan Mishra का नाम बन गया।

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रोहतास में तब लड़ाई अपराध की कम, “प्रतिष्ठा” की ज्यादा हो गई थी

कहते हैं, उस समय रोहतास की राजनीति केवल चुनावी राजनीति नहीं थी; वह प्रतिष्ठा की राजनीति भी थी। कौन किसके दरवाजे जाएगा, किसका फोन कौन उठाएगा, किसकी बात पर थाना हरकत में आएगा-ये सब शक्ति के प्रतीक माने जाते थे।

डी.एन. गौतम की सबसे बड़ी “समस्या” यही थी कि वे उस स्थापित परंपरा में फिट नहीं बैठते थे। स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा रहती थी कि वे नेताओं से औपचारिक सम्मान तो रखते थे, लेकिन प्रशासनिक फैसलों में दूरी बनाए रखते थे। बिहार की उस राजनीतिक संस्कृति में यह रवैया कई लोगों को “साहस” लगता था, तो कई लोगों को “अहंकार”।

उधर गिरीश नारायण मिश्रा कोई साधारण नेता नहीं थे। कोचस और आसपास के इलाके में उनकी राजनीतिक पकड़ गहरी थी। कांग्रेस संगठन में उनका प्रभाव था, समाज में स्वीकार्यता थी और लोगों के बीच उनकी मौजूदगी इतनी मजबूत थी कि उन्हें सिर्फ “नेता” नहीं, बल्कि इलाके का संरक्षक माना जाता था। पुराने लोग आज भी कहते हैं-“पंडित जी के दरवाजे से कोई खाली नहीं लौटता था।”

दोनों सत्ता में थे, दोनों ब्राह्मण थे… फिर भी टकराव हुआ

यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है। स्थानीय लोगों के बीच वर्षों तक यह चर्चा चलती रही कि रोहतास में उस समय केवल अपराधियों पर कार्रवाई नहीं हो रही थी, बल्कि सत्ता के पुराने समीकरण भी बदल रहे थे। कुछ लोग गौतम को “सिस्टम सुधारने वाला अफसर” मानते थे, तो कुछ को लगता था कि वे पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव को चुनौती दे रहे हैं। दूसरी तरफ मिश्रा समर्थकों का मानना था कि राजनीति को पूरी तरह दरकिनार करके प्रशासन नहीं चल सकता, क्योंकि जनता अंततः नेता के दरवाजे पर ही जाती है।

उस दौर की सबसे अनोखी बात यह थी कि दोनों ही ब्राह्मण समाज से आते थे। यानी यह लड़ाई जातीय ध्रुवीकरण वाली नहीं बन पाई। शायद इसी कारण लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई थी। बिहार में आम तौर पर टकराव जातीय चश्मे से देखे जाते थे, लेकिन यहाँ मामला “व्यक्तित्व बनाम व्यक्तित्व” और “प्रभाव बनाम अधिकार” का बन गया था।

पुराने पत्रकार बताते हैं कि उस समय पटना के राजनीतिक गलियारों में भी यह चर्चा रहती थी कि रोहतास में “एक अफसर और एक नेता” के बीच खामोश शक्ति-संघर्ष चल रहा है। दिलचस्प यह कि दोनों सत्ता प्रतिष्ठान के ही हिस्से थे-सरकार कांग्रेस की, नेता कांग्रेस के, अफसर उसी सरकार के। लेकिन लोकतंत्र की असली कहानी अक्सर यहीं से शुरू होती है, जहाँ टकराव विपक्ष और सत्ता के बीच नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर पैदा होता है।

चार दशक बाद… गोपालगंज में लौट आई फिर वही कहानी

फिर समय बदला। बिहार बदलने लगा। सड़कों पर रोशनी बढ़ी, मोबाइल हाथों में आ गए, राजनीति की भाषा बदल गई। लेकिन सत्ता और कानून के बीच की पुरानी तनातनी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। आज गोपालगंज में जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें उसी पुराने बिहार की परछाईं साफ देखी जा सकती है।

अब सत्ता में कांग्रेस नहीं, बल्कि NDA है। लेकिन कहानी का ढांचा आश्चर्यजनक रूप से वैसा ही दिखता है। इस बार भी एक तरफ सत्ता-समर्थित प्रभावशाली विधायक हैं और दूसरी तरफ एक ऐसा पुलिस अफसर जिसकी छवि “कड़क कार्रवाई” करने वाले अधिकारी की बन रही है।

जब गोपालगंज में थाने की फाइल राजनीतिक युद्ध बन गई

जब एसपी विनय तिवारी ने कथित जमीन कब्जा और भू-माफिया नेटवर्क पर कार्रवाई शुरू की, तब शुरुआत में यह सिर्फ पुलिसिया मामला लग रहा था। लेकिन बिहार में कोई मामला ज्यादा देर तक “सिर्फ कानूनी मामला” नहीं रहता। धीरे-धीरे राजनीति उसमें प्रवेश करती है और फिर पूरा राज्य उसे अपने-अपने नजरिए से देखने लगता है।

जैसे-जैसे कार्रवाई आगे बढ़ी, वैसे-वैसे बहस भी बदलती गई। पुलिस कह रही थी कि कानून अपना काम कर रहा है। दूसरी तरफ विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय और उनके समर्थकों का आरोप था कि प्रशासन एक सिविल विवाद को राजनीतिक रंग देकर पेश कर रहा है।

और फिर वही हुआ जो बिहार में अक्सर होता है-थाने की फाइल जनभावना का दस्तावेज बन गई। चाय दुकानों पर बहस शुरू हो गई। सोशल मीडिया ने पक्ष और विपक्ष तय कर दिए। किसी ने कहा—“देखिए, अफसर ईमानदारी से काम कर रहा है।” तो किसी ने जवाब दिया-“ई सब राजनीति है।”

इतिहास खुद को दोहरा रहा है… या बिहार बदल ही नहीं रहा?

यहाँ भी एक दिलचस्प समानता लोगों की चर्चा का हिस्सा बन गई-जिस तरह कभी डी.एन. गौतम और गिरीश नारायण मिश्रा दोनों ब्राह्मण समाज से आते थे, उसी तरह आज विनय तिवारी और अमरेंद्र पांडेय भी उसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। यानी बिहार की इन चर्चित टकराहटों में जाति हमेशा निर्णायक रेखा नहीं बनती; कई बार सत्ता, प्रभाव और संस्थागत अधिकार जातीय सीमाओं से भी ऊपर जाकर भिड़ते दिखाई देते हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि बिहार का आम आदमी दोनों पक्षों को एक साथ समझता भी है और पसंद भी करता है। वह चाहता है कि पुलिस मजबूत हो, लेकिन वह यह भी चाहता है कि उसका नेता इतना प्रभावशाली हो कि जरूरत पड़ने पर फोन उठा सके। यही बिहार का मनोविज्ञान है। यहाँ जनता “कड़क अफसर” की कहानियाँ भी गर्व से सुनाती है और “पहुंच वाले नेता” को भी सम्मान देती है।

आखिर बिहार में सबसे ताकतवर कौन – कानून या प्रभाव?

शायद इसी वजह से बिहार में ऐसे टकराव केवल कानूनी विवाद नहीं बनते; वे लोककथाओं का रूप ले लेते हैं। डी.एन. गौतम और गिरीश नारायण मिश्रा की कहानी आज भी शाहाबाद के बुजुर्गों की स्मृतियों में जीवित है। और संभव है कि आने वाले वर्षों में गोपालगंज का यह प्रकरण भी उसी तरह सुनाया जाए-“एक SP था… और दूसरी तरफ बड़े नेता लोग थे…”

लेकिन इन दोनों कहानियों के भीतर एक गहरी बेचैनी भी छिपी है। क्या बिहार में कानून वास्तव में निष्पक्ष रह पाता है? क्या राजनीति कानून को प्रभावित करती है? या कभी-कभी प्रशासन भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगता है? ये सवाल आज भी उतने ही जीवित हैं जितने चालीस साल पहले थे।

फिर भी उम्मीद की सबसे बड़ी वजह यही है कि अब जनता सब देखती है। पहले कहानियाँ बंद कमरों में बनती थीं, आज हर कार्रवाई सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन जाती है। लोकतंत्र का असली अर्थ शायद यही है-सत्ता और कानून, दोनों को जनता की अदालत में जवाब देना पड़ता है।

और शायद बिहार की राजनीति की सबसे स्थायी तस्वीर यही है— एक तरफ सरकारी जीप की लाल-नीली बत्ती चमकती है, दूसरी तरफ नेता के दरवाजे पर जुटी भीड़ खड़ी रहती है, और इनके बीच खड़ा बिहार यह तय करने की कोशिश करता रहता है कि आखिर असली ताकत किसकी है-कानून की…या प्रभाव की।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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