सीवानः सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के गृह जिला सीवान से स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। सीवान सदर अस्पताल में पुराने ओपीडी बी-ब्लॉक भवन को तोड़ने के दौरान एक बंद कमरे से भारी मात्रा में वर्षों पुरानी और एक्सपायर हो चुकी दवाएं मिली हैं, जिससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।
मामला कैसे सामने आया?
अस्पताल परिसर में सीसीयू निर्माण के लिए पुराने भवन को खाली कर ध्वस्त किया जा रहा था। इसी दौरान जब मजदूर दूसरी मंजिल के एक कमरे की दीवार तोड़ रहे थे, तभी अंदर छिपाकर रखे गए दवाओं के कई कार्टन अचानक नीचे गिरने लगे। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए। चौंकाने वाली बात यह रही कि कई कार्टन ऐसे थे जिन्हें कभी खोला ही नहीं गया था। इसी दौरान पूरे मामले का खुलासा हुआ और वर्षों से छिपाकर रखी गई दवाओं की सच्चाई सामने आ गई।
बरामद दवाओं का विवरण
बरामद दवाएं वर्ष 2013 से 2015 बैच की बताई जा रही हैं, जो काफी पहले ही एक्सपायर हो चुकी थीं। इनमें बच्चों की एंटीबायोटिक दवाएं, मल्टीविटामिन, ईयर ड्रॉप, सिप्रोफ्लोक्सासिन, ओफ्लोक्सासिन-ऑर्निडाजोल, एसिटामिनोफेन, मिडाजोलम इंजेक्शन और गामा बेंजीन हेक्साक्लोराइड जैसी महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इसके साथ ही बड़ी मात्रा में गॉज, कॉटन, चादर और अन्य सर्जिकल सामग्री भी बरामद हुई है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इन सभी की कीमत 10 से 15 लाख रुपये के बीच बताई जा रही है।
प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस कमरे से ये दवाएं मिलीं, उसके ठीक बगल में वर्षों तक सहायक औषधि नियंत्रक का कार्यालय संचालित होता रहा। इसके बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं वहां छिपाकर रखी गईं और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह न केवल निगरानी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है, बल्कि संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
मरीजों के साथ दोहरा नुकसान
विडंबना यह है कि एक ओर मरीजों को अस्पताल में दवाएं नहीं मिलने की शिकायतें आम हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों रुपये की दवाएं वर्षों तक कमरे में पड़ी-पड़ी सड़ती रहीं। यह स्थिति न सिर्फ संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि आम जनता के साथ सीधा अन्याय और भरोसे का उल्लंघन भी है।
देर से पहुंचा प्रशासन
घटना की सूचना मिलने के करीब दो घंटे बाद तक कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। केवल दो कर्मचारी वहां पहुंचे, जिन्होंने स्थिति संभालने में असमर्थता जताई। इससे साफ जाहिर होता है कि अस्पताल प्रशासन इस मामले में पूरी तरह लापरवाह और गैर-जिम्मेदार बना हुआ है।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए अस्पताल अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने कहा कि उन्हें इस घटना की पूर्व जानकारी नहीं थी और अब इसकी जांच कराई जाएगी। वहीं सिविल सर्जन डॉ. श्रीनिवास प्रसाद ने भी जांच के आदेश दिए हैं। हालांकि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के बाद जिम्मेदारी तय होती है या मामला केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है।
बड़े सवाल और जवाबदेही
चूंकि यह मामला स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के अपने गृह क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए इसकी गंभीरता और भी बढ़ जाती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब उनके क्षेत्र के अस्पताल की यह स्थिति है, तो राज्य के अन्य जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति कैसी होगी।
फिलहाल, यह घटना बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में सिर्फ औपचारिकता निभाता है या वास्तव में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है। जनता को अब जवाब का इंतजार है और यह मामला आने वाले समय में एक बड़ी प्रशासनिक परीक्षा बन सकता है।
