अभय वाणीः बिहार की राजनीति में तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच एक सवाल लगातार गहराता जा रहा है-क्या राज्य में लागू शराबबंदी ही वह निर्णायक कारक बनी, जिसने नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को “बिहार छोड़ने” जैसा असामान्य और चौंकाने वाला कदम उठाने पर मजबूर किया? आधिकारिक स्तर पर भले ही इस पर कोई स्पष्टता न हो, लेकिन सत्ता और सियासत के गलियारों में तैरती चर्चाएं यह संकेत जरूर देती हैं कि मामला केवल एक नीति का नहीं, बल्कि उस नीति से उपजे बहुआयामी दबावों का है।
आदर्श से टकराती हकीकत
साल 2016 में जब बिहार में शराबबंदी लागू की गई, तब इसे सामाजिक परिवर्तन की एक निर्णायक पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया। महिलाओं के व्यापक समर्थन और समाज में सुधार की उम्मीदों ने इस फैसले को नैतिक वैधता प्रदान की। शुरुआती दौर में इसके सकारात्मक संकेत भी मिले, लेकिन समय बीतने के साथ यह स्पष्ट होता गया कि जिस सख्ती और प्रभावशीलता के साथ इसे लागू किया जाना था, वह धरातल पर कायम नहीं रह सकी।
राजस्व का अचानक शून्य होना
शराबबंदी से पहले बिहार को प्रतिवर्ष लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का आबकारी राजस्व प्राप्त होता था, जो राज्य की वित्तीय संरचना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ था। नीति लागू होते ही यह आय लगभग समाप्त हो गई। संसाधनों की कमी से जूझते राज्य के लिए यह झटका बहुत ही गहरा था। इसका सीधा असर प्रदेश की विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी कार्यक्रमों की गति पर पड़ा, जबकि सरकारी खजाने पर दबाव निरंतर बढ़ता चला गया।
प्रतिबंध के बावजूद कायम समानांतर तंत्र
नीति की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि प्रतिबंध के बावजूद बिहार में शराब का प्रवाह पूरी तरह थम नहीं सका। पड़ोसी राज्यों से तस्करी जारी रही, अवैध कारोबार ने जड़ें जमा लीं और एक समानांतर तंत्र विकसित हो गया। नतीजतन, प्रशासनिक मशीनरी पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा-पुलिस, न्यायालय और जेल व्यवस्था सभी इस दबाव को झेलते नज़र आए। स्थिति यह बनी कि सरकार ने राजस्व भी खोया और जिस सामाजिक सुधार के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया था, वह भी अधूरा ही रह गया।
आर्थिक विवशता बनाम राजनीतिक प्रतिबद्धता
जैसे-जैसे आर्थिक दबाव गहराता गया, वैसे-वैसे यह सवाल भी मुखर होने लगा कि क्या अब इस नीति की समीक्षा की जानी चाहिए। लेकिन यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय भर नहीं था। शराबबंदी नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान और नैतिक प्रतिबद्धता का केंद्रीय तत्व बन चुकी थी। ऐसे में इससे पीछे हटना केवल नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि नीतीश की अपनी ही विश्वसनीयता पर आघात के समान होता।
यू-टर्न से बचने की राजनीतिक दुविधा
यहीं से वह जटिल दुविधा उभरती है, जहां एक ओर राज्य की आर्थिक वास्तविकताएं थीं और दूसरी ओर नीतीश की राजनीतिक छवि तथा नैतिक आग्रह। ऐसे परिदृश्य में यह चर्चा बल पकड़ती है कि क्या इस टकराव से बचने के लिए ही नीतीश कुमार ने खुद को उस परिस्थिति से अलग करना अधिक उपयुक्त समझा, जिसमें उन्हें अपनी ही नीति पर यू-टर्न लेना पड़ता।
भविष्य के संकेत और वर्तमान के सवाल
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में बिहार में शराबबंदी की दिशा क्या होती है। यदि इसमें ढील दी जाती है या इसे समाप्त करने की पहल होती है, तो यह कयास और मजबूत होंगे कि यही नीति उस राजनीतिक निर्णय की पृष्ठभूमि में थी, जिसने नीतीश और राज्य दोनों की राजनीति को अप्रत्याशित मोड़ दे दिया।
नीति, दबाव और निर्णय का त्रिकोण
फिलहाल यह प्रश्न अनुत्तरित है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि शराबबंदी अब केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं रह गई है। यह आर्थिक दबाव, प्रशासनिक चुनौतियों और राजनीतिक जोखिमों का जटिल त्रिकोण बन चुकी है। और इसी त्रिकोण के केंद्र में खड़ा है वह सवाल, जो बार-बार लौटकर सामने आता है-क्या वास्तव में शराबबंदी ही वह वजह बनी, जिसने नीतीश कुमार को बिहार से दूर जाने का रास्ता चुनने पर विवश किया?
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