अभय वाणीः एक वक्त था जब आम आदमी सोचता और कहता था- “पत्रकार से डरती है सरकार।” लेकिन उत्तर प्रदेश के मेरठ से आई एक ख़बर ने इस धारणा पर नई बहस छेड़ दी है। मेरठ में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा जारी कथित आदेश- कि किसी भी थाने में पत्रकार द्वारा वीडियोग्राफी किए जाने पर मुकदमा दर्ज किया जाएं- सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। वायरल आदेश के साथ जिस पुलिस अधिकारी का नाम जोड़ा जा रहा है वह सौम्या अस्थाना हैं। फिलवक्त Saumya Sthana, DSP Meerut के पद पर तैनात हैं।
अब सवाल यह है कि यह आदेश किन परिस्थितियों में दिया गया, इसकी वास्तविक मंशा क्या है, और यदि आदेश सही है तो क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? पिछले कुछ वर्षों में मीडिया की साख और विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठे हैं। ‘पब्लिक जर्नलिज्म’ के दौर में अनेक अनुभवहीन लोग स्वयं को पत्रकार घोषित कर चुके हैं, जिन्हें पेशे की मर्यादाओं और मानकों की पर्याप्त समझ नहीं है। ऐसे में थोड़े से व्यूज़ और लोकप्रियता की चाह में कई बार मामूली घटनाओं को अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बना दिया जाता है।
संवेदनशीलता बनाम स्वतंत्रता
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना गया है। उसका दायित्व है सत्ता से सवाल करना और व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखना। लेकिन पुलिस थाने जैसे स्थान केवल सामान्य सार्वजनिक स्थल नहीं होते। वहां चल रही जांच, पीड़ितों की पहचान, गवाहों की सुरक्षा और गोपनीय दस्तावेज- सब कुछ अत्यंत संवेदनशील होता है। ऐसे में अनियंत्रित या बिना अनुमति की गई वीडियोग्राफी जांच को प्रभावित कर सकती है और कई बार किसी की निजता का उल्लंघन भी कर सकती है।
फिर भी यह तर्क तभी तक उचित है, जब तक उसका उद्देश्य सुरक्षा और प्रक्रिया की मर्यादा तक सीमित हो। यदि इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के औज़ार के रूप में प्रयोग किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध माना जाएगा।
मीडिया की आत्मालोचना क्यों जरूरी?
यह भी एक सच्चाई है कि मीडिया का एक हिस्सा बीते वर्षों में विश्वसनीयता के संकट से गुज़रा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही का संकट भी खड़ा हुआ है। कई तथाकथित पत्रकार बिना तथ्य-जांच के खबरें प्रसारित कर देते हैं। ‘पहले वायरल, बाद में सत्यापन’ की प्रवृत्ति ने पत्रकारिता की गंभीरता को क्षति पहुंचाई है।
ऐसी स्थिति में प्रशासनिक तंत्र की असहजता पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती। लेकिन कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदारी के कारण पूरी पत्रकार बिरादरी को संदेह की दृष्टि से देखना भी उचित नहीं है।
समाधान टकराव में नहीं, संवाद में
प्रतिबंध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। आवश्यकता स्पष्ट और संतुलित दिशानिर्देशों की है। यदि थानों में कवरेज के लिए मानक प्रोटोकॉल तय किए जाएं- जैसे पूर्व अनुमति की प्रक्रिया, संवेदनशील क्षेत्रों की रिकॉर्डिंग पर रोक, पीड़ित की पहचान की गोपनीयता- तो पारदर्शिता और सुरक्षा दोनों का संतुलन संभव है।
इसी के साथ मीडिया संस्थानों को भी अपनी आचार-संहिता को सख्ती से लागू करना होगा। पत्रकारिता केवल कैमरा और माइक्रोफोन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और नैतिक अनुशासन का नाम है।
लोकतंत्र का असली संतुलन
लोकतंत्र में न तो सरकार का पत्रकार से डरना स्वस्थ संकेत है और न ही पत्रकार का सरकार से डरना। स्वस्थ व्यवस्था वह है जहां दोनों एक-दूसरे को जवाबदेह रखें, लेकिन संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर। मेरठ का यह विवाद दरअसल उसी संतुलन की परीक्षा है।
आज आवश्यकता है कि भावनाओं और आरोपों से ऊपर उठकर तथ्यों और सिद्धांतों के आधार पर विमर्श किया जाए। क्योंकि जब संवाद समाप्त होता है, तब या तो अराजकता जन्म लेती है या दमन। और दोनों ही लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
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