सचेतक बनाम मंत्री: बिहार विधानसभा में असली ताकत किसके हाथ?

अभय पाण्डेय

पटनाः बिहार की सियासत में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि विधानसभा के भीतर असली ताकत किसके हाथ होती है—मंत्री के या सचेतक के। यह सवाल तब और अहम हो गया है, जब सत्तारूढ़ गठबंधन ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भरोसेमंद नेता श्रवण कुमार को मुख्य सचेतक, भाजपा के विनोद नारायण झा को उप-मुख्य सचेतक और LJP (RV) के प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी सहित कई अन्य बड़े चेहरों को सचेतक पद की जिम्मेदारी सौंपी है। इन नियुक्तियों ने साफ संकेत दिया है कि सरकार के लिए असली परीक्षा सदन के भीतर होती है और विधानसभा की राजनीति में पद से ज्यादा मायने भूमिका का होता है।

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सचेतकों की सूची में अन्य नाम

BJP से कृष्ण कुमार ऋषि, कुमार शैलेन्द्र, गायत्री देवी और JDU से मनजित कुमार सिंह, सुधांशु शेखर और अरुण मंझी के नाम शामिल हैं। यह चयन दर्शाता है कि गठबंधन ने अनुभव, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए टीम का गठन किया है, ताकि सदन के भीतर किसी भी मोर्चे पर कमजोरी न रह जाए।

क्यों रणनीतिक मानी जा रही हैं ये नियुक्तियां

राजनीतिक गलियारों में इन नियुक्तियों को सत्ता के भीतर कंट्रोल मैकेनिज्म को और कसने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सदन में सरकार की सफलता भाषणों से नहीं, बल्कि संख्या, अनुशासन और समयबद्ध उपस्थिति से तय होती है। ऐसे में सचेतकों की टीम वह भूमिका निभाते हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर भी सरकार की दिशा और दशा तय करती है। सचेतकों की टीम का चयन यह संकेत देता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन आने वाले सत्रों में न तो विपक्ष को कोई स्पेस देना चाहता है और न ही अपने विधायकों के स्तर पर किसी तरह की ढिलाई स्वीकार करने के मूड में है। लिहाज, इन नियुक्तियों को केवल पदों के बंटवारे के तौर पर नहीं, बल्कि विधानसभा के भीतर सत्ता प्रबंधन को कसने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

विपक्ष पर दबाव बढ़ाने की तैयारी

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह पूरी कवायद विपक्ष पर लगातार दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। सशक्त और अनुशासित सचेतक टीम के जरिए सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि विपक्ष को सदन में किसी भी रणनीतिक मौके पर बढ़त न मिले। चाहे वह अविश्वास प्रस्ताव हो, सरकार को घेरने की कोशिश या अहम विधेयकों पर बहस—हर स्थिति में संख्याबल और उपस्थिति सरकार के पक्ष में रहे।

2025–26 की राजनीतिक तैयारी का संकेत

इन नियुक्तियों को आने वाले 2025–26 के राजनीतिक घटनाक्रमों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। विधानसभा सत्रों में सरकार का प्रदर्शन ही आगे की राजनीतिक जमीन तैयार करता है। ऐसे में अभी से सदन के भीतर मजबूत मैनेजमेंट खड़ा करना यह संकेत देता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन भविष्य की चुनावी और राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर कदम बढ़ा रहा है।

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विधानसभा के भीतर क्या करता है सचेतक

सचेतक की भूमिका केवल विधायकों की उपस्थिति तक सीमित नहीं होती। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि पार्टी के विधायक समय पर सदन में मौजूद रहें, महत्वपूर्ण विधेयकों पर पार्टी लाइन के अनुरूप मतदान करें और विपक्षी दबाव के बावजूद सरकार की रणनीति प्रभावी ढंग से लागू हो सके।

कितना प्रभावशाली होता है यह पद

भले ही सचेतक के पास कोई कार्यकारी अधिकार न हों, लेकिन विधायी राजनीति में यह पद बेहद ताकतवर माना जाता है। पार्टी नेतृत्व, मंत्रियों और विधायकों के बीच समन्वय बनाना, अनुशासन कायम रखना और जरूरत पड़ने पर व्हिप के जरिए फैसलों को लागू कराना इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

मंत्री बनाम सचेतक: सदन की राजनीति का गणित

राजनीतिक हैसियत के लिहाज से मंत्री का कद बड़ा माना जाता है, लेकिन सदन के भीतर कई बार सचेतक की भूमिका ज्यादा निर्णायक साबित होती है। मंत्री नीति बनाता है, जबकि उस नीति को बहुमत के साथ पारित कराने की जिम्मेदारी सचेतक निभाता है। यही वजह है कि उन्हें सरकार का फ्लोर मैनेजर भी कहा जाता है।

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नीतीश कुमार का मैनेजमेंट स्टाइल फिर चर्चा में

मुख्य सचेतक के रूप में श्रवण कुमार की नियुक्ति को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सख्त लेकिन संतुलित मैनेजमेंट स्टाइल का उदाहरण माना जा रहा है। नीतीश कुमार पहले भी यह दिखा चुके हैं कि वे सदन के भीतर अनुशासन और नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं, चाहे इसके लिए संगठनात्मक स्तर पर कड़े फैसले ही क्यों न लेने पड़ें।

राजू तिवारी की भूमिका क्यों मानी जा रही है अहम

LJP (रामविलास) के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते राजू तिवारी की मौजूदगी यह संकेत देती है कि सहयोगी दलों को भी सदन की रणनीति में बराबर की हिस्सेदारी दी जा रही है। यह कदम गठबंधन के भीतर समन्वय मजबूत करने और किसी भी असंतोष की गुंजाइश को खत्म करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

आगे क्या संकेत देती है यह तैनाती

कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा में सचेतकों की यह नई टीम आने वाले सत्रों में सरकार की विधायी रणनीति, विपक्ष से निपटने की क्षमता और सत्ता संतुलन तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। साफ है कि सदन के भीतर सरकार की असली ताकत अब नीतियों से ज्यादा, उनके सटीक और प्रभावी प्रबंधन में दिखाई देगी।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।