अभय वाणीः देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र और नौकरी के अभ्यर्थी परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं और रोजगार के संकट को लेकर सड़कों पर हैं। दिल्ली से लेकर बिहार और अब झारखंड तक युवाओं का आक्रोश दिखाई दे रहा है। झारखंड में तो कई दिनों से जारी प्रदर्शन 10 अगस्त को विधानसभा की ओर मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई और टकराव तक पहुंच गया। छात्रों की मांगों में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच, कथित अनियमितताओं पर कार्रवाई और भर्ती व्यवस्था में सुधार प्रमुख हैं।
मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। असल सवाल यह है कि जब छात्र व्यवस्था से सवाल पूछते हैं, तब राजनीति उनके साथ कितनी ईमानदारी से खड़ी होती है? जिसका जवाब मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम बेहद दिलचस्प तरीके से देता है।
जब दिल्ली या बिहार में परीक्षा और भर्ती को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे, तब सत्ता पक्ष की ओर से आंदोलन के तौर-तरीकों पर सवाल उठे। विपक्ष ने छात्रों की आवाज को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए सरकार को घेरा। आज झारखंड में तस्वीर उलट गई है। वहां भाजपा विपक्ष में है और छात्रों के आंदोलन को लेकर सरकार पर निशाना साध रही है। भाजपा नेताओं ने विधानसभा में भी परीक्षा संबंधी मुद्दों पर विरोध दर्ज कराया और जांच की मांग की है।
यानी मुद्दा वही है, छात्र वही हैं, उनकी परेशानी वही है—बस सत्ता की कुर्सी बदलते ही राजनीतिक भाषा बदल जाती है।
यहीं से लोकतंत्र का असली सवाल पैदा होता है
क्या किसी छात्र का दर्द इसलिए कम महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह उस राज्य में प्रदर्शन कर रहा है जहां हमारी पार्टी सत्ता में है? क्या पेपर लीक या भर्ती में गड़बड़ी इसलिए गंभीर अपराध है क्योंकि सरकार विपक्षी दल की है? और क्या वही गड़बड़ी सत्ता में अपनी पार्टी के रहते महज राजनीतिक साजिश या विरोध का हिस्सा बन जाती है?
यदि इन सवालों का जवाब ‘हां’ है, तो समस्या सिर्फ परीक्षा व्यवस्था में नहीं है। समस्या राजनीतिक सोच में भी है।
छात्र किसी पार्टी के वोट बैंक नहीं हैं
देश का युवा वर्षों तक पढ़ता है। परिवार अपनी बचत लगाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में कई साल निकल जाते हैं। फिर परीक्षा होती है और यदि पेपर लीक, नकल, गलत प्रश्नपत्र, परिणाम में गड़बड़ी या भर्ती प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो जाएं तो नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता।
एक छात्र का एक साल जाता है। कई बार दो-तीन साल जाते हैं। उम्र की सीमा निकल जाती है। परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है और अंततः व्यवस्था पर भरोसा टूटता है। यही कारण है कि छात्र आंदोलनों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना खतरनाक है।
झारखंड में प्रदर्शन कर रहे युवाओं के सवालों को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है। भाजपा छात्रों के समर्थन में है, जबकि कांग्रेस भी पुलिस कार्रवाई और छात्रों की मांगों को लेकर सवाल उठा रही है। लेकिन लोकतंत्र में किसी छात्र के सवाल की वैधता इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसे कौन-सी पार्टी समर्थन दे रही है।
आंदोलन का तरीका गलत हो सकता है, मुद्दा नहीं
यह भी उतना ही जरूरी है कि छात्र आंदोलन के नाम पर हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान या कानून-व्यवस्था को चुनौती देने को जायज न ठहराया जाए।
लोकतांत्रिक आंदोलन की अपनी मर्यादा होती है। सरकार की भी अपनी जिम्मेदारी होती है। लेकिन किसी प्रदर्शन में कुछ लोगों के उग्र होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पूरी छात्र आवाज को ही खारिज कर दिया जाए।
सरकार का पहला दायित्व है कि वह छात्रों की शिकायत सुने, तथ्यों की जांच कराए और जहां गड़बड़ी मिले वहां जिम्मेदारी तय करे। लाठी, पानी की बौछार या आंसू गैस किसी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता वापस नहीं ला सकती। विश्वसनीयता सिर्फ निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से लौटेगी।
राजनीति को एक परीक्षा देनी चाहिए
आज देश की राजनीति के सामने भी एक परीक्षा है। यह परीक्षा किसी प्रतियोगी परीक्षा की तरह नहीं है। इसमें न कोई मेरिट लिस्ट बनेगी और न कोई कटऑफ। यह परीक्षा यह तय करेगी कि राजनीतिक दल सत्ता के साथ हैं या सिद्धांत के साथ।
यदि भाजपा दिल्ली में छात्रों के सवालों को अलग नजर से देखती है लेकिन झारखंड में उन्हीं सवालों को लोकतंत्र की आवाज मानती है, तो सवाल भाजपा से भी पूछा जाएगा।
यदि कांग्रेस बिहार में छात्रों के आंदोलन के साथ खड़ी होती है लेकिन कांग्रेस शासित किसी राज्य में वही घटना हो तो उसकी भाषा बदल जाती है, तो सवाल कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए।
यही कसौटी हर राजनीतिक दल पर लागू होनी चाहिए
छात्रों के मुद्दे को सत्ता और विपक्ष की सुविधा के अनुसार परिभाषित करना बंद करना होगा। क्योंकि बेरोजगारी किसी पार्टी की नहीं होती। पेपर लीक किसी विचारधारा का नहीं होता। एक छात्र का बर्बाद हुआ साल किसी चुनावी घोषणा का हिस्सा नहीं होता। और परीक्षा में ईमानदारी की मांग किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।
आज देश का युवा सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा। वह यह भरोसा मांग रहा है कि अगर वह मेहनत करेगा तो उसका हक किसी पेपर लीक, किसी दलाल, किसी भ्रष्ट अधिकारी या किसी राजनीतिक संरक्षण के नीचे नहीं कुचला जाएगा।
इसलिए राजनीति को तय करना होगा कि वह छात्रों के साथ खड़ी है या सिर्फ उन छात्रों के साथ, जिनके आंदोलन से उसकी अपनी राजनीति को फायदा होता है। यही फर्क आंदोलन को राजनीति से अलग करता है। और यही फर्क तय करेगा कि आने वाली पीढ़ी लोकतंत्र पर भरोसा करेगी या उससे सवाल पूछना शुरू करेगी।
