Wednesday, August 12, 2026

जनता के दरबार में मुख्यमंत्री: शिकायतें खत्म हुईं, लेकिन सिस्टम क्यों नहीं बदला?

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अभय वाणीः करीब दो दशक पहले, अप्रैल 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी। मकसद साफ था—सरकार और जनता के बीच की दूरी कम करना, लोगों की समस्याएं सीधे सुनना और उनका त्वरित समाधान सुनिश्चित करना। बाद के वर्षों में यह कार्यक्रम बिहार की राजनीति और प्रशासन की एक पहचान बन गया। कई लोगों की शिकायतें सुनी गईं, अधिकारियों को निर्देश दिए गए और फरियादियों को राहत भी मिली।

आज बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं और उनके नेतृत्व में भी ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ कार्यक्रम जारी है। यानी सत्ता का चेहरा बदल गया, लेकिन जनता और सरकार के बीच सीधे संवाद की जरूरत बनी हुई है। यहीं से एक बड़ा और असहज सवाल पैदा होता है—करीब 20 साल बाद भी अगर जनता को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मुख्यमंत्री के दरबार तक पहुंचना पड़ रहा है, तो इन दो दशकों में बिहार के प्रशासनिक सिस्टम में कितना बदलाव आया?

राहत मिली, लेकिन व्यवस्था क्यों नहीं बदली?

जनता दरबार की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी नागरिक की शिकायत मुख्यमंत्री के सामने पहुंचती है, संबंधित अधिकारी को निर्देश मिलता है और कई मामलों में समस्या का समाधान भी हो जाता है। लोकतंत्र में सत्ता के शीर्ष व्यक्ति का सीधे जनता से संवाद निश्चित तौर पर सकारात्मक बात है। लेकिन एक व्यक्ति की समस्या का समाधान और उस समस्या को पैदा करने वाली व्यवस्था का सुधार—दो अलग बातें हैं।

मान लीजिए किसी नागरिक की पेंशन महीनों से अटकी है। वह दफ्तरों के चक्कर लगाता है और अंततः मुख्यमंत्री के दरबार में पहुंचता है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर उसकी पेंशन शुरू हो जाती है। नागरिक को राहत मिल गई। लेकिन क्या सिस्टम सफल हुआ? नहीं। क्योंकि असली सवाल यह है कि पेंशन समय पर शुरू क्यों नहीं हुई? नागरिक को मुख्यमंत्री तक क्यों पहुंचना पड़ा? संबंधित अधिकारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अगली बार किसी दूसरे नागरिक को इसी समस्या के लिए मुख्यमंत्री के दरबार में आना पड़ेगा? अगर शिकायत का समाधान तो हो जाए, लेकिन उसी तरह की शिकायतें लगातार आती रहें, तो यह शासन की सफलता नहीं, सिस्टम की कमजोरी का संकेत है।

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मुख्यमंत्री समाधानकर्ता नहीं, व्यवस्था के निर्माता हैं

लोकतंत्र में मुख्यमंत्री का काम हर नागरिक की व्यक्तिगत समस्या का समाधान करना नहीं है। मुख्यमंत्री का असली दायित्व ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें नागरिक की समस्या निचले प्रशासनिक स्तर पर ही हल हो जाए। प्रखंड, अंचल, थाना, जिला और संबंधित विभागों की पूरी प्रशासनिक संरचना इसी उद्देश्य से बनी है। वहां अधिकारी हैं, कर्मचारी हैं, नियम हैं और जिम्मेदारियां तय हैं।

फिर ऐसा क्यों होता है कि किसी सामान्य नागरिक को अपना काम कराने के लिए किसी बड़े अधिकारी, जनप्रतिनिधि या मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है? यही वह सवाल है जिसे जनता दरबार की सफलता का मूल्यांकन करते समय पूछा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री तक पहुंचना जनता का अधिकार है, लेकिन मुख्यमंत्री तक पहुंचना जनता की मजबूरी नहीं होना चाहिए।

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शिकायतों की संख्या नहीं, उनकी पुनरावृत्ति देखिए

किसी भी शिकायत निवारण व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने आवेदन आए और कितनों का निपटारा हुआ। असल पैमाना यह होना चाहिए कि एक जैसी शिकायतें कितनी बार दोहराई गईं।

अगर जमीन से जुड़े विवाद लगातार आते हैं, तो जमीन और राजस्व व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। अगर पेंशन के मामले बार-बार आते हैं, तो सामाजिक सुरक्षा की प्रक्रिया में खामी है। अगर सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए लोगों को बार-बार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो वितरण व्यवस्था सवालों के घेरे में है।

इस दृष्टि से जनता दरबार सरकार के लिए सिर्फ शिकायत सुनने का मंच नहीं, बल्कि प्रशासन की कमियों को पहचानने का एक महत्वपूर्ण फीडबैक सिस्टम भी हो सकता है। हर शिकायत सरकार को यह बताती है कि सिस्टम में कहीं न कहीं एक दरार है। लेकिन उस दरार को भरने के बजाय यदि हर बार उसमें फंसे व्यक्ति को बाहर निकाल दिया जाए, तो समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

दरबार की जरूरत घटे, तभी समझिए सिस्टम सुधरा

सम्राट चौधरी सरकार के सामने अब यही बड़ी चुनौती है। नीतीश कुमार के समय शुरू हुई इस व्यवस्था को आगे बढ़ाना अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि जनता से सीधा संवाद किसी भी सरकार के लिए उपयोगी है। लेकिन 2026 में इस कार्यक्रम को सिर्फ शिकायत सुनने तक सीमित रखने के बजाय इसे प्रशासनिक सुधार का माध्यम बनाया जा सकता है।

सरकार यह विश्लेषण कर सकती है कि जनता दरबार में सबसे अधिक शिकायतें किन विभागों से आती हैं, किन जिलों से एक जैसी शिकायतें बार-बार आती हैं, किन मामलों में अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है और किन प्रक्रियाओं के कारण नागरिकों को परेशान होना पड़ता है। फिर उन समस्याओं की जड़ पर काम किया जाए।

किसी विभाग में लगातार एक ही तरह की शिकायत आ रही है तो वहां सिर्फ नए निर्देश जारी करने के बजाय प्रक्रिया बदली जाए। किसी अधिकारी या कार्यालय के खिलाफ बार-बार शिकायत हो रही है तो जवाबदेही तय हो। किसी योजना में लगातार गड़बड़ी मिल रही है तो उसके क्रियान्वयन की निगरानी बदली जाए। शिकायत को बंद करना आसान है, शिकायत की वजह को खत्म करना असली सुधार है।

20 साल बाद सवाल सिर्फ जनता से नहीं, सिस्टम से भी

‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ की शुरुआत जिस भावना से हुई थी, वह लोकतांत्रिक रूप से महत्वपूर्ण थी—सरकार जनता की बात सुने और जनता को यह महसूस हो कि सत्ता उसके लिए उपलब्ध है।

लेकिन दो दशक बाद इस पहल का अगला चरण सिर्फ यही नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री कितने लोगों की फरियाद सुनते हैं। अब सवाल यह होना चाहिए कि ऐसी फरियादें पैदा ही कितनी हो रही हैं।

अगर 2006 में जिस तरह की शिकायतों के लिए लोगों को मुख्यमंत्री तक जाना पड़ता था, 2026 में भी उसी तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है।

सरकार बदलती है। मुख्यमंत्री बदलते हैं। अधिकारी बदलते हैं। योजनाएं बदलती हैं। लेकिन अगर नागरिक की परेशानी का रास्ता वही रहता है, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं सिस्टम अपनी जगह खड़ा है।

जनता दरबार की असली सफलता क्या होगी?

किसी मुख्यमंत्री के सामने फरियादियों की लंबी कतार देखकर यह कहना आसान है कि सरकार जनता की सुन रही है। लेकिन बेहतर शासन की तस्वीर कुछ दूसरी होगी।

जब पेंशन के लिए मुख्यमंत्री की जरूरत न पड़े, जब जमीन से जुड़ा सामान्य मामला स्थानीय स्तर पर ही निपट जाए, जब सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत न हो और जब थाना, प्रखंड, अंचल तथा जिला कार्यालय में नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी बात सुनी जाएगी और समय पर कार्रवाई होगी, तब जनता दरबार की सफलता दिखाई देगी। क्योंकि अच्छे शासन की पहचान यह नहीं है कि मुख्यमंत्री कितनी शिकायतें सुनते हैं। अच्छे शासन की पहचान यह है कि कितनी शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुंचने से पहले ही हल हो जाती हैं।

सम्राट चौधरी के सामने इसलिए चुनौती सिर्फ जनता का दरबार लगाने की नहीं है। असली चुनौती उस सिस्टम को इतना जवाबदेह, संवेदनशील और सक्षम बनाने की है कि जनता को अपनी समस्या लेकर बार-बार मुख्यमंत्री के दरबार में आने की जरूरत ही न पड़े।

जनता के दरबार की सबसे बड़ी सफलता उस दिन होगी, जब जनता की फरियादें कम होंगी और सिस्टम पर उसका भरोसा बढ़ेगा। और यह तभी संभव होगा, जब शिकायतों के समाधान के साथ-साथ लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई भी सुनिश्चित हो। आखिर केवल समस्या का समाधान काफी नहीं है, उस व्यवस्था को भी बदलना जरूरी है जो बार-बार वही समस्या पैदा करती है। वरना जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री का जनता दरबार समस्या के स्थायी समाधान का माध्यम है या महज एक प्रचार तंत्र।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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