रोहतासः एक ओर सरकार आम जनता को बेहतर बिजली सेवा और त्वरित शिकायत निवारण का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारी उन दावों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला रोहतास जिले के नोखा नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या-19 स्थित प्रेमनगर मुहल्ले का है, जहां मुहल्ले के एक हिस्से में कई घंटों तक बिजली आपूर्ति ठप रही, लोग भीषण गर्मी व उमस में तड़पते रहे, फोन पर मदद मांगने की कोशिश करते रहे,लेकिन जिम्मेदार अधिकारी फोन उठाने तक के लिए उपलब्ध नहीं हुए।
घंटों अंधेरे में रहे लोग, बढ़ती रही परेशानी
स्थानीय लोगों के अनुसार बिजली आपूर्ति बाधित होने के बाद लंबे समय तक समस्या का समाधान नहीं किया गया। भीषण गर्मी और उमस के बीच लोगों को घंटों परेशानी झेलनी पड़ी। बिजली नहीं रहने से दैनिक कार्य प्रभावित हुए और लोगों में विभाग के प्रति नाराजगी बढ़ती गई।
अधिकारियों से संपर्क की कोशिश रही बेकार
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब स्थानीय लोगों ने बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। लोगों का आरोप है कि स्थानीय अधिकारी से लेकर सासाराम इलेक्ट्रिक सप्लाई डिवीजन के अधिकारी तक को बार-बार फोन किए गए, लेकिन किसी ने फोन उठाना जरूरी नहीं समझा। दर्जनों कॉल के बावजूद न तो कोई जवाब मिला और न ही समस्या के समाधान को लेकर कोई जानकारी दी गई।
अतिआवश्यक सेवा में ऐसी लापरवाही क्यों?
विद्युत आपूर्ति एक अतिआवश्यक सेवा है। ऐसे में जब घंटों बिजली गुल रहे और जिम्मेदार अधिकारी जनता की शिकायत सुनने के बजाय फोन उठाने से ही बचते नजर आएं, तो उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। जनता के टैक्स के पैसे से वेतन, सुविधाएं और सरकारी संसाधन पाने वाले अधिकारियों से कम-से-कम यह अपेक्षा तो की ही जाती है कि वे आपात स्थिति में लोगों की बात सुनें और समस्या के समाधान की दिशा में पहल करें।
फ्यूज कॉल सेंटर ने भी जताई बेबसी
हद तो तब हो गई जब समस्या के समाधान की उम्मीद में लोगों ने सासाराम स्थित फ्यूज कॉल सेंटर से संपर्क किया। कॉल सेंटर ने फोन तो रिसीव किया, लेकिन वहां से भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला। कॉल सेंटर कर्मियों ने बताया कि समस्या के समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना आवश्यक है, लेकिन वे स्वयं भी उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि जिम्मेदार अधिकारी फोन नहीं उठा रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के बीच यह सवाल और गहरा गया कि जब विभाग का आधिकारिक शिकायत तंत्र ही अधिकारियों तक नहीं पहुंच पा रहा है, तो आम उपभोक्ताओं की शिकायतों का निस्तारण आखिर कैसे होगा?
बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की बढ़ी मुश्किलें
स्थानीय लोगों में इस रवैये को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि बिजली कटने से बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी फोन उठाने तक को तैयार नहीं थे। यह रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि सरकारी सेवा की मूल भावना के भी विपरीत है।
सरकारी सुविधा तो मिली, जवाबदेही कहां गई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जनता की समस्या सुनने और उसका समाधान करने के लिए अधिकारियों को सरकारी सुविधाएं, वेतन और संचार संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं, तो फिर संकट की घड़ी में उनका दायित्व कहां चला जाता है? क्या जनता केवल बिल भरने के लिए है और अधिकारियों की जवाबदेही सिर्फ कागजों तक सीमित है?
संवाददाता के फोन का भी नहीं मिला जवाब
खबर प्रकाशित किए जाने से पूर्व अधिकारियों का पक्ष जानने के लिए न्यूज़ स्टंप की टीम द्वारा भी कई बार फोन कॉल किए गए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जनता की शिकायत सुनने का समय आता है तो ये अधिकारी आखिर कहां गायब हो जाते हैं?
जनता का सीधा सवाल— फिर ऐसे अधिकारियों की जरूरत क्या है?
यदि समस्या के समय अधिकारी फोन तक नहीं उठाएं, शिकायतों का जवाब न दें और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लें, तो जनता ऐसे अधिकारियों की भूमिका और प्रासंगिकता पर सवाल उठाने लगी है। लोगों का कहना है कि जब जिम्मेदारी निभानी ही नहीं है, तो सरकारी पद और उससे जुड़ी सुविधाओं का औचित्य क्या है?
अब देखना यह है कि सरकार, बिजली विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर कोई कार्रवाई करता है या फिर जनता की शिकायतें इसी तरह जिम्मेदार अधिकारियों के अनुत्तरित फोन कॉलों में उलझकर रह जाएंगी।
